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विश्व किडनी दिवस: युवाओं में बढ़ रही बीमारी, रोकथाम के लिए ये बातें जरूरी

14th Mar 2019
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सांकेतिक तस्वीर

किडनी की बीमारी कहीं महामारी न बन जाए इसलिए विश्व किडनी दिवस की शुरुआत की गई है। हर वर्ष 14 मार्च को विश्व किडनी दिवस मनाया जाता है। इस समस्या से संबंधित अधिक से अधिक जागरुकता पैदा की जाए ताकि यदि समय रहते इसका निदान हो जाए तो इससे होने वाली मृत्यु दर को कुछ हद तक कम करने का प्रयास किया जा सकता है। वैसे आज के समय में लगभग 5 प्रतिशत जनसंख्या किसी न किसी किडनी की समस्या का सामना कर रही है। हर वर्ष लाखों लोग इससे लड़ते हुए अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं।


दिल्ली स्थित सरोज सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के एचओडी सेंटर फॉर किडनी ट्रांसप्लांट के डॉ रमेश जैन का कहना है, "किडनी रोग के रोकथाम को लेकर भारत में जागरूकता की कमी है। हर साल क्रॉनिक किडनी डिजीज से ग्रस्त रोगियों की संख्या बढ़ रही है, पिछले साल 20 प्रतिशत से अधिक नए मामले दर्ज किए गए थें। इसके लिए आधुनिक जीवन शैली, अस्वास्थ्यकर खाने की आदते, बढ़ते मोटापे, धूम्रपान और अन्य नशीली दवाओं के दुरुपयोग के कारण भी है। यह रोग विकसित देशों में ही ज्यादा देखने को मिलती थीं वहीं अब 5 में से 4 क्रोनिक किडनी डिजीज से होने वाली मौतें कम और मध्यम आय वाले देशों में होने लगी हैं।"


अधिकतर केसों में वे लोग उच्च खतरे पर होते हैं जो कि हाइपरटेंशन या फिर डायबिटीज से पीडित है। मोटापे का शिकार लोग या धूम्रपान के आदी, 50 वर्ष पार कर चुके लोग, जिनका पारिवारिक इतिहास इससे संबंधित रहा हो। इसके लक्षण निम्न हो सकते है जैसे कि उच्च रक्तचाप, बार-बार पेशाब आना विशेषकर रात के समय में, पेशाब के रंग में परिवर्तन, पेशाब में रक्त आना, पैरों में सूजन होना, किडनी में दर्द व असहजता महसूस होना, थकावट व भूख न लगना, नींद न आना व सिरदर्द, किसी चीज पर ध्यान न लगा पाना, सांस ठीक से न ले पाना, जी मचलना व उल्टी होना सांस में बदबू व मुंह में अजीब सा स्वाद का बने रहना आदि।


मैक्स अस्पताल की नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. गरिमा अग्रवाल के अनुसार, "इस रोग के प्रमुख कारकों में से एक है सोडियम (नमक) का ज्यादा सेवन करना, जिसके परिणामस्वरूप हाइपरटेंशन बढ़ती है। जिसके बाद धीरे-धीरे किडनी सही तरीके से काम करना बंद कर देती है। अक्सर शुरुआत में किडनी के फेल होने का अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। युवा अपने समय की कमी के कारण और उपलब्धता की कमी के कारण बाजार में मिलने वाली प्रोसेस्ड चीजें खाना शुरू कर देते हैं जिनमें सोडियम की काफी मात्रा होती है और इसमें डेस्क जॉब भी शामिल है। उन्हें ताजे फल और सब्जियां खाने, नियमित व्यायाम करने, अच्छी तरह से हाइड्रेटेड रहने और धूम्रपान बंद करने पर ध्यान देना चाहिए। ये आदतें न केवल किडनी को स्वस्थ रखने में मदद करती हैं बल्कि पूरे स्वास्थ्य के लिए सहायक होती हैं। भारत में ज्यादातर लोग बिना डॉक्टर की सलाह लिए दर्द निवारक दवाओं का सेवन करते हैं, इससे भी किडनी को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।"


भारत में क्रोनिक किडनी रोगों की सटीक समझ अभी भी अपरिभाषित है, लेकिन इसकी अनुमानित व्यापकता 800 मिलियन प्रति व्यक्ति (पीपीएम) बताई जाती है। भारत में डायलिसिस या प्रत्यारोपण के लिए आवश्यक किडनी की विफलता लगभग 150-200 पीपीएम है। भारत में बढ़ते क्रॉनिक किडनी डिजीज के कारण है जैसे कि गरीबी, अस्वच्छता, प्रदूषक तत्व, जल प्रदूषण, भीड़भाड़, और ज्ञात और अज्ञात रासायनिक (भारी धातुओं, स्वदेशी उपचार, दर्द निवारक आदि सहित) से किडनी से जुड़ी कई बीमारियां हो सकती हैं। लगभग 30 से 40 प्रतिशत भारतीय रोगियों में मधुमेह क्रॉनिक किडनी डिजीज का प्रमुख कारण है। 2030 तक भारत में मधुमेह के रोगियों की आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा होने की उम्मीद है।


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