भारतीय मसालों के ज़ायके से पूरी दुनिया को लुभाना चाहता है यह दंपती, घर बेच शुरू किया बिज़नेस

घर बेचकर बिजनेस शुरू करने वाले दंपति...

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 तीन साल पहले इस दंपती ने तय किया था कि वे पूरी दुनिया के ज़ायके को अपनी घरेलू रेसपीज़ का मुरीद बना देंगे। इस उद्देश्य के साथ ही, अक्टूबर 2015 में दोनों ने ‘सोमीज़ किचन’ नाम से अपनी कंपनी की शुरूआत की थी, जिसके ज़रिए उन्होंने अपनी घरेलू रेसपीज़ के माध्यम से यूके और भारत के मार्केट को टारगेट करना शुरू किया था।

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सैंडी की मां सोमी सैमुअल अक्सर उनमें मिलने यूके जाती रहती थीं। जैसी ही सैमी यूके पहुंचती, सैंडी और जोल के दोस्त और परिवारवाले उनके हाथों से बनी रेसपीज़ की डिमांड करने लगते थे। सभी मेहमानों और रिश्तेदारों के बीच सैंडी की मां के हाथों से बने मसालों को ख़ास मांग थी।

स्टार्टअप: सोमीज़ किचन

फ़ाउंडर्स: सैंडी सैमुअल जेरोम, जोल जेरोम

शुरूआत: 2015

जगह: यूके, भारत

सेक्टर: फ़ूड

फ़ंडिंगः 5 करोड़ रुपए

जोल जेरोम (34) और सैंडी सैमुअल जेरोम (33) यूके में रहने वाले प्रवासी भारतीय हैं, जो अपने फ़ूड कल्चर को पूरी दुनिया में लोकप्रिय बनाने की जुगत में लगे हुए हैं और उन्होंने इस काम को ही अपना व्यवसाय बना लिया है। तीन साल पहले इस दंपती ने तय किया था कि वे पूरी दुनिया के ज़ायके को अपनी घरेलू रेसपीज़ का मुरीद बना देंगे। इस उद्देश्य के साथ ही, अक्टूबर 2015 में दोनों ने ‘सोमीज़ किचन’ नाम से अपनी कंपनी की शुरूआत की थी, जिसके ज़रिए उन्होंने अपनी घरेलू रेसपीज़ के माध्यम से यूके और भारत के मार्केट को टारगेट करना शुरू किया था।

यह दंपती मूल रूप से बेंगलुरु की रहने वाले हैं और 2009 में शादी के बाद से यूके में रह रहे है। जोल ने एमबीए की डिग्री ली है और कई बड़ीं कपनियां में बिज़नेस मैनेजर की भूमिका निभाई है। वहीं, सैंडी ऐडवरटाइज़िंग बैकग्राउंडड से हैं और वह भारत में गूगल के लिए और यूके में ट्रिनिटी मिरर सदर्न के लिए काम कर चुकी हैं। सैंडी के परिवार में ऑन्त्रप्रन्योरशिप का कल्चर पहले से ही रहा है।

मां की रेसपीज़ को बनाना चाहते हैं ग्लोबल!

सैंडी की मां सोमी सैमुअल अक्सर उनमें मिलने यूके जाती रहती थीं। जैसी ही सैमी यूके पहुंचती, सैंडी और जोल के दोस्त और परिवारवाले उनके हाथों से बनी रेसपीज़ की डिमांड करने लगते थे। सभी मेहमानों और रिश्तेदारों के बीच सैंडी की मां के हाथों से बने मसालों को ख़ास मांग थी। ये मसाले भारत में वह अपने घर में बनाया करती थीं और अपने दोस्तों को बेचा करती थीं। आपको बता दें कि यह व्यवसाय वह पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि चैरिटी के लिए पैसा जमा करने के लिए किया करती थीं।

