प्रयास, पराक्रम, प्रतिबद्धता से आयेगा पुलिस में सुधार: IPS अमिताभ यश

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अमिताभ यश

उत्तर प्रदेश को माफियाओं और दुर्दांत डकैतों के खौफ से मुक्ति दिलाने वाली, खौफनाक बीहड़ों को भी कानून-व्यवस्था की शक्ति से परिचित कराने वाली यूपी एसटीएफ ने अपने गठन के दो दशक पूर्ण कर लिये हैं। दो दशकों की यात्रा में अनेक पड़ाव आये जब एसटीएफ ने कानून के इकबाल को नई बुलंदियां अता कीं तो कभी निराशा के बादलों ने भी उसके उत्साह के सूरज को घेरा। यह यूपी एसटीएफ का ही पराक्रम था कि सूबे के लोगों ने कई बार जुर्म को कांपते और अपराधियों को समर्पण करते देखा। वह खाकी, जिसका जिक्र करते ही एक भ्रष्ट, असंवेदनशील, अक्षम और गैरजिम्मेदार शक्ल आम जनमानस के मन में उभरती है, उसे एसटीएफ ने प्रतिबद्ध, पेशेवर, पराक्रमी और परिणामदायक छवि प्रदान की। 


लेकिन अपराधों की बदलती प्रकृति और प्रवृति के मध्य क्या एसटीएफ अपनी साख बरकरार रख पायेगी? क्या अपराधियों से चार कदम आगे चलने के फलसफे को यूपी एसटीएफ हाइटेक होते अपराधियों के समक्ष भी लागू कर पायेगा। पेश है ऐसे प्रासंगिक और ज्वलन्त प्रणय विक्रम सिंहों और मसलों पर पुलिस महानिरीक्षक, एसटीएफ अमिताभ यश से वरिष्ठ पत्रकार प्रणय विक्रम सिंह की खास बातचीत के कुछ अंश...


प्रणय विक्रम सिंह: उत्तर प्रदेश पुलिस के पास तो पूर्व से ही विशाल तंत्र था, फिर एसटीएफ जैसी इकाई की स्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ गई? 

अमिताभ यश: दरअसल आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। नब्बे का दशक, जब भारत में आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार एकाएक तेज हुई तो उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में भी उछाल आया। परिणाम स्वरूप कैश और बैकिंग एक्टिविटीज भी अपने चरम पर थीं। यह वह वक्त था जब मोबाइल क्रांति ने व्यापार की सीमा को भी विस्तार दिया, तो वहीं अपराध और अपराधियों के दायरों को भी जिलों से होकर राज्यों में फैलने का अवसर मुहैया कराया। लूट, फिरौती और रंगदारी की रकम हजारों से लाखों और फिर करोड़ो तक पहुंच चुकी थी। अपहरण और सुपारी (कॉन्ट्रैक्ट किलिंग) के मामलों ने पुलिस प्रशासन के सामने कड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। खनन से लेकर ठेकेदारी तक, अपहरण से लेकर जमीन पर अवैध कब्जेदारी ने एक संस्थागत शक्ल अख्तियार कर ली थी। अपराध अपने नये स्वरूप, यानि संगठित अपराध की शक्ल में प्रकट हो चुका था। जिससे भिड़ पाना परम्परागत पुलिस के लिये मुश्किल हो रहा था। 


साल 1998 में यूपी एसटीएफ का गठन एक ऐसी फोर्स के तौर पर किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य संगठित अपराधों के खिलाफ संगठित तौर पर कार्रवाई करना था। और एसटीएफ का गठन कर एक ऐसी रणनीति विकसित करना था जो पुलिस को अपराधियों से चार कदम आगे रखे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि एसटीएफ के जरिए अंतर्राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय माफियाओं, अपराधिक गैंगों के प्रति ऐसी समझ और दृष्टिकोण विकसित करना जो जिला और थाना पुलिस के दायरे में रहकर संभव न हो। इन बातों को ध्यान में रखते हुए इस टीम को थाना और जिले की सीमाओं से परे रखते हुए पूरे उत्तर प्रदेश में स्पेशल ऑपरेशन के लिए अधिकृत किया गया। मुझे यह कहते हुये हर्ष हो रहा है कि एसटीएफ ने अपने गठन को सार्थकता प्रदान की है। 


प्रणय विक्रम सिंह- आज एसटीएफ के गठन को दो दशक व्यतीत हो चुके हैं। कैसे देखते हैं एसटीएफ की यात्रा को?

