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कोविड-19 की दूसरी घातक लहर के बीच मदद के लिए आगे आ रहे हैं भारत के नागरिक

समाज के हर कोने के लोग हर संसाधनों के साथ लोगों की मदद करने के लिए आगे आ रहे हैं हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस संकट के दौरान भी पैसे बना रहे हैं। COVID-19 की दूसरी लहर भारत की मानवता के लिए बड़ा संकट लेकर आई है।

कोविड-19 की दूसरी घातक लहर के बीच मदद के लिए आगे आ रहे हैं भारत के नागरिक

Friday April 30, 2021 , 9 min Read

जैसे कि भारत कोविड-19 की दूसरी लहर से लड़ रहा है ऐसे में दुनिया भर के देशों ने भारत के साथ एकजुटता व्यक्त की है। अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, जापान, सिंगापुर, सऊदी अरब, चीन और ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य देशों ने देश के लिए इस अभूतपूर्व समय के दौरान मदद सुनिश्चित की है।


दुनिया की सबसे ऊंची गगनचुंबी इमारत दुबई के बुर्ज खलीफा ने भारत के तिरंगे को दिखाते हुए "Stay Strong India" का संदेश दिया। भारत को इस समय इस सबकी जरूरत है - नैतिक समर्थन और साथ ही चिकित्सा उपकरण और संसाधनों के रूप में भेजी गई सहायता की भी।

दुनिया की सबसे ऊंची गगनचुंबी इमारत दुबई के बुर्ज खलीफा ने भारत के तिरंगे को दिखाते हुए "Stay Strong India" का संदेश दिया। (फोटो साभार: Twitter/ Hahosani)

दुनिया की सबसे ऊंची गगनचुंबी इमारत दुबई के बुर्ज खलीफा ने भारत के तिरंगे को दिखाते हुए "Stay Strong India" का संदेश दिया।

(फोटो साभार: Twitter/ Hahosani)

देश में हाल ही में एक दिन में कोरोना के 3.52 लाख से अधिक मामले पाए गए थे। खबर लिखे जाने तक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक भारत में कोरोना के 3084814 एक्टिव मामले हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मई के मध्य में कोरोना की यह दूसरी लहर अपने चरम पर पहुंचेगी।


विनाशकारी महामारी के बीच, देश के लगभग हर कोने में, लोग मदद करने के लिए कदम बढ़ा रहे हैं, जिसमें क्वारंटाइन में COVID-19 रोगियों के लिए खाना देने से लेकर और अधिक गंभीर रोगियों की चिकित्सा आवश्यकताओं को पूरा करना शामिल हैं।

एक समय में एक भोजन

एक हफ्ते पहले, लेखक और शेफ सारांश गोइला का इंस्टाग्राम मुंबई, पुणे और बेंगलुरु में COVID-19 रोगियों के लिए भोजन की रिक्वेस्ट से भरा हुआ था।


वह बताते हैं, "जब मैंने इस तरह की सर्विस के लिए कुछ इंस्टाग्राम स्टोरीज को ऐड किया, तो मुझे दर्जनों क्वेरीज मिलने लगीं। वहां मैंने एक बड़ा गैप देखा, जहां मरीज ऐसे 'COVID भोजन' की तलाश कर रहे थे, जो उनके पास में किसी घर के शेफ द्वारा बनाया गया सादा घर का बना खाना हो।"


अपने परिवार के सदस्यों और अपने मुंबई स्थित रेस्तरां, गोइला बटर चिकन (Goila Butter Chicken) में मैनेजर की मदद से, वे 250 स्वयंसेवकों और सेवा प्रदाताओं के पास पहुंचे और उनकी मदद को वेरीफाई किया। जिसके बाद उन्होंने एक Google शीट तैयार की।


एक सप्ताह से भी कम समय में, यह लिस्ट बढ़ती रही क्योंकि यह विभिन्न सोशल मीडिया साइटों पर जा चुकी थी, और अब 40 शहरों और 26 राज्यों में 1,000 से अधिक भोजन प्रदाताओं के साथ इसमें कई पेज जुड़ चुके हैं। दिल्ली की एक टेक कंपनी ने उन्हें दो दिनों से भी कम समय में वेबसाइट बनाने में मदद की। इस लिस्ट में मेट्रो शहरों से आगे की जगहों के नाम भी शामिल हैं।


36 वर्षीय कुन्जेस एंग्मो लेह, लद्दाख की पहली और इकलौती मददगार इससे जुड़ी हैं।


वे कहती हैं, “मैं जो कुछ भी अपने परिवार के लिए बना रही हूं, मैं उसे लंच और डिनर के लिए दूसरों के लिए भी बनाना चाहती हूं और लेह में व उसके आसपास के लोगों को मुफ्त में खाना देने के लिए तैयार हूं। मैं अपनी व्यक्तिगत क्षमता में वह सब करना चाहूंगी हूं जो मैं कर सकती हूं क्योंकि मैंने ऐसे COVID पॉजिटिव लोगों के बारे में सुना है जो अकेले रह रहे हैं।"


