विश्‍व के इन 18 देशों में आज भी औरतें पिता या पति की इजाजत के बगैर न नौकरी कर सकती हैं, न बैंक अकाउंट खुलवा सकती हैं

By yourstory हिन्दी
September 21, 2022, Updated on : Wed Sep 21 2022 09:27:38 GMT+0000
विश्‍व के इन 18 देशों में आज भी औरतें पिता या पति की इजाजत के बगैर न नौकरी कर सकती हैं, न बैंक अकाउंट खुलवा सकती हैं
आज 21वीं सदी में भी दुनिया के इन 18 देशों में मेल गार्जियनशिप कानून लागू है, जो औरतों को पूरी तरह नियंत्रण में रखने के लिए बनाया गया है.
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ईरान की हाल की घटना के बाद हिजाब के अलावा मेल गार्जियनशिप कानून को लेकर भी बहस तेज हो गई है. हिजाब न पहनने के कारण गत सितंबर को तेहरान अपने परिवार से मिलने आई 22 साल की महसा अमीनी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उसके तीन दिन बाद पुलिस कस्‍टडी में ही उसकी मौत हो गई.


सोशल मीडिया पर उसके खिलाफ महिलाओं ने नो टू हिजाब कैंपेन चला रखा है. लेकिन साथ ही वह ईरान के मेल गार्जियनशिप कानून के खिलाफ भी खुलकर बोल रही हैं और उसे खत्‍म किए जाने की मांग कर रही हैं.

दुनिया के 18 देशों में है मेल गार्जियनशिप कानून

वर्ल्‍ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 18 देशों में आज भी मेल गार्जियनशिप कानून लागू है. हालांकि यह रिपोर्ट यह भी कहती है कि कानून और सामाजिक नियमों के नजरिए से दुनिया के सिर्फ 10 देश ऐसे हैं, जो किसी भी मामले में कोई जेंडर भेदभाव नहीं करते. बाकी दुनिया के 78 देशों में किसी न किसी रूप में जेंडर भेदभाव लागू है और इसे कानून का समर्थन प्राप्‍त है. मेल गार्जियनशिप कानून को मानने वाले समाज ये सभी इस्‍लामिक देश हैं इन 18 देशों के नाम इस प्रकार हैं-

1. ईरान

2. जॉर्डन

3. कुवैत

4. बहरीन

5. कतर

6. बोलीविया

7. कैमरून

8. चाड

9. कांगो

10. गैबोन

11. गुनिआ

12. नाइजर

13. सूडान

14. सीरिया

15. यूनाइटेड अरब अमीरात

16. वेस्‍ट बैंक

17. गाजा

18. यमन

क्‍या है मेल गार्जियनशिप कानून

 मेल गार्जियनशिप कानून का अर्थ है कि महिलाएं पुरुषों की तरह स्‍वतंत्र नहीं रह सकतीं. उनका कोई न कोई पुरुष अभिभावक होना जरूरी है. विवाह के पहले पिता लड़की का मेल गार्जियन होता है और विवाह के बाद पति. इन दोनों की अनुपस्थिति में खून के रिश्‍ते में सबसे नजदीकी पुरुष को महिला का अभिभावक माना जाता है. यह सिर्फ भावनात्‍मक बात नहीं है. महिलाओं के सोशल आइडेंटिटी कार्ड में मेल गार्जियनशिप का नाम लिखा होना जरूरी है. इसलिए पिता या पति की मृत्‍यु होने पर या महिला के तलाक लेने पर तुरंत आईडी कार्ड पर नए पुरुष अभिभावक का नाम दर्ज किया जाता है.

लेकिन यह मेल गार्जियन सिर्फ एक आईडी कार्ड पर लिखा नाम भर नहीं होता. महिलाओं के हर सरकारी कागज और फॉर्म पर उस पुरुष अभिभावक का हस्‍ताक्षर जरूरी होता है. पुरुष अभिभावक के साइन के बगैर इन 18 देशों में औरतें निम्‍नलिखित काम नहीं कर सकतीं-


1- लड़कियों को स्‍कूल या कॉलेज में एडमिशन नहीं मिलेगा.

2- मेल गार्जियन के साइन के बगैर महिलाएं नौकरी नहीं कर सकतीं.

3- पासपोर्ट नहीं बनवा सकतीं.

4- देश से बाहर यात्रा करने के लिए टिकट नहीं खरीद सकतीं.

