मंजिल तक पहुंचने के लिए आईपीएस सूरज सिंह ने आखिर तक हिम्मत नहीं हारी

मंजिल तक पहुंचने के लिए आईपीएस सूरज सिंह ने आखिर तक हिम्मत नहीं हारी

Friday September 20, 2019,

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बड़े सपनों वाली मंजिलें हासिल करने का हुनर तो कोई आईपीएस सूरज सिंह परिहार से सीखे कि संसाधनहीन परिवार की आर्थिक कठिनाइयों के बीच जीविका के लिए कॉल सेंटर की नौकरी से लेकर पुलिस अधिकारी बनने तक, उन्हे लाख ठोकरें आड़े आती रहीं, मगर मंजिल पर पहुंचने के लिए उन्होंने आखिर तक हिम्मत नहीं हारी।

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आईपीएस सूरज सिंह


जब विपरीत परिस्थितियों में भी कुछ कर दिखाने के इरादे बुलंद हों, राहें खुद-ब-खुद निकल आती हैं और ऐसी शख्सियतों की मंजिल मिसाल बन जाती है। ऐसी ही कामयाबी की दास्तान है जौनपुर (उ.प्र.) में पांचवीं तक पढ़ाई करने के बाद परिजनों के साथ जाजमऊ (कानपुर) में जा बसे सूरज सिंह परिहार की। एजुकेशन के वक़्त उन्होंने सपना तो देखा था आईएएस बनने का, नौकरी करनी पड़ी कॉल सेंटर पर, फिर दिल्ली में कस्टम एंड एक्साइज डिपार्टमेंट में इंस्पेक्टर, उसके बाद संघर्षशील वक़्त ने उन्हे पहुंचा दिया आईपीएस की कुर्सी पर।


सिविल सर्विसेज में मिली इस सफलता पर वह कहते हैं- 'सपना पूरा हुआ। मैंने आईएएस बनने का सपना देखा जरूर था, लेकिन पता नहीं था, कैसे पूरा होगा। परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं। घर में पापा प्राइवेट सेक्टर से रिटायर्ड, परिवार के लिए एक अदद मैं ही कुछ कमाने-धमाने वाला। ग्रेजुएशन के बाद दिल्ली पहुंच गया। इंटरनेशनल बीपीओ में जॉब करने लगा। 2005 से 2007 तक वही ड्यूटी बजाता रहा। 2008 से 2012 तक स्टेट बैंक ऑफ महाराष्ट्रा में पीओ की नौकरी करता। फिर 2012 में एक्साइज इंस्पेक्टर हो गया। वह मेरी ऊंची उड़ान का पहला पड़ाव था।' 


अतीत के कठिन दिनों की यादें ताज़ा करते हुए वह बताते हैं कि पांचवी क्लास तक दादा-दादी से रोजाना ही महापुरुषों की कहानियां सुनते हुए बड़ा हुआ। उससे मन में देश और समाज की सेवा का जज्बा भर आया था। उनसे ही कुछ खास करने की प्रेरणा मिली। जब घर वालों के साथ जाजमऊ जा बसा, एक हिंदी मीडियम स्कूल में दाखिला मिला। पढ़ाई-लिखाई के साथ ही खेल गतिविधियों आदि में भी शिरकत करने के साथ कविताएं भी लिखने लगा, तो वर्ष 2000 में, उन्हे तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर नारायणन से राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार मिला। उन्होंने कानपुर के सरस्वती विद्या मंदिर, डिफेंस कॉलोनी से 75 प्रतिशत अंकों के साथ 10वीं की परीक्षा पास की। उसके बाद अगले ही साल 12वीं क्लास के बोर्ड एग्जाम में पाँचों विषयों में डिस्केटिंक्शन साथ 81 प्रतिशत अंकों से कॉलेज टॉप कर गया। तभी से हौसला बुलंदी में रहने लगा। अपनी मेहनत और विवेक पर गहरा विश्वास होने लगा कि अब शायद कुछ बड़ा कर दिखाऊंगा। 





वह बताते हैं कि बारहवीं के बाद आगे की राह आसान नहीं रह गई थी क्योंकि घर की आर्थिक तंगी से इजाजत नहीं मिली तो एक कॉलेज से प्राइवेट ग्रेजुएशन करते हुए अपने मित्र अश्विनी के साथ अंग्रेजी की कोचिंग भी चलाने लगा। इस विदेशी भाषा पर अच्छी पकड़ न होने से कठिनाइयां सामने आईं तो सीख-पढ़कर उन पर भी पार पा लिया।


