मिलें हेल्थकेयर स्टार्टअप की फ़ाउंडर गीता मंजुनाथ से, जो रह चुकी हैं देश का पहला सुपर-कंप्यूटर बनाने वाली टीम का अहम हिस्सा

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आज हम आपको एक ऐसी महिला से मिलवाने जा रहे हैं, जिन्होंने उस वक़्त तकनीक के क्षेत्र में अपना अलग नाम बनाया, जब इस क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी न के बराबर थी। हम बात कर रहे हैं गीता मंजुनाथ की, जिन्होंने भारत के पहले सुपर-कंप्यूटर प्रोजेक्ट में काम किया था और अब वह ‘निरामई’ नाम से अपना हेल्थकेयर स्टार्टअप चला रही हैं, जो एआई तकनीक की मदद से ब्रेस्ट कैंसर का शुरुआती स्तर पर पता लगाता है और आगे के इलाज के लिए सही दिशा तय करने में भी मदद करता है।

 

‘निरामई’ हेल्थकेयर स्टार्टअप एआई तकनीक का इस्तेमाल करके शुरुआती स्टेज में ही ब्रेस्ट कैंसर का पता लगा लेता है और इस जांच के लिए किसी भी तरह की हानि न पहुंचाने वालीं, रेडिएशन फ़्री और दर्दरहित तरीक़ों का इस्तेमाल किया जाता है। कंपनी ने भारत के 10 शहरों में स्थित अस्पतालों और जांच केंद्रों में 30 से ज़्यादा सेटअप इन्सटॉल किए हैं। 


गीता

गीता मंजुनाथ



इंजीनियरिंग की तरफ़ गीता का रुझान हमेशा से ही रहा है। पुराने दिनों को याद करते हुए गीता बताती हैं कि उनके पिता पेशेवर इंजीनियर नहीं थे, लेकिन उनका दिमाग़ इंजीनियरों जैसा ही चलता था और उन्हें शौक़ था घर की ख़राब हो चुकीं चीज़ों की मरम्मत करना। गीता कहती हैं कि उनके पिता उन्हें भी इसके लिए प्रेरित किया करते थे। 1984 में उन्होंने ग्रैजुएशन में दाखिला लिया। वह अपने समय की स्टेट टॉपर थीं और उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने का फ़ैसला लिया। वह अपने कॉलेज के सबसे शुरुआती कंप्यूटर साइंस के बैचों में से एक में पढ़ती थीं। गीता हमेशा से ही कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करना चाहती थीं।


कंप्यूटर के साथ अपनी मुलाकात के बारे में बताते हुए वह कहती हैं, "मैं एक प्रदर्शनी में गई थी, जहां पर मैंने पहली बार कंप्यूटर देखा। हमारे घरों में कंप्यटूर नहीं थे और मैंने पहली बार वहीं आधे घंटे तक कंप्यूटर चलाया। मैंने देखा कि एक कंप्यूटर पूरे एक कमरे जितना बड़ा है। मैं कंप्यूटरों के बारे में ज़्यादा नहीं जानती थी, लेकिन मैं उनके बारे में जानना चाहती थी। "


गीता 18 साल की थीं, जब कॉमन एंट्रेस टेस्ट में मेडिकल में उनकी 15वीं और इंजीनियरिंग में कर्नाटक में 12वीं रैंक आई। उनके सामने इंजीनियरिंग और मेडिकल, दोनों ही स्ट्रीम्स में जाने के विकल्प थे। रोचक बात यह है कि निरामई स्टार्टअप के ज़रिए, वह दोनों ही क्षेत्रों के लिए एक साथ काम कर रही हैं। 


हालांकि एंट्रेन्स एग्ज़ाम के बाद, गीता ने अपने पिता की सलाह पर अपने मन की बात सुनते हुए इंजीनियरिंग को चुना। उन्होंने अपने कोर्स में टॉप किया और राज्य सरकार की ओर से उन्हें गोल्ड मेडल भी दिया गया। अपने अंतिम वर्ष की पढ़ाई के दौरान, उन्होंने आईआईएससी में एक प्रोजेक्ट में काम किया, जिसके अंतर्गत फ़ोर-नोड पैरलल कंप्यूटर तैयार करने थे। इस प्रोजेक्ट के बाद गीता ने रिसर्च के क्षेत्र में ही आगे बढ़ने का फ़ैसला लिया। पोस्ट ग्रैजुएशन पूरा होने के बाद उन्हें सीडीएसी में काम करने का मौक़ा मिला और उन्होंने इस अवसर को स्वीकार किया। 