अमिताभ यश- किसी भी संस्थान के लिये बीस वर्ष कोई बहुत बड़ी समय राशि नहीं होती है। लेकिन मूल्यांकन तो पहले दिन से ही प्रारम्भ हो जाता है। मेरी दृष्टि से एसटीएफ की अभी तक की यात्रा अत्यंत प्रेरक और गौरवपूर्ण रही है। यूपी एसटीएफ ने अपने गठन के बाद से ही न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे भारतवर्ष में अपनी कार्यशैली के कारण विशेष स्थान प्राप्त किया है। यूपी एसटीएफ ने अपराधियों के जहन में ऐसा खौफ पैदा कर दिया है कि वह एसटीएफ के नाम सुनकर इलाका छोडऩे या अंडरग्राउंड होने में ही भलाई समझते हैं। यह यूपी एसटीएफ की सफलता का ही प्रतीक है कि प्रत्येक राज्य की पुलिस ने अपने स्तर पर स्पेशल पुलिस फोर्स का गठन किया जिनका नाम एसटीएफ की तर्ज पर रखा गया।


एसटीएफ ने माफियाओं, डकैतों को खत्म करने से लेकर दर्जनों आतंकियों को जेल भेजा, अनेक माफियाओं का एनकाउण्टर किया। दस्यू उन्मूलन अभियान में अनेक दस्यु सरगना या तो गिरफ्तार हुये या मुठभेड़ के दौरान मौत के घाट उतार दिये गये। किडनैपिंग के बड़े मामलों का खुलासा और साइबर क्राइम में लिप्त अपराधियों पर शिकंजा कसा गया। याद करिये 90 के दशक को देश के सबसे बड़े सूबे में माफियाओं और दुर्दांत डकैतों की फसल लहलहाया करती थी। हर शहर का एक दादा होता था, जिसका खौफ आम जन पर छाया रहता था। लेकिन एसटीएफ के उदय के बाद माफियाओं और डकैतों का दौर खत्म होने लगा। राजधानी लखनऊ और उसके आस-पास के जिलों में ही अनेक माफियाओं के नाम सुनाई पड़ते थे, अब वो नाम कहां हैं! यही हाल बीहड़ का भी हुआ। जिन दुर्दांत दस्युओं के नाम से कभी घाटी थर्राती थी, आज उनका दमन ही कानून के इकबाल को बुलंद कर रहा है। आम जनमानस के मन में कानून-व्यवस्था के प्रति सम्मान बढ़ रहा है। संक्षेप में कहें तो आज उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध जो नियंत्रित दिखाई पड़ रहा है, उसका बहुत बड़ा श्रेय यूपी एसटीएफ को जाता है।


प्रणय विक्रम सिंह-संगठित अपराध को कैसे परिभाषित किया जा सकता है। 

अमिताभ यश- प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक अथवा अन्य लाभों के लिये तीन या इससे अधिक व्यक्तियों का संगठित दल, जो गंभीर अपराध करने के लिये कुछ समय से एकजुट होते हैं, संगठित अपराध की श्रेणी में आता है। परंपरागत संगठित अपराधों में अवैध शराब का धंधा, अपहरण, जबरन वसूली, डकैती, लूट, ब्लैकमेल, माफिया आदि का व्यवसाय शामिल किया जाता है। गैर-पारंपरिक अथवा आधुनिक संगठित अपराधों में मनी लॉन्ड्रिंग, जाली नोटों का वितरण, हवाला कारोबार, साइबर अपराध, मानव तस्करी, हथियारों एवं मादक पदार्थों की तस्करी आदि को शामिल किया जाता है।


प्रणय विक्रम सिंह- दो दशकों में तो अपराध और अपराधियों की प्रकृति और प्रवृति में काफी अंतर आ गया है। क्या अपराध की इस बदलती प्रकृति के साथ एसटीएफ ने भी स्वयं में कोई बदलाव किया है। 