बेंगलुरु में, दो डिजाइनरों, मीती देसाई और पीयूष जैन ने 'रेसिपी ऑफ होप' नाम से एक ग्रुप बनाया है, जहां कई स्वयंसेवक सादा शाकाहारी भोजन पका रहे हैं और पूरे बेंगलुरु में COVID प्रभावित परिवारों को वितरित कर रहे हैं।


मां-बेटी की जोड़ी अपराजिता और कृतिका राम्या ने भी होम-क्वारंटाइन में रह रहे कोरोना मरीजों की मदद करने के लिए पटना के कदमकुआं में अपनी रसोई खोली है। अपराजिता राम्या पटना वीमेंस कॉलेज में फिजिक्स डिपार्टमेंट की प्रमुख हैं। वह रोजाना सुबह 11 बजे अपना लेक्चर शुरू करने से पहले खाना बनाना नहीं भूलतीं हैं, दोपहर 12.30 बजे खाना पैक करना शुरू करती हैं, और इसे स्वयंसेवकों द्वारा पिक करने के लिए गेट पर छोड़ देती हैं।


जरूरत को ध्यान में रखते हुए, फूडटेक स्टार्टअप Zomato ने अपने ऐप पर होम-स्टाइल मिनी-मेनू फीचर भी शुरू किया है।

महामारी के दौरान इनफ्लुएंसर होना

इस समय, भारत फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर और मैसेजिंग ऐप व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर लोगों द्वारा दिखाए जा रहे दयालुता के भाव के अभिभूत है। इन प्लेटफॉर्म पर अस्पताल के बेड, दवाओं, इंजेक्शन, प्लाज्मा, और ऑक्सीजन की उपलब्धता के लिए लोगों की रिक्वेस्ट कभी खत्म ही नहीं हो रही हैं।


इंस्टाग्राम पर एक मिलियन फॉलोअर्स की पहुंच के साथ आंत्रप्रेन्योर, फैशन और लाइफस्टाइल इनफ्लुएंसर मासूम मिनावाला कहती हैं, “सोशल मीडिया एक अस्थायी हेल्थकेयर सपोर्ट बन गया है। यह सोशल मीडिया और इंटरनेट पर दिखाई दे रही है मानवता और करुणा है जो इन कठिन समय में उम्मीद की किरण दिखा रही है।”


वर्चुअल प्लेटफार्मों पर करुणा की नई ऊंचाई के बावजूद, मासूम उस जिम्मेदारी से अच्छी तरह वाकिफ हैं जो संकट के ऐसे समय में अपनी उपस्थिति से लोगों की मदद करती हैं। वह कहती हैं कि हर स्टोरी पोस्ट करने से पहले काफी बातचीत की जाती है।


वह कहती हैं, "बहुत सारी जानकारी और संसाधन मौजूद हैं लेकिन जरूरत है कि वह समय से लोगों तक पहुंच सके। ईमानदारी से कहं तो, हम केवल वही जानकारी पोस्ट कर रहे हैं जो वेरीफाइ है।"


डिजिटल स्ट्रेटजिस्ट और कंटेंट क्रिएटर आंचल अग्रवाल कहती हैं, "किसने सोचा होगा कि सोशल मीडिया, जहां हम सिर्फ हंसी-मजाक करते हैं और मनोरंजन करते हैं, वह एक दिन मददगार साबित होगा? लेकिन दुर्भाग्य से यह हो रहा है, हम कुछ लोगों को मिस करते हैं और संसाधनों की भारी मांग और कमी व किसी प्रकार से सिस्टम के न होने के कारण समय पर उनकी मदद करने में सक्षम नहीं हैं।"


जब डायरेक्ट मैसेजेस (DMs) में बहुत सारे मैसेजेस आने लगे और खुद से उन्हें वेरीफाई करना मुश्किल होने लगा तो, आंचल ने हर पोस्ट को वेरीफाई करने के लिए व्हाट्सएप पर सहयोग करने वाले लगभग 20 स्वयंसेवकों की एक टीम बनाई।

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आंचल कहती हैं, "कभी-कभी, हम जानकारियों को डबल वेरीफाई भी करते हैं क्योंकि एक बार जब आपने मदद के लिए जानकारी पोस्ट की, तो मांग इतनी अधिक होती है कि वह मिनटों में समाप्त हो जाती है। इसलिए हम अन्य रोगियों को वही समान लीड (मदद के लिए जानकारी) नहीं भेजना चाहते हैं, और उन्हें झूठी आशा व इस गंभीर संकट में उनकी ऊर्जा बर्बाद करना नहीं चाहते हैं।"