गीता बताती हैं, "सीडीएसी के साथ जुड़ने के बाद मुझे भारत के पहले सुपरकम्प्यूटर प्रोजेक्ट से जुड़ने का मौक़ा मिला। मैंने जो कोड वहां पर तैयार किया था, उसका इस्तेमाल आज भी हो रहा है। इस प्रोजेक्ट के बाद, मैं एचपी लैब्स के साथ जुड़ गई, जो उस समय एक नया रिसर्च सेंटर बना रहा था।" गीता मानती हैं कि इस सेंटर को स्थापित करने का मकसद था, दुनिया को यह बताना कि भारतीय भी रिसर्च कर सकते हैं। 


गीता बताती हैं कि उन्हें भी कहीं न कहीं लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। वह बताती हैं, "जब भी कोई पुरुष अपना प्रेजेंटेशन देता था तो उसे अपनी बात को साबित करने के लिए ज़्यादा सबूत या किसी बैकअप की ज़रूरत नहीं होती थी, जबकि महिलाओं के साथ ऐसा नहीं था। अपने शुरुआती प्रोजेक्ट्स में मैं अक्सर अपनी टीम में अकेली महिला हुआ करती थी। मैं बहुत पहले ही इस बात को समझ गई थी, मुझे अपने आप को साबित करने के लिए दोगुनी मेहनत करनी होगी।" गीता इस सबक को अपने लिए अच्छा मानती हैं कि और कहती हैं कि इस नज़रिए और आदत ने उन्हें अपने काम को पुख़्ता ढंग से करना सिखाया। 


एचपी लैब्स के साथ अपने कार्यकाल के दौरान ही गीता ने एआई और मशीन लर्निंग की तकनीकों पर काम करना शुरू किया था। गीता का कहना है कि वह उस समय ही समझ गई थीं कि आने वाला वक़्त इन तकनीकों का होने वाला है। इसके बाद गीता को आईआईएससी में एआई में पीएचडी करने का मौक़ा मिला, जिसे गीता ने भलीभांति भुनाया। 




गीता जब आईआईएससी, बेंगलुरु में आर्टफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग (एमएल) में पीएचडी करने के लिए गईं, उस वक़्त तक उनके पास कम्यूटर सिस्टम्स से जुड़े रिसर्च और अन्य क्षेत्रों में 17 सालों का लंबा अनुभव था। इतने सालों बाद पढ़ाई शुरू करने के संबंध में अनुभव को याद करते हुए गीता कहती हैं कि वह अपने क्लास में सबसे ज़्यादा उम्र वाली स्टूडेंट थीं। 


वक़्त आगे बढ़ा और गीता को ज़ेरॉक्स लैब्स के साथ काम करने का अवसर मिला। यहां पर ही उन्हें हेल्थकेयर में एआई तकनीक के इस्तेमाल का ख़्याल आया। गीता बताती हैं कि इस दौरान ही उनके एक रिश्तेदार को ब्रेस्ट कैंसर का पता चला। इतना ही नहीं, कुछ महीनों बाद ही उन्हें ख़बर मिली कि उनके पति के एक रिश्तेदार को भी ब्रेस्ट कैंसर हो गया है। गीता बताती हैं कि दोनों ही पीड़ित महिलाएं 45 साल से कम उम्र की थीं। इसके बाद गीता ने ब्रेस्ट कैंसर का समय पर पता लगाने और उसके इलाज के बारे में वैश्विक परिदृश्य को समझना शुरू किया। उन्होंने पाया कि ज़्यादातर मामलों में कैंसर का पता आख़िरी स्टेज में चला। इसके बाद ही उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि एआई के माध्यम से थर्मोग्राफ़ी के ज़रिए ब्रेस्ट कैंसर का आसानी से और समय पर पता लगाया जा सकता है। इस आइडिया के बाद ही निरामई स्टार्टअप की आगे की राह तय हुई।


आज की तारीख़ में, निरामई लगभग 7 मिलियन डॉलर्स की फ़ंडिंग जुटा चुका है। कंपनी के पास यूएस के 9 और कनाडा का 1 पेटेंट है। निरामई, ग्लोबल बिज़नेस डेटा इंटेलिजेंस प्लेटफ़ॉर्म सीबी इनसाइट्स द्वारा जारी होने वाली दुनिया के 100 सर्वश्रेष्ठ एआई स्टार्टअप्स -2019 की सूची में शामिल होने वाला इकलौता भारतीय स्टार्टअप है। कंपनी बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन के सहयोग से रिवर ब्लाइंडनेस का पता लगाने के एक उपयुक्त सॉल्यूशन खोज निकालने पर भी काम कर रही है। 

तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ने का जुनून रखने वाली महिलाओं को गीता का संदेश है कि वे अपने आइडिया पर भरोसा रखें और आगे बढ़ती रहें। उनका कहना है कि महिलाओं को आलोचनाओं से ख़ुद के इरादों को मज़बूती देनी चाहिए।



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