अमिताभ यश- एसटीएफ का मूल काम संगठित गिरोहों की गतिविधियों पर नजर रखना और कार्रवाई करना है। लेकिन, अब कई काम जैसे साइबर अपराध और ऑनलाइन धोखाधड़ी, असंगठित अपराधों की जांचें भी आ रही हैं। यही नहीं अदालतों से और चुनाव आयोग से मामले आ रहे हैं। सीबीआइ को भी हम सहयोग दे रहे हैं। ऐसे में चुनौतियां तो बढ़ी हैं। चुनौतियों से निपटने के लिये एसटीएफ अपनी टीम की दक्षता को अभिवर्धित करने पर ध्यान दे रही है। नियमित अंतराल पर प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित हो रहे हैं। एसटीएफ के आधुनीकीकरण की दिशा में भी तेजी से कार्य चल रहा है। चुनौतिया हैं तो रास्ते भी हैं।


प्रणय विक्रम सिंह- आपको लगता नहीं कि यूपी एसटीएफ को और अधिक मानव संसाधन की आवश्यकता है। 

अमिताभ यश- बिल्कुल आवश्यकता है। सरकार ने एसटीएफ की अनेक मांगों को स्वीकृत भी कर दिया है। लेकिन आवश्यकता की पूर्ति के लिये मानकों से समझौता नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिये यूपी एसटीएफ को अधिक कमाण्डो की आवश्यकता तो है किंतु उसकी पहली शर्त यह है कि कोई जवान एसटीएफ में स्वत: आना चाहता हो। उसके पश्चात हमारे कुछ मानक है उन पर वह खरा उतरता हो, तत्पश्चात आपेक्षित प्रशिक्षण की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। इस प्रकार अनेक चरणों से गुजरने के पश्चात वह एसटीएफ टीम के सदस्य बनता है और परिणाम देता है। लेकिन यह प्रक्रिया समय लेती है। 


प्रणय विक्रम सिंह: अपने सेवाकाल की कुछ विशेष उपलब्धियों को भी साझा करिये?  

अमिताभ यश: कोई भी गुडवर्क टीम भावना से ही सम्भव है। जब मैं बुन्देलखण्ड में था, तो मेरे अधीनस्थ काम करने वाली टीमों ने लगभग 18 गैंग का सफाया किया था और फिरौती हेतु अपहरण करने वाले लगभग 100 से ज्यादा अपराधियों को मार गिराया था। मेरे बतौर एसटीएफ, एसएसपी के सवा दो साल के कार्यकाल में 65 से ज्यादा अपराधियों का सफाया किया गया था। 21 जुलाई 2007 को चित्रकूट, बांदा में दहशत का पर्याय बने ददुआ का एनकाउन्टर, 04 अगस्त 2007 को चित्रकूट में ही ठोकिया का सफाया और 19 मार्च, 2008 को फतेहपुर में उमर केवट को मार गिराया गया था। उस बीच कुछ ऐसे भी विशेष कार्य थे जो पब्लिक में डिस्कस नहीं किया जा सकता। मैं ये दोबारा कहना चाहूंगा कि इन सभी गुडवर्क में सिर्फ मेरा नहीं बल्कि मेरे उच्चाधिकारियों के मार्गदर्शन के साथ ही मेरे अधीनस्थ कार्य करने वाली टीमों का बड़ा अहम् रोल रहा है।


प्रणय विक्रम सिंह: यूपी एसटीएफ, अमिताभ यश और एनकाउन्टर एक दूसरे के पूरक हैं। क्या एनकाउन्टर पुलिसिंग की अपरिहार्य आवश्यकता है? 

अमिताभ यश: बिल्कुल नहीं। कोई गिरोह या अपराधी लगातार संज्ञेय अपराधों को अंजाम दे रहा है, कानून-व्यवस्था के लिए प्रणय विक्रम सिंह बनता जा रहा है, तो स्वाभाविक रूप से पुलिस अपने दायित्व के अनुसार उसे पकडऩे, गिरफ्तार करने की कोशिश करेगी। इस कोशिश के दौरान अगर अपराधी हिंसक हो जाए, पुलिस पर हमलावर हो जाए तो विकल्प शून्यता की स्थिति में अपराधी को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को भी वैसी ही कार्यवाही करनी पड़ती है। उसमें कभी-कभी पुलिस कर्मियों को शहादत नसीब होती है तो कभी अपराधी गोली के शिकार बनते हैं। इसलिए एनकाउन्टर एक परिस्थितिजन्य कार्यवाही है। वह कोई नियोजित नहीं होती। चूंकि यह अन्तिम विकल्प होता है, इसलिए कतई अपरिहार्य नहीं।


