Happy Birthday Ratan Tata: टाटा ग्रुप को कैसे नई ऊंचाइयों पर लेकर गए रतन टाटा, दरियादिली के लिए हैं फेमस

By Ritika Singh
December 28, 2022, Updated on : Wed Jan 04 2023 12:22:26 GMT+0000
Happy Birthday Ratan Tata: टाटा ग्रुप को कैसे नई ऊंचाइयों पर लेकर गए रतन टाटा, दरियादिली के लिए हैं फेमस
रतन टाटा, जमशेदजी टाटा के बेटे सर रतनजी टाटा के गोद लिए हुए बेटे नावल टाटा के बेटे हैं.
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दिग्गज कारोबारी और टाटा ग्रुप (Tata Group) के प्रमुख रतन टाटा (Ratan Tata) का आज जन्मदिन है. 85 वर्ष के हो चुके रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1937 को हुआ था. रतन टाटा 1990 से 2012 तक टाटा ग्रुप के चेयरमैन रहे, वहीं अक्टूबर 2016 से फरवरी 2017 तक इंटरिम चेयरमैन रहे. रतन टाटा, टाटा ग्रुप के चैरिटेबल ट्रस्ट को अभी भी हेड कर रहे हैं. उनकी ली​डरशिप में टाटा ग्रुप न ही केवल फला फूला बल्कि नई ऊंचाइयों पर भी पहुंचा और वैश्विक स्तर पर अपना लोहा मनवाया.​


रतन टाटा, जमशेदजी टाटा के बेटे सर रतनजी टाटा के गोद लिए हुए बेटे नावल टाटा के बेटे हैं. नावल टाटा के बच्चों में रतन टाटा, जिम्मी टाटा और नोएल टाटा शामिल हैं. रतन टाटा और जिम्मी टाटा, नावल टाटा की पहली पत्नी के बेटे हैं, जबकि नोएल दूसरी पत्नी के बेटे हैं. रतन टाटा के पिता और मां का तलाक 1948 में हो गया था. उस वक्त रतन टाटा केवल 10 वर्ष के थे, उन्हें उनकी दादी नवाजबाई ने पाला.

करियर की शुरुआत

रतन टाटा ने 8वीं तक की पढ़ाई कैम्पियन स्कूल, मुंबई से की. उसके बाद वह कैथेड्रल एंड जॉन कॉनोन स्कूल, मुंबई और बिशॉप कॉटन स्कूल, शिमला में पढ़े. 1955 में रतन टाटा ने रिवरडेल कंट्री स्कूल, न्यूयॉर्क से ग्रेजुएशन किया. फिर 1959 में कॉरनेल यूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर में डिग्री हासिल की और 1975 में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के 7 वीक एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम को जॉइन किया. रतन टाटा, टाटा समूह से साल 1961 में जुड़े. करियर की शुरुआत में वह टाटा स्टील के शॉप फ्लोर पर काम करते थे. 1991 में जब जेआरडी टाटा रिटायर हुए तो वह टाटा ग्रुप के चेयरमैन बने. रतन टाटा 1970 के दशक में ग्रुप के मैनेजमेंट में शामिल हुए.

1971 में बने नेल्को के डायरेक्टर-इन-चार्ज

1971 में रतन टाटा, राष्ट्रीय रेडियो एंड इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी लिमिटेड (नेल्को) के डायरेक्टर-इन-चार्ज बने. उस वक्त कंपनी बेहद ज्यादा वित्तीय कठिनाई का सामना कर रही थी. रतन टाटा ने सुझाव दिया कि कंपनी को कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स के बजाय उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादों के विकास में निवेश करना चाहिए. दूसरी ओर जेआरडी टाटा नेल्को के ऐतिहासिक वित्तीय प्रदर्शन की वजह से अनिच्छुक थे क्योंकि इसने पहले कभी नियमित रूप से लाभांश का भुगतान नहीं किया था। इसके अलावा, जब रतन ने कार्य भार सम्भाला, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स नेल्को की बाजार में हिस्सेदारी 2% थी और घाटा बिक्री का 40% था. फिर भी जेआरडी टाटा ने रतन के सुझाव का अनुसरण किया.


