मध्‍य प्रदेश के एक छोटे से गांव की यह लड़की मोटर मैकेनिक का काम करती है

भाई को मशीनों से प्‍यार था. भाई के बेहद करीब इंद्रावती को भी मशीनों से प्‍यार हो गया. जब एक रोड एक्‍सीडेंट में भाई की मौत हो गई तो भाई के शौक को इंद्रावती ने अपना प्रोफेशन बनाने की ठान ली. आज वह ट्रेंड मैकेनिक हैं.

मध्‍य प्रदेश के एक छोटे से गांव की यह लड़की मोटर मैकेनिक का काम करती है

Wednesday June 15, 2022,

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ये कहानी है उस लड़की की, जो मध्‍य प्रदेश के छोटे से गांव में  मोटर मैकेनिक का काम करती है.

मोटर, गाड़ी बाइक, मैकेनिक, ये शब्‍द सुनते ही मन में सहज ही किसी पुरुष का ख्‍याल आता है. मोटर मैकेनिक से तो हर किसी का पाला पड़ता है, लेकिन कितनी बार कितने लोगों की गाड़ी किसी महिला मोटर मैकेनिक ने ठीक की. ये ऐसी बात नहीं, जो रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई और सुनाई देती हो.

लेकिन 26 साल की इंद्रावती वरकाडे गांव में रहती हैं. माता-पिता मजदूरी करते हैं. वो साइंस ग्रेजुएट हैं और मोटर मैकेनिक का काम करती हैं.   

इंद्रावती का जन्‍म मध्‍यप्रदेश के मंडला जिले के एक छोटे से गांव में हुआ. माता-पिता मजदूरी करते थे. घर में एक बड़ा भाई था, जिसके साथ इंद्रावती का गहरा लगाव था. भाई को बाइक और मशीनों से प्‍यार था. पता ही नहीं चला कि कब भाई के साथ रहते-रहते इंद्रावती का भी मशीनों के साथ एक रिश्‍ता जुड़ गया.

भाई को देखकर वह भी मशीनों से बात करने लगी

भाई पेशे से मोटर मैकेनिक तो नहीं था, लेकिन मशीनों से बात करता था. उनकी जुबान समझता था. अपना ज्‍यादातर वक्‍त भाई के साथ बिताने वाली इंद्रावती भी धीरे-धीरे मशीनों से बात करने लगी. गाड़ी के एक-एक कलपुर्जे के काम और जरूरत को समझने लगी. लेकिन अभी भी यह समझ ऐसी नहीं थी कि वो रिंच, पाना और दूसरे औजार लेकर खराब गाड़ी को ठीक कर दे. मशीनें इंद्रावती को पसंद जरूर थीं, पर उसने सोचा नहीं था कि एक दिन इन मशीनों को ठीक करना ही उसका प्रोफेशन बन जाएगा.

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भाई की मौत और परिवार की जिम्‍मेदारी

एक रोड एक्‍सीडेंट में इंद्रावती के भाई की मौत हो गई. परिवार बहुत गरीब था. माता-पिता मजदूरी करते थे. भाई ने ही पूरे परिवार की जिम्‍मेदारी संभाली हुई थी. अब भाई के न रहने पर अचानक सारी जिम्‍मेदारी इंद्रावती के नाजुक कंधों पर आ पड़ी.

इस जिम्‍मेदारी को निभाने के लिए इंद्रावती ने भाई के पैशन को अपना प्रोफेशन बनाने की ठान ली. हालांकि उस सदमे से उबरने और खुद को फिर से खड़ा करने में 3 साल लग गए.

जब भाई की मौत हुई तो इंद्रावती पढ़ाई कर रही थीं. वह अपने गांव की अकेली लड़की हैं, जो साइंस ग्रेजुएट है. 2018 में इंद्रावती ने भोपाल की भोज ओपन यूनिवर्सिटी से केमिस्‍ट्री, जूलॉजी और बॉटनी विषय लेकर बीएससी की. सबसे ज्‍यादा अंक बॉटनी में मिले. कुल 690 में से 366.

