चार भाई-बहनों ने सिविल सर्विस में सफलता हासिल कर पेश की मिसाल

By जय प्रकाश जय
February 13, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:31:24 GMT+0000
चार भाई-बहनों ने सिविल सर्विस में सफलता हासिल कर पेश की मिसाल
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चारों भाई बहन


हमारे देश में एक ओर जहां लाखों, करोड़ों पढ़े-लिखे युवा मामूली नौकरी के लिए दर-दर की खाक छान रहे हैं, ऐसे में एक ही परिवार के चारो भाई-बहनों का आईएएस-आईपीएस सेलेक्ट हो जाना किसी चमत्कार से कम नहीं। ये चारो कामयाब संतानें प्रतापगढ़ (उ.प्र.) के गांव लालगंज निवासी अनिल मिश्रा की हैं।


देश में ऐसे कई ऐसे गांव हैं, जहां के कई लोग आईएएस, आईपीएस अथवा अन्य तरह की उच्च प्रशासनिक सेवाओं में हैं, लेकिन जब एक माता-पिता की सभी संतानें भारतीय प्रशासनिक सेवा में आईएएस-आईपीएस हो जाएं, फिर तो वह पूरे देश के लिए मिसाल बन जाती हैं। ऐसा ही एक परिवार प्रतापगढ़ (उ.प्र.) के गांव लालगंज का है। यहां के एक भाई और दो बहनें तो एक ही साल में आईएएस-आईपीएस बन गईं। अपने बड़ों की राह पर चलते हुए चौथे भाई का भी आईएएस में सेलेक्शन हो गया। 


वैसे भी आज के दौर में घर की माली हालत दयनीय होने के बावजूद पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी न मिल पाना किसी युवा के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। यदि ऐसे किसी युवा का सिविल सेवा में सेलेक्शन तो घर-परिवार के लिए आकाश से तारे तोड़ लाने से कम नहीं होता है। उत्तर प्रदेश के ही जौनपुर जिले में एक गांव है माधो पट्टी, जहां के कुल पचहत्तर परिवारों में से हर घर में कोई न कोई, पीसीएस, आईएएस है। इसी गांव के पहले पीसीएस अफसर बने थे जाने-माने कवि वामिक जौनपुरिया के पिता मुस्तफा हुसैन। इसी गांव के इंदु प्रकाश कई देशों में भारत के राजदूत रहे। इसी तरह बरेली के चंद्रसेन सागर की तीनों बेटियां आईएएस हैं। 


लालगंज के अनिल मिश्रा की एक ही कामना थी कि उनके चारों बच्चे अपनी ज़िन्दगी में बड़ी से बड़ी सफलता हासिल कर उनका नाम रौशन करें। उनकी चार संतानों में सबसे बड़े हैं योगेश मिश्रा। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हो गए। उन दिनों उनकी दो बहनें भी दिल्ली में रहकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। रक्षाबंधन के एक दिन पहले दोनों के एग्जाम का रिजल्ट आया और वे फेल हो गईं। जब योगेश मिश्रा राखी बंधवाने के लिए बहनों के पास गए तो अनुत्तीर्ण हो जाने के कारण दोनों उदास बैठी थीं। देखकर योगेश का भी मन भारी हो गया। उस दिन तो वह बहनों का हौसला आफजाई कर लौट आएं लेकिन शांत नहीं बैठे, उन्होंने स्वयं संकल्प लिया कि पहले खुद आईएएएस बनेंगे, इसके बाद अपने भाई-बहनों को बनाएंगे।


योगेश मिश्रा ने अपने गांव से ही 12वीं तक की पढ़ाई की थी। उसके बाद वह मोती लाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान से बीटेक करने के लिए इलाहाबाद चले गए। वहीं सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जॉब मिल गई और नोएडा में उन्होंने नौकरी ज्वॉइन कर ली। वर्ष 2013 की बात है, उन्होंने पहले ही प्रयास में आईएएस की परीक्षा निकाल ली। वह इस समय कोलकाता में राष्ट्रीय तोप एवं गोला निर्माण में प्रशासनिक अधिकारी हैं। 


योगेश मिश्रा के बाद उनकी छोटी बहन क्षमा ने गांव में रह कर एमए तक की पढ़ाई की। उसके बाद 2006 में उनकी शादी पड़ोसी गांव के सुधीर से हो गई, जो उत्तराखंड में जिला आपूर्ति अधिकारी हैं। उन्होंने पत्नी को आगे की पढ़ाई जारी रखी। क्षमा का भी आईपीएस में सिलेक्शन हो गया। अनिल मिश्रा दूसरी बेटी माधवी लालगंज से ही ग्रैजुएशन करने के बाद इकोनॉमिक्स से पोस्ट ग्रैजुएशन करने के लिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी चली गईं। वहां पढ़ाई पूरी होने के बाद वह जेएनयू से रिसर्च करने के लिए दिल्ली में रहने लगीं। वर्ष 2016 में उनका भी आईएएस में सि‍लेक्शन हो गया। अब रह गए सबसे छोटे बेटे लोकेश मिश्रा।


उन्होंने ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से कैमिकल में इंजीनयरिंग करने के बाद राजस्थान के कोटा में एक फर्टिलाइजर कंपनी में नौकरी कर ली। वह भी 2015 में पीसीएस क्वालीफाई कर बीडीओ बन गए। उन्होंने बाद में सिविल सेवा की परीक्षा दी और वर्ष 2016 में ही वह भी आईएएस बन गए। ये चारो भाई –बहन आपस में एक दो साल ही छोटे बड़े हैं। माधवी बताती हैं कि उनके बड़े भाई हमेशा से हम भाई-बहनों को एक साथ ले कर चलने वालों में से हैं। हम दो कमरों के मकान में रहते थे, जब कोई मेहमान आ जाता था तो सबसे ज्यादा हमारी पढ़ाई ही डिस्टर्ब होती थी लेकिन भइया उसे भी मैनेज करते थे। उन्होंने हमेशा हम सभी भाई, बहनों को आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।


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