इसके बाद 1972 से 1975 तक, आखिरकार नेल्को ने अपनी बाजार में हिस्सेदारी 20% तक बढ़ा ली और अपना घाटा भी पूरा कर लिया. लेकिन कंपनी के भाग्य में तो कुछ और ही लिखा था. 1975 में, भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी जी ने आपात स्थिति की घोषणा कर दी. इसकी वजह से आर्थिक मन्दी आ गई. फिर 1977 में यूनियन की समस्यायें पैदा होने लगीं. इसके चलते मांग के बढ़ जाने के बावजूद भी उत्पादन में सुधार नहीं हुआ. आखिरकार टाटा ने यूनियन की हड़ताल का सामना किया और 7 माह के लिए तालाबन्दी कर दी गई. रतन को हमेशा से नेल्को की मौलिक दृढ़ता में विश्वास था लेकिन उद्यम आगे और बरकरार न रह सका.

1977 में संभाली Empress Mills की कमान

इसके बाद साल 1977 में रतन टाटा को टाटा के नियंत्रण वाली Empress Mills की कमान सौंपी गई. उस वक्त यह टाटा समूह की बीमार इकाइयों में से एक थी. रतन ने इसे न केवल सम्भाला बल्कि लाभांश की घोषणा भी कर दी. उस वक्त कम श्रम गहन उद्यमों की प्रतियोगिता ने एम्प्रेस जैसी कई ऐसी कंपनियों को अलाभकारी बना दिया था, जिनकी श्रमिक संख्या बहुत ज्यादा थी और जिन्होंने आधुनिकीकरण पर बहुत कम खर्च किया था. रतन टाटा के आग्रह पर कुछ निवेश किया गया, लेकिन यह पर्याप्त नहीं था. चूंकि मोटे और मध्यम सूती कपड़े के लिए बाजार प्रतिकूल था (जो कि एम्प्रेस का कुल उत्पादन था), एम्प्रेस को भारी नुकसान होने लगा.


बॉम्बे हाउस जो टाटा मुख्यालय है, अन्य ग्रुप कंपनियों से फंड को हटाकर ऐसे उपक्रम में लगाने का इच्छुक नहीं था, जिसे लम्बे समय तक देखभाल की जरूरत हो. इसलिए कुछ टाटा निर्देशकों, मुख्यतः नानी पालकीवाला ने यह फैसला लिया कि टाटा को मिल समाप्त कर देनी चाहिए. आखिर में मिल को 1986 में बन्द कर दिया गया. रतन टाटा इस फैसले से बेहद निराश थे. बाद में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि एम्प्रेस मिल को जारी रखने के लिए सिर्फ 50 लाख रुपये की जरूरत थी.

क्यों टाटा ग्रुप के 'रत्न' कहे जाते हैं रतन टाटा

वर्ष 1981 में रतन, टाटा इंडस्ट्रीज और समूह की अन्य होल्डिंग कंपनियों के अध्यक्ष बनाए गए. 1991 में जेआरडी टाटा के रिटायर होने के बाद रतन टाटा ग्रुप के चैयरमैन बने. रतन टाटा की अगुवाई में ही टाटा ग्रुप का कारोबार भारत से बाहर निकलकर ग्लोबल बिजनेस में तब्दील हुआ. वरना पहले यह बड़े पैमाने पर इंडिया सेंट्रिक था. इंटरनेशनल लेवल पर ग्रुप की पहचान बनाने की दिशा में टाटा टी ने टेटली को, टाटा मोटर्स ने जगुआर लैंड रोवर को और टाटा स्टील ने कोरस का अधिग्रहण किया. रतन के मार्गदर्शन में, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज सार्वजनिक निगम बनी और टाटा मोटर्स न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हुई. 1998 में टाटा मोटर्स ने टाटा इंडिका को बाजार में उतारा.


31 जनवरी 2007 को रतन टाटा की अध्यक्षता में, टाटा संस ने एंग्लो-डच एल्यूमीनियम और इस्पात निर्माता कोरस समूह का सफलतापूर्वक अधिग्रहण किया. इस अधिग्रहण के साथ रतन टाटा भारतीय व्यापार जगत में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गए. विलय के फलस्वरूप दुनिया को पांचवां सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक संस्थान मिला. रतन टाटा की अगुवाई में टाटा ग्रुप का रेवेन्यु 40 गुना बढ़ा और मुनाफा 50 गुना. रतन टाटा ने 28 दिसंबर 2012 को टाटा ग्रुप में अपनी एग्जीक्यूटिव पावर को छोड़ दिया.