प्रणय विक्रम सिंह- सूबे में दिनोंदिन खराब होती कानून-व्यवस्था की स्थिति के बारे में आपका क्या कहना है। 

अमिताभ यश- आप कैसे कह सकते हैं कि कानून-व्यवस्था की स्थिति दिनोंदिन खराब हो रही है? ज्यादा पीछे नहीं नब्बे के दशक से से से लेकर आज तक का ग्राफ देख लीजिये। डकैती विद मर्डर आये दिन की घटना होती थी। लेकिन आज तो वह हालात नहीं है। मुझे याद है कि लगभग एक दशक पहले तक प्रत्येक जनपद में कोई न कोई माफिया होता था लेकिन आज स्थिति नियंत्रण में है। अत: यदि आप समीक्षा करें तो पायेंगे कि अपराध का स्तर कम हो रहा है। 


प्रणय विक्रम सिंह-आपके कहने का अर्थ है कि पुलिस में सुधार की कोई आवश्यकता नहीं है?

अमिताभ यश- देखिये, सुधार तो सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। आप 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के स्मार्ट पुलिस के सपने से खुद को जोडिय़े, उसके हर अक्षर में पुलिस में सुधार का एक संदेश छुपा है। SMART यानी ऐसी पुलिस व्यवस्था जो कड़क लेकिन सम्वेदनशील (Sensitive), आधुनिक (Modern), सतर्क और जिम्मेदार (Alert and Accountable) विश्वसनीय (Reliable), तकनीकी क्षमता युक्त एवं प्रशिक्षित (Techno-savy and Trained) हो। उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में हर स्तर पर सुधार की दरकार है। पुलिसिंग के तरीके में सुधार की जरूरत है, हमारे सभी कर्मचारियों की व्यावसायिक दक्षता को बढ़ाना अत्यन्त आवश्यक है। उनको उनके काम के बारे में सही जानकारी देना, बदलते परिवेश में उनको काम, व्यवहार करने का तरीका, आदि के बारे में जानकारी की आवश्यकता है। पुलिसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर में भी सुधार की जरूरत है। अत्याधुनिक हथियारों से लेकर तकनीकी दक्षता में अभिवर्धन समय की मांग है। जिस प्रकार आन्तरिक सुरक्षा के क्षेत्र में विदेशी हस्तक्षेप के साक्ष्य मिल रहे हैं, उस लिहाज से पुलिस का आधुनिकीकरण अपरिहार्य आवश्यकता है। यह भी सुधार का ही क्रम होगा। कह सकते हैं कि प्रयास, पराक्रम, प्रतिबद्धता की से आयेगा पुलिस में सुधार।


प्रणय विक्रम सिंह- कैसे बनेगी यूपी पुलिस SMART पुलिस ? 

अमिताभ यश- मोटीवेशन से। दरअसल पुलिसिंग की सम्पूर्ण विधा ही मोटीवेशन पर आधारित है। जितना उम्दा मोटीवेशन होगा उसके उतने ही सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे और सकारात्मक परिणाम देने वाली टीम का लीडर उत्कृष्ट टीम लीडर के रूप में जाना जायेगा। अपने सहकर्मियों और मातहतों की क्षमता को पहचान कर उन्हें उनकी रुचि का कार्य सौंपना साथ ही क्षमता अभिवर्धन के लिए प्रेरित और संसाधन उपलब्ध कराना भी टीम लीडर के दायित्व के दायरे में आता है। दरअसल मोटिवेशन कोई प्रबन्धकीय शब्दकोष का शब्द मात्र न होकर एक पूरा दर्शन है। यह मोटिवेशन ही था जिसने एक सामान्य से युवक को एकलव्य और चंद्रगुप्त बना दिया। रात के घुप अंधेरे में, जंगल के सन्नाटे में भी दुश्मन के खिलाफ मृत्यु से साक्षात्कार करता सैनिक अभिप्रेरित नहीं तो और क्या होता है। एसटीएफ में मैंने तजुर्बा करके देखा है कि एक छोटी सी टीम कैसे सूबे के कुख्यात अपराधियों को इलाका छोडऩे, आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर देती है। कहने का अभिप्राय यह है कि संकल्प का होना आवश्यक है और संकल्पित होने के लिए मोटिवेशन बेहद जरूरी है। और यह तय है जब अपराधी थर-थर कापेंगे तो आम जन के भाव जागेंगे। शायद वही स्थिति सुशासन की दिशा में बड़ा कदम होगा। 