तभी एक दूसरी मुश्किल आ पड़ी। मकान मालिक ने कोचिंग सेंटर बंद करा दिया। तभी उन दिनो उनकी नजर कॉल सेंटर एक्जीक्यूटिव के विज्ञापन पर नजर पड़ी। नौकरी के लिए सेलेक्ट होकर नोएडा पहुंच गए। साथ-साथ उनका सिविल सेवा का सपना भी आकार लेता रहा। उसी बीच कॉल सेंटर की नौकरी भी जाने की नौबत आ गई। मैनेजर से आरजू-मिन्नत पर कुछ वक़्त, लगभग महीने भर और, वहां नौकरी जारी रही। फिर, प्रबंधन की ओर से दोगुने इंक्रीमेंट की दिलासा के बावजूद खुद ही उस नौकरी को ठुकराकर आगे चल पड़ा क्योंकि लक्ष्य तो कुछ और ही था, सिविल सेवा में सेलेक्ट होना। 


आईपीएस सूरज सिंह परिहार बताते हैं कि वह वर्ष 2007 का समय था। नोएडा से दिल्ली पहुंच गया। कुछ ही महीने में कॉल सेंटर से कमाए - बचाए पैसे भी खत्म हो लिए। फिर भी किसी तरह दिन काटते हुए आठ बैंकों में पीओ एग्जाम के लिए अप्लाई कर दिया। बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र में नौकरी मिल गई।





सूरज सिंह कुछ महीने ठाणे की बैंक शाखा में बीते होंगे कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में सेलेक्ट होकर एक साल तक आगरा, दिल्ली और रुड़की में उस जॉब पर जमे रहे। वहां भी चमोली में ट्रांसफर का फरमान मिलते ही 2012 में एक्साइज इंस्पेक्टर बनकर दोबारा फिर दिल्ली पहुंच गए। अब उन्हे सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए जरूरत भर वक़्त भी मिलने लगा। इससे पहले वह 2011 में यूपीएससी एग्जाम के पहले अटेम्ट में फिसल चुके थे। एक बार और असफल रहे, फिर आगे तीसरी कोशिश में सेलेक्ट भी हुए तो भारतीय राजस्व सेवा के लिए। उसी दौरान सरकार से ऐसे परीक्षार्थियों की आयु सीमा में दो अतिरिक्त वर्ष की मोहलत दे दी गई थी। तब तक वह तीस साल के हो चुके थे। उस चौथी आखिरी कोशिश में वह आईपीएस सेलेक्ट हो गए। 


सूरज सिंह बताते हैं कि मन माफिक कामयाबी और अठारह महीने की ट्रेनिंग के बाद उनकी पहली पोस्टिंग छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एसपी सिटी के रूप में हुई। फिर दंतेवाड़ा के रेड कॉरिडोर में एएसपी बने। वहीं पर उन्होंने भटके युवाओं को जागरूक करने के लिए 'नई सुबह का सूरज' फिल्म बनाई। वह अपनी एजुकेशनल सफलताओं का जिक्र करते हुए बताते हैं कि उन्होंने बीए और एमए की किताबों के अलावा एनसीईआरटी की किताबों से तैयारी की। सामान्य अध्ययन के लिए सेल्फ स्टडी की। हिंदी साहित्य के लिए दिल्ली स्थित दृष्टि - द विजन से कोचिंग ली। इंटरव्यू की बारीकियां कानपुर के एपेक्स इंस्टीट्यूट से सीखीं। उनको डीएवी कॉलेज, कानपुर से 67 प्रतिशत अंकों के साथ बीए और फिर 59 प्रतिशत अंक के साथ एमए की डिग्री मिली।


सूरज अपनी आज तक की कामयाबियों का श्रेय अपने माता-पिता को देते हैं, जिन्होंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार हरसंभव उनकी हर वक़्त मदद की। भाई-बहनों के प्यार ने भी उनका हौसला आफजाई किया। सूरज सिंह कहते हैं कि सिविल सेवा की तैयारी में सबसे जरूरी है, यूपीएससी का पूरा सिलेबस कवर करना। बुक्स की बजाए टॉपिक्स को कवर करने के साथ ही एग्जाम में आंसर छोटे-छोटे पैरे में सही फैक्ट्स के साथ क्रिएटिव किस्म के होने चाहिए।