जब लखटकिया कार नैनो का देखा सपना

रतन टाटा चाहते थे कि वह लोगों के लिए एक लखटकिया कार लेकर आएं. यह उनका बेहद अजीज सपना था. लखटकिया यानी एक ऐसी कार जिसकी कीमत 1 लाख रुपये हो. 10 जनवरी 2008 को रतन टाटा का यह सपना पूरा भी हुआ, जब टाटा की नैनो कार का नई दिल्ली में ऑटो एक्सपो में उद्घाटन हुआ. लेकिन यह कार उम्मीद के मुताबिक सक्सेसफुल नहीं हो सकी और साल 2018 में कंपनी ने इसका उत्पादन बंद कर दिया.

हमेशा युवा टैलेंट को सराहा

जेआरडी टाटा की जगह रतन टाटा का आना कई कंपनी हेड्स को पसंद नहीं आया. इनमें से कई ऐसे थे, जो उन कंपनियों में कई दशक बिता चुके थे और जेआरडी टाटा के अंडर संचालन की आजादी के चलते बेहद पावरफुल और प्रभावशाली हो चुके थे. रतन टाटा ने भूमिका संभालने के बाद एक रिटायरमेंट ऐज निर्धारित की और उन लोगों को रिप्लेस करना शुरू किया. उन्होंने इनोवेशन और युवा टैलेंट को प्राथमिकता देना शुरू किया और उन्हें जिम्मेदारियां दीं.

जब फोर्ड को दिया करारा जवाब

1991 में जब रतन टाटा, ग्रुप के चेयरमैन बने, तब टाटा मोटर्स की पहचान ट्रक बनाने की सबसे बड़ी कंपनी के तौर पर होती थी. 1998 में टाटा मोटर्स ने कार बनाने का फैसला किया. उसी साल के आखिर में टाटा इंडिका लॉन्च की गई. लेकिन यह कार उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई. इसके चलते 1999 में टाटा ग्रुप ने कार कारोबार समेटने की तैयारी कर ली. फोर्ड मोटर्स ने टाटा का कार कारोबार खरीदने में दिलचस्पी दिखाई और टाटा को संदेशा भिजवाया. ऑटो मैन्युफैक्चरिंग के लिए मशहूर डेट्रायट मिशिगन झील के दक्षिण-पूर्व में, अमेरिकी इंडस्ट्री का नगीना माना जाता है। यहीं फोर्ड मुख्यालय में रतन टाटा और उनकी टीम पहुंची.


लगभग तीन घंटे की बातचीत रतन टाटा और उनकी टीम के लिए एक अपमान की तरह रही. बातचीत के दौरान फोर्ड मोटर्स के चेयरमैन बिल फोर्ड ने रतन टाटा से कहा कि जब पैसेंजर कार बनाने का कोई अनुभव नहीं था तो ये बचकाना हरकत क्यों की. हम आपका कार बिजनस खरीद कर आप पर उपकार ही करेंगे. फोर्ड की इस बात से रतन टाटा बुरी तरह हिल गए. उसी रात उन्होंने कार बिजनेस बेचने का फैसला टाल दिया. अगली ही फ्लाइट से वह अपनी टीम के साथ मुंबई लौट आए.


इसके बाद आया साल 2008...वह वक्त जब टाटा मोटर्स के पास बेस्ट सेलिंग कार्स की एक लंबी लाइन हो गई और उधर फोर्ड मोटर्स की हालत खराब होती जा रही थी. उस वक्त टाटा मोटर्स ने फोर्ड की लैंड रोवर और जगुआर ब्रांड को खरीदने का ऑफर दे दिया. तब इन दोनों कारों की बिक्री बेहद खराब थी. फोर्ड काफी घाटे में जा रही थी. टाटा के ऑफर पर फोर्ड की टीम मुंबई आई. उस वक्त बिल फोर्ड को कहना पड़ा- आप हमें बड़ा फेवर कर रहे हैं. रतन टाटा चाहते तो इन दोनों ब्रांड्स को बंद कर सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसके बाद जब लंदन की फैक्ट्री बंद होने की अफवाह उड़ी तो रतन टाटा ने कामगारों की भावना समझी. यूनिट को पहले की तरह काम करने की आजादी दी. आज लैंड रोवर और जगुआर दुनिया की बेस्ट सेलिंग कार ब्रांड्स में शुमार है.