योर फूड लैब के संस्थापक शेफ संजीत कीर कहते हैं, ''बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जिन्होंने हमारी स्टोरीज के माध्यम से बेड, ऑक्सीजन सिलेंडर, दवाएं, प्लाज्मा डोनर ढूंढे हैं। कई मामलों में, लोगों को उनकी जरूरतों के मुताबिक मदद मिली है, लेकिन हमें ऐसे भी मैसेजेस मिलते हैं कि मरीज मदद मिलने से पहले ही गुजर गया। यह दिल तोड़ने वाला है।”

थोड़ी मानवता

बेंगलुरु में प्री-स्कूल चेन सीडीसी किड्स चलाने वाली दो बच्चों की मां नीतू गुप्ता के लिए, जिंदगी पहले जैसी नहीं रही जबसे कोरोनावायरस पहली बार मार्च 2020 में अस्तित्व में आया। उनकी क्लासेस ऑनलाइन शिफ्ट कर दी गईं, और उन्होंने COVID-19 से पीड़ित अपने रिश्तेदारों के लिए खाना पकाने में अधिक समय बिताना शुरू कर दिया।


वह कहती हैं, "जब (कोरोना की) दूसरी लहर आई, तो एक और परिचित को कोरोना हो गया, और मुझे लगा कि यह जरूरी समय है कि मैं उनकी मदद के लिए आगे आऊं, और पिछले दो हफ्तों से दिन-रात हर क्षमता के साथ समर्थन कर रही हूं।"


उपलब्ध संसाधनों की पुष्टि करने के लिए नीतू अस्पतालों और अन्य स्रोतों तक पहुंचती है, और जरूरतमंद लोगों को उसके बारे में जानकारी देती हैं। आज, उन्हें प्राप्त होने वाली प्रत्येक कॉल और मैसेज जीवन और मृत्यु का मामला है, और वह रोजाना लगभग 1000 रोगियों को सही कनेक्शन देने में सक्षम हैं। वह कहती हैं, “जब मैं किसी एक व्यक्ति के साथ बात कर रही होती हूं, तो मैं दस अन्य कॉल को मिस कर देती हूं। यह बहुत भावुक करने वाला है।” उनके पड़ोस में लगभग 50 दोस्तों और निवासियों ने उनके साथ जुड़कर प्लाज्मा, ऑक्सीजन, इंजेक्शन और अन्य जैसी विशिष्ट आवश्यकताओं को कारगर बनाने में मदद की है।


दिन के अंत में, उन्हें मिलने वाले मैसेजेस अलग-अलग होते हैं, सच में वे जिंदगी और मौत जैसे अलग-अलग होते हैं। सही संसाधनों के बारे में जानकारी साझा करके लोगों की जान बचाने वालों के धन्यवाद मैसेजेस होते हैं लेकिन उन लोगों के भी मैसेज होते हैं जो धन्यवाद तो कर रहे होते हैं लेकिन बताते हैं कि उनका प्रिय अब इस दुनिया में नहीं रहा।


नीतू कहती हैं, "यह दुखद है, और मेरे पास इसके लिए कोई शब्द नहीं है, लेकिन मैं सोचती रहती हूं कि क्या मैं अगर उनकी कॉल उठा लेती तो शायद सीन कुछ और होता। कभी-कभी, मैं वास्तव में बुरा महसूस करती हूं और खुद को दोष देती हूं।"


नीतू कहती हैं कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोग संकट के इस समय में भी पैसे कमाने के लिए हर अवसर का इस्तेमाल कर रहे हैं, अस्पताल के बिस्तर, दवाइयों और इंजेक्शन बेचने के लिए एक काला बाजार चला रहे हैं।


वह बताती हैं, “मैं सरकारी हेल्पलाइनों तक नहीं पहुंच सकी क्योंकि दिए गए नंबर या तो बिजी थे या काम नहीं कर रहे थे, लेकिन मेरी इच्छा है कि बीबीएमपी हमारे बचाव में आती और उस बिचौलिए को बाहर निकालती जो 15 हजार रुपये के बेड के लिए 50,000 रुपये मांग रहा था। इस समय में अस्पतालों में पहुँचना भी एक मैराथन है।"


जैसा कि चार्ल्स डिकेंस लिखते हैं, "यह सबसे अच्छा समय था, यह सबसे बुरा समय था, यह ज्ञान की उम्र थी, यह मूर्खता की उम्र थी, यह विश्वास का युग था, यह अविश्वसनीयता का युग था, यह प्रकाश का मौसम था, यह अंधकार का मौसम था, यह आशाओं का झरना था, यह निराशा की सर्दी थी।" 20वीं सदी का यह लेखक संभवत: आज के भारत के बारे में लिखा रहा होगा जब देश कोरोना की दूसरी घातक लहर का सामना कर रहा है।


लेकिन जैसा कि वे कहते हैं, 'यह भी गुजर जाएगा', और भारत दूसरे छोर पर मजबूत होकर लौटेगा। यह उम्मीद ही है जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। 


Edited by Ranjana Tripathi