जंगल जीतने वाली कलावती देवी की जिंदगी का पहला पाठ, कभी हार मत मानो

By जय प्रकाश जय
February 23, 2020, Updated on : Mon Feb 24 2020 05:13:04 GMT+0000
जंगल जीतने वाली कलावती देवी की जिंदगी का पहला पाठ, कभी हार मत मानो
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चमोली (उत्तराखंड) में वन माफिया के चंगुल से तांतरी का जंगल जीत लेना कलावती देवी रावत के जीवन की पहली फतह थी। वह अपने गांव की रोल मॉडल बन गईं। महिलाओं का समूह बनाकर वह अपने गांव पहली बार बिजली ले आईं। पंचायत चुनाव लड़कर जीतीं। उन्हे इंदिरा प्रियदर्शिनी अवॉर्ड समेत कई सम्मान मिले। 


कलावती देवी रावत

कलावती देवी रावत (फोटो क्रेडिट: सोशल मीडिया)



शादी के बाद उत्तराखंड की कलावती देवी रावत जब मायके के गरीब परिवार से पहली बार अपनी ससुराल बाचेर (चमोली) पहुंचीं, गांव में न बिजली, न पानी, न शिक्षा, न इलाज के संसाधन। अस्सी के दशक का वह शुरुआती साल था।


एक दिन कलावती देवी रावत अपने गांव की महिलाओं को लेकर ज़िले की गोपेश्वर तहसील में सरकारी अधिकारियों से मिलने पहुँचीं। उनसे बिजली मांगी। अधिकारियों पर कोई असर नहीं। ऊपर से केस दर्ज कराने की धमकी मिल गई सो अलग से। घर लौटते समय कलावती देवी को रास्ते में बिजली के पोल दिखे। वह अपने साथ की अन्य महिलाओं की मदद से सारे खंभे अपने गांव उठा ले आईं।


गुस्सा इस बात का था कि वे सारे पोल किसी अधिकारी के कार्यक्रम में बिजली पहुंचाने के लिए खड़े किए गए थे। वे पोल उठाते समय ही अधिकारी मौके पर आ धमके, जेल भेजने की धमकियां देने लगें लेकिन कलावती कत्तई नहीं डरीं, न डिगीं। तब तक बड़ी संख्या में गांव और आसपास की ढेर सारी महिलाएं मौके पर जमा हो गईं। जेल भेजने की मांग करने लगीं।


आखिरकार, कलावती के गांव बाचेर को पावर ग्रिड से जोड़ना पड़ा। कलावती देवी रावत के जीवन की वह पहली फतह थी। वह अपने गांव की रोल मॉडल बन गईं।


कलावती देवी रावत की जिंदगी का पहला पाठ था, कभी हार मत मानो। कामयाबी की उसी जिद ने उन्हे अपने गांव के तांतरी के जंगलों को वन माफिया के चंगुल से बचाने का सबक दिया। उन्होंने महिलाओं का समूह बनाकर आसपास के हर गांव को वन कटाई के खिलाफ उठ खड़े होने का अभियान छेड़ दिया।


कलावती देवी ने बचपन से ही देखा कि गांव के पास जंगल में लकड़ी माफिया का बोलबाला था। पर कोई उनके खिलाफ आवाज नहीं उठाता था। तब उन्होंने आवाज उठाने का फैसला किया। विवाह के समय उनकी उम्र करीब सत्रह साल थी। ससुराल की पहली ही लड़ाई में उनके पूरे गांव में बिजली पहुंच गई थी। वह उसी दिन बाकी चुनौतियों से भिड़ने, टकराने के लिए उठ खड़ी हुई थीं।


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कलावती देवी रावत (फोटो क्रेडिट: सोशल मीडिया)


एक सुबह, जब वह कुछ महिलाओं के साथ चारा लेने तांतरी के जंगल में पहुंचीं, तो चौंक गई। वहां दर्जनों कटे पेड़ पड़े थे, जबकि कई पेड़ों पर कटाई के लिए निशान बनाए गए थे। वे सभी पेड़ों से चिपक कर वन काटने का विरोध करने लगीं। वनकर्मी समझाने, माफिया से रिश्वत दिलाने लगे। मना करने पर जान से मारने की धमकी देने लगे। मामला बढ़ गया। जिला मुख्यालय से अधिकारी मौके पर आ धमके। प्रशासन ने घोषणा की कि तांतरी के जंगल में पेड़ नहीं काटे जाएंगे।


कलावती देवी रावत बताती हैं कि इन सब हालात के पीछे वन माफिया और बाचर गांव के शराबियों की मिली भगत थी। कई कोशिशों के बाद भी इस साठगांठ को तोड़ा नहीं जा सका। ऐसे हालात में कलावती देवी रावत ने खुद गांव की वन पंचायत के मुखिया का चुनाव लड़ने का फैसला किया। लड़ना आसान नहीं था। अधिकारी सहमत नहीं हो रहे थे।


किसी तरह उप-मंडल मजिस्ट्रेट से चुनाव लड़ने की अनुमति मिली। वह चुनाव लड़ीं और जीत गईं। उसके बाद उन्होंने बाचेर में पहली बार महिला मंगल दल का गठन किया, जो शराबियों और लकड़ी माफिया के खिलाफ अभियान चलाने के साथ ही गांव के अन्य तबकों में जागरूकता फैलाने लगा। वह सिलसिला आज तक बरकरार है। उनके इलाके में आज भी किसी की हिम्मत नहीं कि तांतरी के जंगल का कोई एक पेड़ काट ले। 


कलावती देवी बताती हैं कि उनके गांव का महिला मंगल दल पूरे जंगल पर नज़र रखता है। यह दल क्षेत्र की सभी अवैध शराब फ़ैक्ट्रियां को नष्ट कर चुका है। उन्हें 1986 में इंदिरा प्रियदर्शिनी अवार्ड के साथ ही कई और सम्मान मिल चुके हैं। वह कहती हैं, उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह है, जो उन्हें अपने गांव वालों से मिलता है।


अब महिला मंगल दल जो फ़ैसले लेता है, पूरे गांव पर लागू हो जाता है। उनका समूह कई लोगों को शराब के चंगुल से बचा चुका है। कई परिवार शराबखोरी से तबाह होने से बच गए। गांव के लोगों को जंगल से खूब फल-फूल मिलते हैं। जंगली उत्पाद ही गांव की आमदनी का सबसे बड़ा जरिया हैं। कलावती देवी रावत का पुरुष वर्ग भी दिल से सम्मान करता है।


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