अप्रैल 2022 में Ford Motors ने भारत से अपना बिजनेस समेट लिया. एक महीने बाद, मई 2022 में TATA Motors की सहायक कंपनी Tata Passenger Electric Mobility Limited (TPEML) ने Ford Motors के गुजरात के साणंद स्थित कार मैन्युफैक्चरिंग प्लांट को खरीद लिया.

ये अहम उपलब्धियां हैं नाम

रतन टाटा हमेशा से शिक्षा, मेडिसिन और ग्रामीण विकास के सपोर्टर रहे हैं और उन्हें देश के दिग्गज दानवीरों में गिना जाता है. वह ट्रेड व इंडस्ट्री पर प्रधानमंत्री की काउंसिल के सदस्य हैं. साथ ही नेशनल मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटीटिवनेस काउंसिल के भी सदस्य हैं. इसके अलावा वह कई इंटरनेशनल यूनिवर्सिटीज, स्कूल, कंपनियों व संस्थानों के बोर्ड और ट्रस्टीज में भी शामिल हैं. रतन टाटा को साल 2000 में पद्म भूषण और 2008 में पद्म विभूषण मिला था.

दरियादिली के लिए मशहूर

रतन टाटा अपनी दरियादिली के लिए भी काफी मशहूर हैं. फिर चाहे बात अपने कर्मचारियों की हो या फिर स्ट्रीट डॉग्स की. रतन टाटा का पालतू कुत्ता 'गोवा' (Goa) भी कभी एक स्ट्रीट डॉग था, जो उन्हें गोवा में सड़क पर घूमते हुए मिला था. उस वक्त गोवा, बच्चा हुआ करता था और रतन टाटा उसे अपने साथ बॉम्बे हाउस ले आए थे. अब वह उनका चहेता है. इतना ही नहीं साल 2020 में रतन टाटा दो साल से बीमार चल रहे अपने एक पूर्व कर्मचारी से मिलने के लिए कार से 150 किलोमीटर का सफर तय कर मुंबई से पुणे पहुंच गए थे. ये तो उनके बड़े दिल के बस दो उदाहरण भर हैं. ऐसे कई किस्से न जाने कितने लोगों को प्रेरित कर रहे हैं.

जिदंगी के आखिरी दिन हेल्थकेयर सेक्टर को किए समर्पित

अप्रैल 2022 में एक कार्यक्रम के दौरान रतन टाटा ने कहा था- 'मैं अपनी जिदंगी के आखिरी दिनों को स्‍वास्‍थ्‍य सेवा को समर्पित करता हूं.' हेल्थ और फिटनेस स्टार्टअप CureFit में भी रतन टाटा ने निवेश किया हुआ है. सिर्फ रतन टाटा ही नहीं, उनके पहले से ही टाटा की तरफ से हेल्थ सेक्टर को मजबूत करने की कोशिशें होती रही हैं. मुंबई के परेल में स्थित टाटा मेमोरियल सेंटर का हेल्थ सेक्टर में एक बड़ा योगदान है. 1932 में ल्यूकेमिया यानी खून के कैंसर की वजह से लेडी मेहरबाई टाटा की मौत हो गई थी. इसके बाद उनके पति दोराबजी टाटा ने भारत में वैसी सुविधाओं वाला एक अस्पताल खोलने का सपना देखा, जैसे विदेशी अस्पताल में उनकी पत्नी का इलाज हुआ था. दोराबजी टाटा की मौत के बाद इस सपने को साकार करने की कोशिशें नौरोजी सकलतवाला ने भी कीं. हालांकि, जेआरडी टाटा की कोशिशों के बाद टाटा मेमोरियल सेंटर का सपना साकार हो सका. 1957 में इसे स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने अधीन ले लिया, लेकिन जेआरडी टाटा और होमी भाभा इसके कामकाज पर नजर रखते रहे.


स्वास्थ्य के क्षेत्र में टाटा मेडिकल सेंटर रतन टाटा के योगदान का जीता-जागता सबूत है. यह कोलकाता के बाहर इलाके राजारहाट में स्थित है. 16 मई 2011 को रतन टाटा ने इसका उद्घाटन किया था. इस सेंटर में खासकर गरीब लोगों के कैंसर का इलाज किया जाता है. हालांकि, यहां बाकी लोगों का भी इलाज होता है और इससे होने वाली कमाई का इस्तेमाल टाटा मेडिकल सेंटर में गरीबों को इलाज मुहैया कराने के लिए किया जाता है.