क्या सार्वजनिक पदों पर आसीन लोगों के मूल अधिकार पर अतिरिक्त पाबंदी लगाई जा सकती है?

By yourstory हिन्दी
January 04, 2023, Updated on : Mon Jan 30 2023 13:53:53 GMT+0000
क्या सार्वजनिक पदों पर आसीन लोगों के मूल अधिकार पर अतिरिक्त पाबंदी लगाई जा सकती है?
जस्टिस एसए नजीर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ मंत्रियों की वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अतिरिक्त पाबंदी लगाने के व्यापक प्रश्न पर एकमत रही. पीठ में जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन और जस्टिस बीवी नागरत्ना भी शामिल हैं.
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि उच्च सार्वजनिक पदों पर आसीन पदाधिकारियों की ‘‘वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’’ के मूल अधिकार पर अतिरिक्त पाबंदी नहीं लगाई जा सकती क्योंकि इस अधिकार पर रोक लगाने के लिए संविधान के तहत पहले से विस्तृत आधार मौजूद हैं.


जस्टिस एसए नजीर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ मंत्रियों की वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अतिरिक्त पाबंदी लगाने के व्यापक प्रश्न पर एकमत रही. पीठ में जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यन और जस्टिस बीवी नागरत्ना भी शामिल हैं.

क्या सरकार को मंत्री के बयानों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

इस मुख्य मुद्दे पर कि क्या सरकार को एक मंत्री के बयानों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है या नहीं, संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत वाले फैसले में कहा कि सरकार को किसी मंत्री के अपमानजनक बयानों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.


खुद के और जस्टिस नजीर, जस्टिस गवई तथा जस्टिस बोपन्ना के लिए फैसला लिखने वाले जस्टिस रामासुब्रमण्यन ने कहा कि एक राजनीतिक अवधारणा के लिए सामूहिक जिम्मेदारी आवश्यक है और विधानसभा के बाहर एक मंत्री के किसी भी एवं प्रत्येक मौखिक बयान पर इस अवधारणा को विस्तारित करना संभव नहीं है.


जस्टिस रामासुब्रमण्यन ने 300 पृष्ठों के फैसले में कहा, ‘‘अन्य मूल अधिकार लागू करने की आड़ में अनुच्छेद 19(2) में अतिरिक्त पाबंदियां नहीं पाई गई हैं, इन्हें अनुच्छेद 19(1)(ए) द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार के इस्तेमाल पर लागू नहीं किया जा सकता.’’


अनुच्छेद 19(2) वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के उपयोग पर संप्रभुता देश की अखंडता, लोक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता आदि के हित में तार्किक पाबंदी लगाने के लिए कानून बनाने की सरकार की शक्तियों से संबद्ध है.


शीर्ष न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 19 और 21 को राज्य या इसके तहत आने वाली संस्थाओं के अलावा अन्य व्यक्तियों पर भी लागू किया जा सकता है.

एक जज ने जताई असहमति

हालांकि, जस्टिस नागरत्ना ने उच्च पदों पर आसीन पदाधिकारियों पर अतिरिक्त पाबंदियों के व्यापक मुद्दे पर सहमति जताया, लेकिन विभिन्न कानूनी मुद्दों पर अलग विचार प्रकट किया. इनमें एक विषय यह है कि क्या सरकार को उसके मंत्रियों के अपमानजनक बयानों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.


उन्होंने कहा कि सरकार के किसी कामकाज के संबंध में या सरकार को बचाने के लिए एक मंत्री द्वारा दिये गये बयान को सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत को लागू करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का बयान बताया जा सकता है.


जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘‘संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत पाबंदियां व्यक्ति/समूह/लोगों के वर्गों, समाज, अदालत, देश और सरकार पर सभी संभावित हमलों को अपने दायरे में लेने के लिए व्यापक रूप से पर्याप्त है.’’ यह अनुच्छेद वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबद्ध है.


जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि नफरत फैलाने वाला भाषण असमान समाज का निर्माण करते हुए मूलभूत मूल्यों पर प्रहार करता है और विविध पृष्ठभूमियों, खासतौर से ‘‘हमारे ‘भारत’ जैसे देश के’’, नागरिकों पर भी प्रहार करता है.

उन्होंने कहा कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बेहद आवश्यक अधिकार है ताकि नागरिकों को शासन के बारे में अच्छी तरह जानकारी हो.

क्या था मामला?

यह विवादास्पद संवैधानिक मुद्दा जुलाई 2016 में उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर के पास एक राजमार्ग के पास एक मां-बेटी से कथित सामूहिक बलात्कार के बारे में राज्य के तत्कालीन मंत्री आजम खान की एक कथित टिप्पणी के बाद पैदा हुआ था. खान ने इस वारदात को एक ‘‘राजनीतिक साजिश’’ बताया था.


सुप्रीम कोर्ट उस व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रहा है जिनकी पत्नी तथा बेटी से जुलाई 2016 में बुलंदशहर के समीप एक राजमार्ग पर कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म किया गया. वह इस मामले को दिल्ली स्थानांतरित करने तथा उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मंत्री आजम खान पर उनके विवादित बयान के लिए प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध कर रहे हैं.


सुप्रीम कोर्ट ने 15 नवंबर को अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा था कि सार्वजनिक पद पर आसीन लोगों को आत्म-संयम पर जोर देना चाहिए और ऐसी बेतुकी बातों से बचना चाहिए जो अन्य देशवासियों के लिए अपमानजनक हैं.


Edited by Vishal Jaiswal