जोल और सैंडी लंबे समय से एक ग्लोबल एंटप्राइज़ की शुरूआत करने के बारे में सोच रहे थे। इस दौरान ही उन्हें आइडिया आया कि फ़ूड इंडस्ट्री में एक वेंचर की शुरूआत करते हुए, उसे ग्लोबल लेवल तक बढ़ाया जा सकता है। दोनों ने तय किया कि घरेलू मसालों के साथ ही एक बिज़नेस की शुरूआत की जाएगी और मुनाफ़े का 50 प्रतिशत चैरिटी में दे दिया जाएगा। यूके में भारतीय कुज़ीन की पर्याप्त मांग है और इसलिए ब्रिटेन उनके लिए एक अच्छा टार्गेट मार्केट था।

लंदन का घर बेच, शुरू किया बिज़नेस

रेसपीज़ मां की थीं, इसलिए दोनों ने अपनी कंपनी का नाम भी उनके नाम पर ही रखा- सोमीज़ किचन (Somey’s Kitchen)। 2015 के अक्टूबर महीने से कंपनी की शुरूआत हुई। सबसे प्रारंभिक चुनौती थी कि पर्याप्त फ़ंड्स जुटाकर फ़ैक्ट्री लगाई जाए और बिज़नेस को आगे बढ़ाया जाए। सैंडी कहते हैं, “हमने कई निवेशकों और बैंकों को अप्रोच किया, लेकिन कोई भी बिना ट्रैक रिकॉर्ड वाले स्टार्टअप में निवेश करने के लिए तैयार नहीं था।” जब कहीं से भी मदद न मिली तो दोनों ने लंदन में अपना घर बेचने का फ़ैसला लिया।

सैंडी पुराने दिन याद करते हुए कहते हैं, “यह एक काफ़ी संवेदनशील और भावनात्मक निर्णय था क्योंकि यह हमारा पहला घर था और हमारे दोनों बच्चे इस घर में ही पैदा हुए थे। लेकिन अपने सपनों को साकार करने के लिए हमें यह करना ही पड़ा।” घर बेचने के बाद अब वे, बर्मिंघम के पास एक छोटे से शहर रगबी में रह रहे हैं। कुछ वक़्त बाद उन्हें वर्किंग कैपिटल के लिए बैंक से लोन भी मिल गया और कुल मिलाकर 5 करोड़ रुपए के निवेश के साथ उन्होंने अपना बिज़नेस शुरू किया।

सोमी किचन के प्रॉडक्ट

सोमी किचन के प्रॉडक्ट


यूके में सोमीज़ किचन के प्रोडक्ट्स की मैनुफ़ैक्चरिंग किराए के किचनों और उनके अपने घर से शुरू हुई। शुरूआत में उन्होंने सिर्फ़ ऑनलाइन माध्यम से 100 बॉटल्स बेचीं और कुछ समय बाद ही प्रोडक्ट की मांग बढ़ी और मासिक तौर पर ऑर्डर्स की संख्या 500 तक पहुंच गई। लेकिन सैंडी और जोल को पता था कि वे अपने बिज़नेस को जिस स्तर तक पहुंचाना चाहते थे, उसके लिए उन्हें एक फ़ैक्ट्री और बड़े रीटेलर्स तक पहुंच बनाने की ज़रूरत थी।

2018 में आए भारत

जोल बताती हैं, “जैसे ही हमने फ़ैक्ट्री लगाने के बारे में सोचा, हमने यूके में अपनी ट्रेडिंग बंद कर दी और अपना पूरा फ़ोकस फ़ैक्ट्री पर शिफ़्ट कर दिया। 2017 में फ़ैक्ट्री का सेटअप पूरा हो गया और प्रोडक्शन शुरू हो गया। हमारे पास फ़ंड सीमित थे, इसलिए हमने अपनी ग्लोबल प्रोडक्शन यूनिट भारत में स्थापित करने का फ़ैसला लिया था। हमने 2018 में भारत में इंडियन ब्रेड्स (रोटियां और पूड़ी) के साथ पिकल्ड मसालों की रेंज लॉन्च की और फिर बाद में यूके में।”

