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कितनों को याद होगा विद्रोही अरुणा आसफ़ अली का नाम!

भारत छोड़ आंदोलन के दौरान 1942 में मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में झंडा फहराने वाली विदुषी पत्रकार, क्रांतिकारी अरुणा आसफ़ अली...

जय प्रकाश जय
29th Jul 2018
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भारत छोड़ आंदोलन के दौरान 1942 में मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में झंडा फहराने वाली विदुषी पत्रकार, क्रांतिकारी अरुणा आसफ़ अली की कल (29 जुलाई) पुण्यतिथि है। एसेंबली बम कांड के बाद शहीद भगत सिंह का मुकदमा लड़ने वाले कांग्रेस के शीर्ष नेता एवं पेशे से वकील आसफ़ अली उनके पति थे। उम्र में अपने से 23 साल बड़े आसफ़ अली से शादी रचाने के लिए उन्होंने अपने परिवार से विद्रोह कर दिया था।

अरुणा आसफ अली

अरुणा आसफ अली


वह उम्र में अरुणा से 23 साल बड़े थे। सन् 1928 में अरुणा ने अपने मां-बाप की मर्जी के बिना उनसे शादी कर ली। तब से उनका नाम अरुणा आसफ़ अली हो गया। दूसरे धर्म में शादी, ऊपर से उम्र का भी लम्बा फ़ासला, लोग उनके बारे में तरह-तरह की बातें करने लगे लेकिन वह कदापि विचलित नहीं हुईं।

अब तो अपने देश की वीरांगनाओं, लोकविख्यात विदुषी महिलाओं, स्त्री-स्वातंत्र्य योद्धाओं को दुनिया की रंगीनियों में डूबी नई पीढ़ी भूलने-भुलाने लगी है। वक्त ने अक्ल ठिकाने कर दी है। बाजार की चमक-दमक से चौंधियायी इस पीढ़ी का ठीकरा किसके सिर फोड़े कौन! पूछिए तो चुप्पी छा जाती है। ले-देकर जयंती-पुण्यतिथि पर लोग रानी लक्ष्मीबाई को याद कर लेते हैं, बाकी अवंतीबाई, इन्दुमती सिंह, उज्ज्वला मजूमदार, ऊदा देवी, चारुशीला देवी, झलकारी बाई, कल्पना दत्त, कल्याणी दास, दुर्गा भाभी, ननीबाला घोष, पद्मजा नायडू, नीरा आर्य, प्रीतिलता वादेदार, लीला नाग, विमल प्रतिभा देवी, शोभारानी दत्त, सुचेता कृपलानी, सुहासिनी गांगुली जैसी युद्धा महिलाएं आज कितने को याद हैं!

'भारत छोड़ आंदोलन' की ऐसी ही एक स्त्री-स्वातंत्र्य योद्धा रही हैं अरुणा आसफ़ अली, जिनकी आज (29 जुलाई) पुण्यतिथि है। कालका (हरियाणा) में पिता उपेन्द्रनाथ गांगुली और मां अम्बालिका देवी के घर 16 जुलाई सन 1909 को जनमीं इस अमर सेनानी का पारिवारिक नाम अरुणा गांगुली था। नैनीताल में उनके पिता का होटल था। वहीं रहते हुए उनकी स्कूली शिक्षा पूरी हुई। वैसे छात्र जीवन का कुछ वक्त उनका लाहौर में भी गुजरा। वह बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र, पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रहीं। हमेशा अपनी कक्षा में सबसे ज्यादा नंबरों से उत्तीर्ण होती थीं।

ग्रेजुएशन के बाद वह कोलकाता के 'गोखले मेमोरियल कॉलेज' में अध्यापन करने लगीं। इलाहाबाद में उनकी मुलाकात कांग्रेस के शीर्ष नेता एवं पेशे से वकील आसफ़ अली से हुई। वह उम्र में अरुणा से 23 साल बड़े थे। सन् 1928 में अरुणा ने अपने मां-बाप की मर्जी के बिना उनसे शादी कर ली। तब से उनका नाम अरुणा आसफ़ अली हो गया। दूसरे धर्म में शादी, ऊपर से उम्र का भी लम्बा फ़ासला, लोग उनके बारे में तरह-तरह की बातें करने लगे लेकिन वह कदापि विचलित नहीं हुईं। आसफ़ शहीदेआजम भगत सिंह के कट्टर समर्थकों में रहे। जब भगत सिंह ने असेंबली में बम फोड़ा तो उनका मुकदमा आसफ अली ने ही लड़ा।

जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ पूरा हिंदुस्तान उबल रहा था, उन्होंने 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान सार्वजनिक सभाओं को सम्बोधित किया, जुलूस निकाले। ब्रिटिश सरकार ने उन पर आवारा होने का आरोप लगाया। जब गांधी-इर्विन समझौते के बाद सभी राजनैतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया, अरुणा जेल में कैद रहीं। इसके खिलाफ उग्र जन आंदोलन होने लगा। आखिरकार ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। वह रिहा कर दी गईं लेकिन 1932 में उनको पुनः गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में कैद कर दिया गया। जेल में वह कैदियों के साथ गलत बर्ताव के विरुद्ध भूख हड़ताल पर बैठ गईं। रिहा होने के बाद उन्हें 10 साल के लिए राष्ट्रीय आंदोलन से अलग कर दिया गया। एक बार अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए पांच हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया। इस बीच वह बीमार पड़ गईं। गांधी जी ने उन्हें समर्पण करने का सुझाव दिया लेकिन गिरफ्तारी वारंट रद्द होने के बाद ही उन्होंने समर्पण किया।

सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में निर्भीक अरुणा आसफ़ अली ने कांग्रेस का झंडा फहरा कर गोरी हुकूमत को थर्रा दिया था। सन् 1930, 1932 और 1941 में सत्याग्रह करती हुईं वह जेल की सलाखों के पीछे कैद रहीं। सन् 1958 में वह दिल्ली नगर निगम की प्रथम महापौर निर्वाचित हुईं। दिल्ली में उनके ही नाम से अरुणा आसफ अली मार्ग है। अरुणा अपने राजनीतिक जीवन में विशेष रूप से जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन और जयप्रकाश नारायण से प्रभावित रहीं। भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान वह भूमिगत होकर स्वतंत्रता संग्राम में जूझने लगीं। महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के तुरन्त बाद उन्होंने मुम्बई में विरोध सभा आयोजित कर विदेशी हुकूमत को खुली चुनौती दी। वह गुप्त रूप से कांग्रेसियों का पथ-प्रदर्शन करती रहीं। मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली में घूम-घूमकर वह आजादी की अलख जगाती रहीं लेकिन उन्हें पुलिस पकड़ने में विफल रही।

आजादी के आंदोलन के दौरान अरुणा आसफ़ अली तभी गिरफ्तार हो पाती थीं, जब कांग्रेस और खुद की मर्जी से उनको जेल जाना जरूरी लगा। जब 1946 में उनके नाम का वारंट रद्द हुआ, तभी वह प्रकट हुईं। अपनी सारी सम्पत्ति जब्त हो जाने पर भी उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। सन् 1947 में वह दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्षा निर्वाचित की गईं लेकिन अगले ही साल वह सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं। दो साल बाद सन् 1950 में उन्होंने अलग से ‘लेफ्ट स्पेशलिस्ट पार्टी’ का गठन किया। उसके ही झंडे-बैनर के साथ मज़दूरों की लड़ाई लड़ने लगीं। इस पार्टी का सन् 1955 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विलय हो गया। वह ‘ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की उपाध्यक्ष बनाई गईं। सन् 1958 में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी भी छोड़ दी। सन् 1964 में जब जवाहरलाल नेहरू का देहावसान हुआ, वह पुनः कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं।

पार्टियों में अपना जुझारू राजनीतिक जीवन साझा करने के साथ ही वह विभिन्न संगठनों इंडोसोवियत कल्चरल सोसाइटी, ऑल इंडिया पीस काउंसिल, नेशनल फैडरेशन ऑफ इंडियन वूमैन आदि में भी पूरी तरह सक्रिय रहीं। बाद में उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेज़ी दैनिक ‘पेट्रियट’ से जुड़कर आजीवन पत्रकारिता करती रहीं। 1975 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार और 1991 में अंतरराष्ट्रीय ज्ञान के लिए जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार दिया गया। 29 जुलाई 1996 को वह दुनिया से विदा हो गईं। मरणोपरांत सन् 1998 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। साथ ही भारतीय डाक सेवा ने उनके नाम पर एक डाक टिकट भी जारी किया।

वह लेखिका भी थीं। उन्होंने कई किताबें लिखीं जिनमें 'Words Of Freedom: Ideas Of a Nation' उल्लेखनीय है। डॉ राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर उन्होंने ‘इंकलाब’ मासिक पत्रिका निकाली। मार्च 1944 में उन्होंने ‘इंकलाब’ में लिखा- ‘आजादी की लड़ाई के लिए हिंसा-अहिंसा की बहस में नहीं पड़ना चाहिए। क्रांति का यह समय बहस में खोने का नहीं है। मैं चाहती हूं, इस समय देश का हर नागरिक अपने ढंग से क्रांति का सिपाही बने।’ दैनिक ‘ट्रिब्यून’ से उन्हें ‘1942 की रानी झांसी’ की संज्ञा मिली। उन्हें ‘ग्रैंड ओल्ड लेडी’ भी कहा जाता है। आज उनके नाम पर देश में कई प्रमुख संस्थान भी हैं।

यह भी पढ़ें: असम की ट्रांसजेंडर स्वाति बरुआ ने जज बनकर रच दिया इतिहास

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