'पंजाब केसरी' लाला लाजपत राय जिन्होंने भारत को ऊधमसिंह और भगतसिंह दिए

By Prerna Bhardwaj
November 17, 2022, Updated on : Thu Nov 17 2022 05:25:15 GMT+0000
'पंजाब केसरी' लाला लाजपत राय जिन्होंने भारत को ऊधमसिंह और भगतसिंह दिए
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लाला लाजपत राय की असामयिक मृत्यु ने ग़ुलाम भारत को कितने ही ऊधमसिंह और भगतसिंह दिए, जो देश की आज़ादी के लिए हंसते-हंसते कुर्बान हुए.


साल 1928 में साइमन कमीशन के खिलाफ एक मौन विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपत राय पर पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट के आदेश पर बेरहमी से लाठीचार्ज किया गया. विरोध कर रहे युवाओं को बेरहमी से पीटा गया. लाला लाजपत राय को सर पर चोट लगी, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हुए और कुछ ही हफ्तों बाद 17 नवम्बर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई.


उनकी असामयिक मृत्यु से पूरा देश स्तब्ध था. नौजवानों उत्तेजित हो उठे. चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने का निर्णय किया. इस घटना के एक महीने बाद, 17 दिसंबर, 1928 को, ब्रिटिश पुलिस अफ़सर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया. लालाजी की मौत के बदले सांडर्स की हत्या के मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी. लाला लाजपत राय खासकर युवाओं क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत रहे.


पंजाब के मोगा जिले के दुधिके में 28 जनवरी 1865 जन्में लाला लाजपत राय राय स्वतन्त्रता संग्राम में पूरे पंजाब के प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख क्रांतिकारी थे, जिसके कारण उन्हें 'पंजाब केसरी' (Punjab Kesari) और 'पंजाब का शेर' (Lion of Punjab) की उपाधि मिली हुई थी. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ‘गरम दल’ के तीन प्रमुख नेताओं ‘लाल-बाल-पाल’ में से एक थे. लाला लाजपत राय ने ‘पंजाब नेशनल बैंक’ से लेकर ‘कांगड़ा वैली रिलीफ कमेटी,’ ‘सर्वेट आफ पीपल सोसायटी’ तक 18 आर्गेनाइजेशन को स्थापित किया जिनमें से आज भी कई संस्थाएं समाज विकास और उन्नति के लिए काम कर रही हैं.


लाला लाजपत राय ने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से कानून की पढ़ाई की थी. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने छोटे से वकील के रूप में अपने मूल निवास स्थल जगरांव में ही वकालत की शुरुआत की. क़स्बा छोटा होने के कारण वह रोहतक गए. रोहतक से वे हिसार आए. एक सफल वकील के रूप में 1892 तक वे यहीं रहे और इसी वर्ष लाहौर आए. यहां वे स्वामी दयानंद सरस्वती के सम्पर्क में आए और आगे चलकर आर्य समाज के प्रबल समर्थक बने. स्वामी दयानंद की मृत्यु के बाद आर्य समाज के कार्यों को पूरा करने के लिए राय ने खुद को समर्पित कर दिया था. हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष, प्राचीन और आधुनिक शिक्षा पद्धति में समन्वय, हिन्दी भाषा की श्रेष्ठता और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए लड़ाई ऐसे कार्य कर आर्य समाज को पंजाब में लोकप्रिय बनाया. राय का राजनीतिक दर्शन दयानानद सरस्के दर्शन से बहुत हद तक प्रभावित रहा.


लाहौर अधिवेशन 1893 में लाला लाजपत राय का परिचय गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक से हुई जो आगे चलकर बहुत घनिष्ट मित्रता में परिवर्तित हो गई. 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध स्वरूप ‘लाल-बाल-पाल’ की तिकड़ी वाले नेतृत्व का उद्भव हुआ. 1907 के सूरत के प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन में लाला लाजपत राय ने अपने सहयोगियों के द्वारा राजनीति में गरम दल की विचारधारा का सूत्रपात कर दिया था और जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गये थे कि केवल प्रस्ताव पास करने और गिड़गिड़ाने से स्वतंत्रता मिलने वाली नहीं है. विचारधारा और कार्यप्रणाली के अंतर्विरोध के आधार पर कांग्रेस का विभाजन दो दलों- नरम दल और गरम दल, के रूप में हुआ. नरम दल का नेतृत्व दादाभाई नैरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले और फ़िरोज़ शाह मेहता द्वारा किया गया, वहीँ गरम दल का नेतृत्व अरविन्द घोष, विपिन चन्द्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय द्वारा किया गया.


राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लेने के कारण उन्हें वर्ष 1907 में बर्मा भेज दिया गया था, लेकिन पर्याप्त सबूतों के अभाव में कुछ महीनों बाद वे वापस लौट आए.


1913 में राय कांग्रेस के शिष्टमंडल के साथ यूरोप की यात्रा पर गए, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो जाने की वजह से उन्हें 5 साल तक विदेश में निर्वासित जीवन जीना पडा.


20 फ़रवरी, 1920 को जब लाला लाजपत राय इंग्लैंड से स्वदेश लौटे तो अमृतसर में ‘जलियांवाला बाग़ हत्या काण्ड’ हो चुका था और सारा राष्ट्र ग़मगीन था. रॉलेक्ट एक्ट के विरोध में गांधी ने ‘असहयोग आन्दोलन’ छेड़ रखा था. राय ने पंजाब में असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण 1921 में इन्हें जेल की सज़ा हुई.  इसके बाद राय ने ‘लोक सेवक संघ’ की स्थापना की. उनके नेतृत्व में यह आंदोलन पंजाब में जंगल की आग की तरह फैल गया और जल्द ही वे ‘पंजाब का शेर,’ ‘पंजाब केसरी’ जैसे नामों से पुकारे जाने लगे.


जेल से छूटने के तुरंत बाद वे फिर से राजनीति में सक्रिय हो उठे.


1924 में लालाजी कांग्रेस के अन्तर्गत ही बनी ‘स्वराज्य पार्टी’ में शामिल हो गये और ‘केन्द्रीय धारा सभा’ के सदस्य चुन लिए गए.


1925 में उन्हें हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन का सभापति बनाया गया. 1928 में जब साइमन के बहिष्कार की योजना बनाई गई तो राय ने एक्ट के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया और अंततः 17 नवम्बर 1928 को पुलिस बर्बरता के शिकार हुए.


लाजपत राय ने अपने राजनीतिक कार्यों के दौरान कई राजनीतिक पत्रिकाएँ चलाएँ और कई किताब भी लिखा. ‘तरुण भारत’ नामक  उनकी किताब को ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था. उन्होंने ‘भारत का इंग्लैंड पर ऋण’, ‘भारत के लिए आत्मनिर्णय’ किताबें लिखीं, जो यूरोप की प्रमुख भाषाओं में अनुदित हो चुकी हैं. उन्होंने ‘यंग इंण्डिया’ नामक मासिक पत्र भी निकाला. अपने चार साल के प्रवास काल में उन्होंने ‘इंडियन इन्फ़ॉर्मेशन’ और ‘इंडियन होमरूल’ दो संस्थाएं सक्रियता से चलाईं.