झुग्गियों में स्वच्छ भारत की जोत जला रही हैं अमेरिका की एरिन

By Shikha Chouhan
May 17, 2016, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:17:15 GMT+0000
झुग्गियों में स्वच्छ भारत की जोत जला रही हैं अमेरिका की एरिन
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अपार संभावनाओं का देश अमेरिका के बोस्टन के पास एक छोटे से शहर की रहनेवाली एरिन भी हमेशा कुछ बड़ा करने के बारे में सोचती थीं. उन्होंने बचपन से ही एस्ट्रोनॉट बनने का सपना देखा था। पेशे से डेंटिस्ट माँ और वकील पिता ने एरिन को अच्छी शिक्षा के साथ-साथ अच्छी परवरिश दी थी, जिसके बलबूते वो चाहती तो अपने सपने को पूरा भी कर लेती. हालांकि माता-पिता उन्हें पढाई के साथ-साथ, समाज सेवा के लिए भी प्रेरित करते थे. हर हफ्ते एरिन किसी पास के अस्पताल में अपनी सेवा देती थीं और छुट्टियों में बेघर लोगों के लिए बनाए गये अस्थायी आवासों में खाना बनाती थीं. माता-पिता ने बचपन में ही समाजसेवा का बीज एरिन के मन में बो दिया था. एरिन जब 19 साल की थी तो उन्होंने फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर देखी. इस फिल्म ने एरिन के मन में सवालों का तूफ़ान खड़ा कर दिया। फिल्म में दर्शाए गये, मुंबई के झुग्गियों में रहनेवालों के हालात और उनकी तकलीफों को देखकर एरिन की आखें फटी की फटी रह गईं।

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योर स्टोरी से बातचीत में एरिन ने बताया, 

"स्लमडॉग मिलेनियर देखने के बाद मैं खुद से सवाल करने लगी. दुनिया भर में लोगों को इतनी तकलीफें हैं और मैं इतने साल सिर्फ अमेरिकन हिस्ट्री और एडवांस्ड मैथ्स पढ़ती रही. मैं अपने एजुकेशन सिस्टम को कोसने लगी. मेरे माता-पिता हमेशा कहते थे कि मुझे अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य मिला है..लेकिन ज़रूरी नहीं की सब इतने भाग्यशाली हैं. इसलिए ये हमारी ज़िम्मेदारी है की हम अपने साधन और समय का इस्तेमाल उन लोगों के लिए करें जिन्हें इनकी ज़रूरत है. मैंने मुंबई जाने का टिकट कराया और गर्मियां, एक पारसी अनाथालय में बितायीं."
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अनाथालय में एरिन ने जो देखा और सुना वो उनकी आगे की जिंदगी बदलने के लिए काफी था. अनाथ लड़कियों के संघर्ष और तकलीफों की कहानी सुनकर एरिन ने फैसला कर लिया कि अब जब कभी वो भारत आएँगी, वो किसी मकसद के साथ आएँगी. साल 2013 में थाईलैंड के एक स्कूल में काम करते हुए एरिन का सामना एक दूसरी समस्या से हुआ.

एरिन कहती हैं, 

मुझे ये जानकर हैरानी हुई की इस्तेमाल तो दूर, बच्चे ये भी नहीं जानते थे कि साबुन क्या है. जब मैंने कुछ युवाओं से पूछा तो उनका भी कुछ ऐसा ही जवाब था. मेरे लिए ये एक बेहद चौंकाने वाला वाक्या था. साबुन, जिसके बारे में हम शायद कभी सोचते भी नहीं और जो हमारी डेली हाईजीन का एक ज़रूरी हिस्सा है, उसके बारे में इन बच्चों को कुछ नहीं पता. जब मैंने उन्हें कुछ साबुन के टुकड़े दिए तो उन्हें समझ नहीं आया की इसका क्या करना है. मुझे लगा कि हम हमेशा साफ़ पानी के इस्तेमाल पर जोर देते हैं लेकिन हाईजीन के लिए सबसे ज़रूरी साबुन के इस्तेमाल पर कोई जोर नहीं देता. बस यही सोच आगे मेरे काम को निर्धारित करने वाली थी और ऐसे जन्म हुआ संस्था सुन्दर का।
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एरिन के मुताबिक जब आप पहल करने की सोचते हैं, तो वो आपकी सोच से कहीं ज्यादा मुश्किल होती है. कुछ ऐसा ही एरिन के साथ भी हुआ. अपने से दुगने उम्र के बिज़नेसमैन से फंड या पार्टनरशिप के लिए बात करना, उनका महिला होना, कुछ ऐसी चुनौतियाँ थीं जिनसे उन्हें पार पाना था. शुरू-शुरू में उनकी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता था. लेकिन एरिन ने इन मुश्किलों से हार नहीं मानी और धीरे-धीरे इसमें आगे बढ़ने लगी. एरिन भारत समेत म्यांमार और युगांडा में भी काम करती हैं. उनकी संस्था, सुन्दर, मुंबई के पांच सितारा होटलों के बचे हुए साबुन को इकठ्ठा कर उसे रिसाइकिल करती है और नया साबुन बनाती है. भारत में उनके दो वर्कशॉप हैं...एक मुंबई में और दूसरा गुजरात-महाराष्ट्र बॉर्डर पर स्थित आश्ते में. इसके अलावा कुछ सोप और केमिकल कम्पनीज़ के साथ भी सुन्दर के कॉर्पोरेट पार्टनरशिप्स हैं. सुन्दरा के पास 6 फुल टाइम सोप रिसाइकलर्स हैं और बीस पार्ट टाइम हेल्थ टीचर्स हैं जो समुदायों को साबुन के इस्तेमाल और हाईजीन की दूसरी ज़रूरतों के बारे में बताते हैं. हर महीने करीब 4000 लोगों को इसका फायदा पहुँचता है. इन साबुनों को झुग्गियों और स्कूलों में बांटा जाता है. एरिन आज खुश हैं की उनके प्रयास से कुछ ज़रूरतमंद महिलाओं को रोज़गार के अवसर मिले हैं और बच्चों को सेहत।

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एरिन कहती हैं,

हम मुंबई में अपने काम का दायरा और बढ़ाना चाहते हैं. हमारी कोशिश है की हम आदिवासी इलाकों में भी साबुन को उन हाथों में पहुंचाए जहाँ इसकी ज़रूरत है. दिल्ली और बैंगलोर के होटलों से भी साबुन लेकर उन्हें रिसाइकिल करने की हमारी योजना है ताकि और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक साबुन पहुंचाकर, सेहतमंद रहने में उनकी मदद करें।
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सुंदर फाउंडेशन की कोशिशों ने साबुन को उन लोगों के हाथों में पहुँचाया है जो आर्थिक तंगी की वजह से साबुन इस्तेमाल नहीं करते थे और अनगिनत बिमारियों के शिकार होते रहते थे. वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन के मुताबिक हर साल करीब बीस लाख बच्चों की हाईजीन सम्बंधित बीमारियों के कारण मौत हो जाती है. ऐसे में सुन्दर फाउंडेशन की कोशिशें हजारों बच्चों की सेहत को बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

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