प्रणय विक्रम सिंह-आपके अनुसार कानून व्यवस्था बरकरार रखने के लिए रणनीति के क्या आयाम होने चाहिए?

अमिताभ यश- अपराध और अपराधी से निपटने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम को अंजाम देना चाहिए। मेरा मानना है कि अपराध रोकने के लिए पुलिस के तीन काम होते हैं। सबसे पहले ऑपरेशन, दूसरा इन्वेस्टिगेशन और तीसरा रिकार्ड मेन्टिनेन्स। इन तीनों पर गम्भीरता से कार्य करने की बहुत जरूरत है। पहला ऑपरेशन बेसिकली अपराधी को पकडऩा अपराधी की पहचान करना, इन्वेस्टिगेशन यानी जो विवेचनाएं हैं उनको जल्द से जल्द पूरा कराना, अच्छी विवेचना करना यानी साक्ष्य संकलन अच्छा कराना, दोषियों पर चार्जशीट लगाना, निर्दोषों को बरी करना और उसके बाद सफल प्रोसिक्यूशन कराना। अगर विवेचना सही प्रारूप में की जाती है तो किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिलेगी। ये एक ऐसा फील्ड है जिसमे यूपी पुलिस बहुत पीछे है। जिस पर खासतौर से ध्यान देने की आवश्यकता है। इसके बाद रिकार्ड मेंटनेंस यानी अपराधियों की पूरी जानकारी रखना, उन पर समय-समय पर कार्यवाही करना। अगर हर अपराधी का रिकार्ड होगा तो अपराधी की पहचान करना और उसे पकडऩा आसान हो जाएगा। क्षेत्र में पूर्व में घटित हुए अपराधों और विवादों पर पुलिस की पैनी नजर होनी चाहिए। 


प्रणय विक्रम सिंह- 21वीं सदी में जहां पशुओं और कैदियों के अधिकारों के लिये मुखर बहस चल रही हो, उस कालखंड में एसटीएफ जैसी इकाई की क्या आवश्यकता है? 

अमिताभ यश- समाज मुखर हो कर अपनी बात कह सके, उसकी आवाज को किसी माफिया का खौफ दबा न सके, किसी दस्यु का भय उसके विचारों की हत्या न कर सके, कोई शातिर बदमाश उसके अधिकारों का अपहरण न कर ले, इसलिये एसटीएफ जैसे पुलिस बल की आवश्यकता होती है। लिहाजा 21वीं सदी में भी संगठित अपराधी, माफिया, दस्यु सरगना लोकतंत्र को लहुलुहान न कर सके इसलिये एसटीएफ जैसे पुलिस बल की प्रासंगिकता और आवश्यकता बढ़ जाती है। 


प्रणय विक्रम सिंह- अपने मातहत कर्मचारियों को और युवाओं को क्या सन्देश देना चाहेंगे?

अमिताभ यश- मै योर स्टोरी के माध्यम से अपने साथियों, मातहत कर्मचारियों से कहना चाहूंगा कि अपने पदेन दायित्वों के निर्वहन में कोई शिथिलता न बरतें। परमात्मा के पश्चात आम जन सबसे अधिक पुलिस को ही पुकारता है अत: पुलिसिंग को सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि एक संकल्प माने। नागरिकों से मैं कहना चाहूंगा कि पुलिस आपके सहयोग के लिए है और पुलिस विभाग बिना अवाम के सहयोग के नहीं चल पाएगा तो अवाम जितना सहयोग देगी पुलिस विभाग उतनी ही तत्परता से उनकी सेवा के लिए हाजिर रहेगा। आम जन के सहयोग और विश्वास ही पुलिस के लिए मोटीवेशन है।  


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