वेस्ट और साउथ इंडिया में सोमीज़ किचन की सेल्स काफ़ी अच्छी हैं और उनके पास डिस्ट्रीब्यूटर्स की एक लंबी चेन है। कंपनी, बिग बास्केट, बिग बाज़ार, स्टारा बाज़ार और गोदरेज नेचर्स बास्केट के ज़रिए भी सेलिंग कर रही है। जोल कहती हैं कि अगर हम भारत के 10 शहरों में सफलतापूर्वक अपने बिज़नेस को बढ़ा लेते हैं तो यह पूरे यूरोप के बराबर होगा।

पिछले महीने ही कंपनी में भारत में अपने ऑपरेशन्स की शुरूआत की है। कंपनी पिकल्ड मसालों को 240 रुपए प्रति बॉटल की दर से बेच रही है। वहीं 10 रोटियों/पूड़ियों के एक पैक के लिए कंपनी 55 रुपए से 125 रुपए तक चार्ज कर रही है। सोमीज़ किचन फ़िलहाल 50 लोगों की कोर टीम के साथ काम कर रहा है।

इन मायनों में बाक़ी कंपनियों से अलग होने का दावा

भारत में मसालों और अचार के मार्केट में पहले से ही कई बड़ी कंपनियां मौजूद हैं तो ऐसे में सोमीज़ किचन के प्रोडक्ट्स में क्या अलग बात है? इस संदर्भ में जोल कहती हैं, “हम मानते हैं कि हमारा प्रोडक्ट मार्केट में पहले से मौजूद पिकल्स या अचारों से अलग है। हमारे प्रोडक्ट को खाने के दौरान रोटी या राइस के साथ एक साइड डिश के तौर पर देखा जा सकता है। यूके में हम अपने प्रोडक्ट्स को ब्रेड और आलू के साथ प्रमोट कर रहे हैं और यही चीज़ हमें ख़ास बनाती है।”

जोल का दावा है कि इंडियन ब्रेड कैटेगरी में सिर्फ़ सोमीज़ किचन ही ऐसे प्रोडक्ट्स दे रहा है, जिनकी शेल्फ़ लाइफ़ 90 दिनों की है। उनका कहना है कि कंपनी अपने प्रोडक्ट्स में प्रेज़रवेटिव्स का इस्तेमाल नहीं करती बल्कि पैकेजिंग के लिए ख़ास तकनीक का इस्तेमाल करती है। जोल ने बताया कि उनकी इंडियन ब्रेड्स, ग्लूटेन-फ़्री हैं और यही उनकी यूएसपी (यूनीक सेलिंग प्रपोज़ीशन) है।

क्या है आगे की प्लानिंग?

कंपनी की प्लानिंग है कि इस साल से ही ऐमज़ॉन इंडिया और ऐमज़ॉन यूके साथ सेलिंग शुरू कर दी जाए। अनुमान के मुताबिक़, इस वित्तीय वर्ष में बतौर हाउसहोल्ड ब्रैंड, सोमीज़ किचन के मासिक टर्नओवर का आंकड़ा 5 करोड़ रुपए तक पहुंच जाएगा।

सोमीज़ किचन के लिए बिज़नेस में बढ़ोतरी जितनी ही ज़रूरी है, चैरिटी। उनके प्रोडक्ट्स पर भी यह लिखा होता है कि उनके मुनाफ़े का 50 प्रतिशत हिस्सा चैरिटी के लिए खर्च होगा। कंपनी को उम्मीद है कि 2019 के अंत तक कंपनी मुनाफ़े में होगी। सैंडी ने आगे की योजनाओं पर बात करते हुए कहा, “हमें उम्मीद है कि 2019 में यूएस और वेस्टर्न यूरोप के मार्केट्स तक भी अपनी पहुंच बना लेंगे। 2020 में हम मध्य पूर्व और एशिया के बाकी मार्केट्स को अपना लक्ष्य बनाएंगे।”

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