जब एक एनजीओ ने बढ़ाया मदद का हाथ

इंद्रावती मशीनों को समझती थी, विज्ञान की पढ़ाई की थी, लेकिन‍ फिर भी अभी उसमें इतनी काबिलियत नहीं थी कि वो मोटर मैकेनिक के काम में हाथ आजमा सके. उसके लिए तो बाकायदा ट्रेनिंग की जरूरत थी. यहीं उसकी जान-पहचान एक एनजीओ प्रदान से हुई. जिसने इंद्रावती की जिंदगी बदल की. प्रदान एनजीओ गांव के अंडर प्रिविलेज्‍ड युवाओं को उनकी रुचि और काबिलियत के अनुसार अलग-अलग तरह स्किल ट्रेनिंग देता है. उनका एक युवा शस्‍त्र प्रोग्राम है, जिसके तहत युवाओं को प्रशिक्षित किया जाता है.

मशीनों में इंद्रावती की रुचि, झुकाव, समझ को देखते हुए उन्‍होंने उसे मोटर मैकेनिक की ट्रेनिंग देने का फैसला किया. इंद्रावती कहती हैं, “मुझे पहले से मशीनों की समझ थी. मैं भी ये काम करना चाहती थी, लेकिन इसके लिए मुझे ट्रेनिंग की जरूरत थी. वो ट्रेनिंग हासिल करने में प्रदान ने मेरी मदद की.”

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पहली ट्रेनिंग और पहली नौकरी

प्रदान ने इंद्रावती को छह महीने मोटर मैकेनिक काम की ट्रेनिंग दिलवाई. ट्रेनिंग के बाद पहली नौकरी लगी जबलपुर के एक टू व्‍हीलर के शोरूम में. वहां उन्‍होंने बतौर बाइक मैकेनिक काम किया. उनकी पहली तंख्‍वाह 8000 रु. थी. पैंट और टीशर्ट में औसत कद-काठी और गोल चेहरे वाली वह लड़की दनादन अपने रिंच, पाने और हथौड़े से बाइक का पुर्जा-पुर्जा अलग कर देती और उतनी ही फुर्ती से उसे जोड़ भी देती. ठप्‍प पड़ी गाड़ी पलक-झपकते स्‍टार्ट हो जाती. इंद्रावती अपने काम से खुश थी. वह कहती हैं, “लेकिन घर पर बूढ़े मां-बाप अकेले थे, जिम्‍मेदारियां थीं तो जबलपुर की नौकरी छोड़ गांव लौटना पड़ा.”

इस देश में एक लड़की का मोटर मैकेनिक होना

एक लड़की के लिए मोटर मैकेनिक होना कितना आसान  है? जवाब में वह कहती हैं, “आसान तो नहीं है. लोग तरह-तरह के सवाल करते हैं. मेरे पिताजी भी पहले इसके लिए राजी नहीं थे. लड़की मैकेनिक बनेगी, गाड़ी ठीक करेगी, गांव से इतनी दूर जाकर ट्रेनिंग लेगी, नौकरी करेगी. ये बात पहले उनको समझ नहीं आई. लेकिन फिर मां ने मेरा साथ दिया.”

पिता और समाज से लड़ाई का जो मोर्चा इंद्रावती अकेले नहीं संभाल सकती थीं, वो मां ने संभाल लिया. वह कहती हैं, “मां ने ही उन्‍हें समझाया. मां ने ही आसपास के लोगों का मुंह बंद कर दिया. मेरी मां बड़ी हिम्‍मती है और मॉडर्न भी. हालांकि है बिलकुल अनपढ़. लेकिन साहस उसमें बहुत है.” शुरू-शुरू में आसपास के लोग भी बातें करते थे. लड़की जाने कौन मर्दाना काम रही है. धीरे-धीरे सबका मुंह बंद हो गया.

अपनी वर्कशॉप खोलना चाहती हैं इंद्रावती

इंद्रावती की उड़ान का आकाश बड़ा होना चाहता है. उनके बहुत सारे अरमान हैं. वो चाहती हैं कि अपनी खुद की एक वर्कशॉप खोलें. वो आसपास की और तमाम लड़कियों को मैकेनिक बनने की ट्रेनिंग भी देना चाहती हैं. वो चाहती हैं कि रूढि़यां टूटें, स्‍टीरियोटाइप टूटें. ज्‍यादा से ज्‍यादा लड़कियां वो काम करें, जिसे दुनिया मर्दों का काम समझती है. इंद्रावती कहती हैं, “लड़कियां चाहें तो क्‍या नहीं कर सकतीं. बस कोई उन्‍हें राह दिखाने वाला होना चाहिए.”