5- देश के भीतर यात्रा नहीं कर सकतीं.

6- अपना बैंक अकाउंट नहीं खुलवा सकतीं.

7- अपने नाम से क्रेडिट कार्ड नहीं ले सकतीं.

8- ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनवा सकतीं.

9- अपने नाम से मकान या कोई प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकतीं.


ईरान में पिछले कुछ दिनों में इस मध्‍ययुगीन कानून के खिलाफ विरोध की आवाज काफी बुलंद हो गई है. ईरानी पत्रकार मलीह अलीनेजाद लंबे समय से मेल गार्जियनशिप कानून के खिलाफ अपनी आवाज उठाती रही हैं. मोना अल्‍तहावे मिडिल ईस्‍ट की एक जानी-मानी विमेन राइट्स एक्टिविस्‍ट हैं. एक अमेरिकन मैगजीन को दिए अपने एक इंटरव्‍यू में मोना कहती हैं, “इस सदी में इतना पुरातनपंथी और मर्दवादी समाज कोई दूसरा नहीं, जितने मिडिल ईस्‍ट के ये देश हैं. दुनिया में और कहीं ये मेल गार्जियनशिप कानून नहीं है.  किसी और देश में महिलाओं को कॉलेज में पढ़ने, नौकरी करने, यात्रा करने या एक मामूली सा बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए अपने पिता या पति का सिंगनेचर लेकर नहीं जाना पड़ता. कोई भी आधुनिक और लोकतांत्रिक देश इस बर्बरता को स्‍वीकार नहीं कर सकता. ये गलत है और खत्‍म होना चाहिए.”


कुवैत, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों में इंटरनेट महिलाओं की लड़ाई में प्रमुख माध्‍यम बना है. महिलाओं ने अपनी आवाज उठाने, विरोध दर्ज करने और अपनी मांगें रखने के लिए इंटरनेट को हथियार की तरह इस्‍तेमाल किया है. इन दिनों ईरान में हिजाब के खिलाफ चल रहे कैंपेन में भी इंटरनेट और सोशल मीडिया की प्रमुख भूमिका रही है. महिलाएं सोशल मीडिया पर बिना हिजाब के अपने फोटो डालकर विरोध प्रकट कर रही हैं.


2019 में एमआईटी सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्‍टडीज ने एक कॉन्‍फ्रेंस करवाई, जिसका मुख्‍य विषय था- “डिजिटल फेमिनिज्‍म इन मिडिल ईस्‍ट.” वहां बोलते हुए मोना अल्‍तहावे कहती हैं कि कट्टर पितृसत्‍तात्‍मक देशों में महिलाओं तक स्‍मार्ट फोन और इंटरनेट की पहुंच भी बहुत कम है. बावजूद इसके बंद समाजों में यही विरोध का सबसे बड़ा हथियार है क्‍योंकि आप किसी और तरीके से अपनी बात नहीं कह सकते.”


हालांकि ईरान में इन दिनों जो विरोध हो रहा है, वह सोशल मीडिया की चारदीवारी तोड़कर सड़कों तक जा पहुंचा है. ट्विटर ईरान से आ रहे ऐसे वीडियो से पटा पड़ा है, जिसमें सैकड़ों की संख्‍या में महिलाएं खड़े होकर अपने हिजाब जला रही हैं और आग के चारों ओर नृत्‍य कर रही हैं. वह सार्वजनिक जगहों पर समूह में इकट्ठा होकर अपने बाल काट रही हैं और हिजाब उतार रही हैं. इस विरोध प्रदर्शन में बड़ी संख्‍या में पुरुष भी शामिल हो रहे हैं, जो नो टू हिजाब के नारे लगा रहे हैं.


मलीह अलीनेजाद समेत ढेर सारी महिला एक्टिविस्‍ट सोशल मीडिया पर दुनिया भर के लोगों और मानवाधिकार संगठनों से अपील कर रही हैं कि वो ईरान के समर्थन में आगे आएं.


एक हिजाब के विरोध से शुरू हुई लड़ाई अब सिर्फ हिजाब तक सीमित नहीं रह गई है. महिलाएं अब मेल गार्जियनशिप कानून से लेकर हर तरह के स्‍त्री विरोधी कानूनों को बदलने की मांग कर रही हैं. वो सिर्फ हिजाब उतारकर खुश नहीं. अब उन्‍हें जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी चाहिए.


Edited by Manisha Pandey

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