International Tiger Day: भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ, अब सिर्फ 4 या 5 प्रतिशत ही जिंदा

By Prerna Bhardwaj
July 29, 2022, Updated on : Fri Jul 29 2022 16:54:28 GMT+0000
International Tiger Day: भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ, अब सिर्फ 4 या 5 प्रतिशत ही जिंदा
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close

साल 2008 में नैशनल टाइगर कंजर्वेशन ऑथोरिटी की (National Tiger Conservation Authority) की एक रिपोर्ट ने हम सबको चौंका दिया था. खबर थी कि भारत में सिर्फ 1,411 बाघ बचें हैं. अगले दस सालों में स्थिति बद-से-बदतर होती गई क्योंकि बाघ की संख्या 60 प्रतिशत से और कम ही हुई. जब विश्वभर में बाघ की कुलसंख्या महज 2,200-3,200 बची, तब इन्टरनैशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (International Union for Conservation of Nature) को बाघ को विलुप्त होती प्रजाति की श्रेणी में सूचिबद्ध करना पडा.


वक़्त रहते हम सचेत हुए. 2010 के आस-पास, जब बाघों की संख्या 3 हज़ार से भी कम बची थी, इनको बचाने की कवायद तेज़ हुई भारत, नेपाल, भूटान के साथ 10 अन्य देशों में, जहां इनकी संख्या ज्यादा पाई जाती है, ने साल 2022 तक इनकी संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य लिया.


अच्छी खबर यह है कि 2022 में हम यह कह सकते हैं कि भारत इस लक्ष्य में कामयाब रहा. पिछले साल 2021, दिसंबर में जारी किये रिपोर्ट के मुताबिक, आज भारत में बाघों की संख्या 2,967 है, जो 2010 में पुरे विश्व में पाए जाने वाले बाघों की थी. फिलहाल दुनियाभर में साढ़े चार हजार बाघ हैं. इन्टरनैशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में बाघों की संख्या 3200 हो गई थी और 2022 में इनकी संख्या 4500 है.

भारत में बाघ संरक्षण के लिए क्या-क्या किया जा रहा है?

भारत में, मुख्य बाघ संरक्षण पहलों में से एक को प्रोजेक्ट टाइगर कहा जाता है जो द नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी (NTCA) द्वारा प्रशासित है.


यह पहल 1973 में शुरू की गई थी और आज तक, पूरे देश में 25 से अधिक टाइगर रिज़र्व स्थापित किए गए हैं. इन जानवरों की यथासंभव रक्षा करने के लिए, ये रिज़र्व वैसे जगहों पर बनाए गए हैं जहां मानव विकास और निवास निषिद्ध है.


इसके अलाव बाघों के प्रजनन में सहायता और सुविधा प्रदान करने के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने पर जोर दिया गया है, ताकि बाघों की दुनिया की आबादी का विकास हो सके.


प्रोजेक्ट टाइगर ने शिकारियों को पकड़ने और बाघों की हत्या को रोकने के लिए टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स की भी स्थापना की है. यह पहल बाघों के प्राकृतिक आवास के भीतर ग्रामीणों के आवा जाहि को नियंत्रित करने में सफल रहा है. यह पहल मनुष्यों पर बाघ के हमलों के जोखिम को कम करता है, जिससे ग्रामीणों द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए बाघ की हत्या के खतरे को भी कम करता है.


बाघों के कम होने से संकट ये है कि इसका असर प्रकृति, पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्रों को व्यापक तौर पर प्रभावित कर सकते हैं. क्योंकि बाघों का संरक्षण पर्यावरण के बहुत बड़े हिस्से का भी संरक्षण करता है. बाघ जगंलों में बाहरी जीवों के दखल को रोकते हैं जिससे जंगल कायम रहते हैं. भारत में 320 नदियां टाइगर रिजर्व क्षेत्रों से निकलती हैं. ये रिजर्व जंगल वे इलाके हैं जहां कार्बन संरक्षित हैं, वायुमडंल को पेड़ों से ऑक्सीजन मिलती है और जमीन के अंदर से पानी अपनी गति से निकलता है जिससे बाढ़ नियंत्रण में भी मदद मिलती है. बाघों को संरक्षित करने से हम इन जंगलों की रक्षा करते हैं.


बाघों की जरुरत और एहमियत को समझते हुए प्रोजेक्ट टाइगर के माध्यम से बाघों के संरक्षण के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को बाघों के बारे में जानकारी दी जाती है और उनके संरक्षण के लिए जागरूक किया जाता है. जो संगठन बाघों की रक्षा के लिए कार्य करते हैं, उनका प्रोत्साहन करने के साथ आर्थिक स्तर पर भी उनकी मदद की जाती है.


(फीचर ईमेज क्रेडिट: @IsraelinIndia twitter)