30 लाख करोड़ खर्च हो चुके हैं, लेकिन कहाँ तक पहुँचा मेटावर्स?

30 लाख करोड़ खर्च हो चुके हैं, लेकिन कहाँ तक पहुँचा मेटावर्स?

Tuesday November 15, 2022,

8 min Read

'फेसबुक' (Facebook) को 'मेटा' (Meta) हुए एक साल बीत गया.

मगर इंफ्रास्ट्रक्चर पर लाखों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद ऐसा लगता है कि मेटावर्स का सपना पूरा होने में अभी वक़्त है. यूजर्स का मेटावर्स के प्रति रुझान उतनी तेज़ी से नहीं मिला है, जितनी तेज़ी की अपेक्षा कंपनी को थी.

शायद कंपनी को 2003-04 की ओर मुड़कर देखने की ज़रुरत है, जब 'द फेसबुक' को एक 'यूजर-फर्स्ट' सोच के साथ बनाया गया था.

अक्टूबर 2021 में मार्क ज़करबर्ग ने एक घोषणा कर फेसबुक के उस लक्ष्य के बारे में बताया था जिसके तहत वो लोगों के लिए एक ऑल्टरनेट वर्चुअल एक्सिस्टेंस बनाना चाहते हैं. आसान भाषा में कहें तो एक कृत्रिम दुनिया, जिसमें आप AR (ऑगमेंटेड रिएलिटी) और VR (वर्चुअल रिएलिटी) की मदद से पहुंच सकते हैं.

साथ ही उन्होंने कहा था, "मेटा का लक्ष्य है कि मेटावर्स के ज़रिए लोग एक-दूसरे से जुड़ सकें, अपने समुदाय बना सकें और अपने बिजनेस को बढ़ा सकें."

साल 2022 के पहले 9 महीनों में, कंपनी के मेटावर्स विभाग 'रिएलिटी लैब्स' ने रिसर्च एंड डेवलपमेंट में लगभग 7,62,000 करोड़ रुपये (9.3 बिलियन डॉलर) खर्च किए हैं.

ये भी बता दें कि इनसाइडर की एक जांच के मुताबिक़, जनवरी से सितंबर के बीच मेटा ने रिएलिटी लैब्स में लगभग 30,00,000 करोड़ रुपयों (36 बिलियन डॉलर) का निवेश किया है.

मेटा का इस तरह इंटरनेट के उस अवतार पर खर्च करना, जो भविष्य की बात है और जिसका कोई हालिया नातीजा नहीं दिखता, कई लोगों को ज़करबर्ग के हाथों पूंजी की बर्बादी लग रही है.

जबकि दूसरों के मुताबिक़ मेटा का ये हालिया निवेश दुनिया में मेटावर्स की मुहिम को बढ़ावा देगा और मेटा इस क्रांति की बुनियाद बनेगा.

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सिर्फ ख़ास लोगों का मेटावर्स?

मेटा को शुरुआती यूजर्स की संख्या को लेकर जितनी अपेक्षाएं थीं, वो पूरी नहीं हुईं.

मेटा के सोशल वर्चुअल रिएलिटी प्लेटफ़ॉर्म 'होराइजन वर्ल्ड' पर फ़िलहाल 2 लाख मंथली एक्टिव यूजर (MAU) हैं. जबकि प्लान के मुताबिक़ कम से कम 5 लाख MAU होने चाहिए थे. कम संख्या को देखते हुए मेटा ने अपने टारगेट को कम कर 2 लाख 80 हजार कर लिया.

हाल ही में मेटा ने अपना VR हेडसेट 'मेटा क्वेस्ट प्रो' निकाला जिसका दाम 1,21,000 रुपये (1499 डॉलर) है. कंपनी पहले भी अपने हेडसेट निकाल चुकी है, जिसमें 'क्वेस्ट 2' शामिल है. ज़करबर्ग ने स्वीकारा है कि हेडसेट के पीछे किए गए रिसर्च और डेवलपमेंट के खर्च रिएलिटी लैब्स को मिले नुकसान की सबसे बड़ी वजह है.

2022 के तीसरे क्वार्टर के आंकड़ों के मुताबिक़, कंपनी का रेवेन्यू 2300 करोड़ था, जो बीते साल से 49% कम था. वहीं कंपनी का खर्च 32,000 करोड़ रुपये था, जो बीते साल से 24% ज्यादा था. इसके पीछे कर्मचारियों से जुड़े खर्चे और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट में लगे पैसे बताई गई.

कंपनी का ऑपरेशनल लॉस भी बीते साल के 21,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 30,000 करोड़ रुपये हो गया.

YourStory ने मेटा से इस स्टोरी पर टिप्पणी की मांग की है मगर मेटा की ओर से कोई जवाब नहीं आया है.

मेटा के लॉसेज को लेकर ज़करबर्ग ज्यादा बात करते नहीं देखे जाते हैं. हालांकि वो मेटावर्स को लंबी रेस का घोड़ा मानते आए हैं. एक हालिया शेयरहोल्डर मीटिंग में उन्होंने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि 2030 के दशक तक कंपनी के प्रॉफिट का सबसे बड़ा हिस्सा रिएलिटी लैब्स से आएगा.

ज़करबर्ग को भरोसा है कि मेटा द्वारा बनाया गया मेटावर्स ही भविष्य होगा. बीते साल उन्होंने कहा था, 'मेटावर्स में यूजर एक से दूसरी जगह एक होलोग्राम के तौर पर पहुंच जाएगा. ऑफिस में होने के लिए उसे ऑफिस जाने की ज़रुरत नहीं होगी, बिना किसी सवारी के लोग एक कॉन्सर्ट से लेकर अपने माता-पिता के लिविंग रूम तक पहुंच सकेंगे."

'यूजर-फर्स्ट' सोच की ज़रुरत

मेटावर्स की कृत्रिम हकीकत को हकीकत में बदलने के लिए मेटा लाखों करोड़ रुपये लगा रहा है. जो लोग इसमें रुचि रखते हैं उनके लिए ये एक सफलता है.

लोग ऑकुलस हेडसेट्स की मदद से डिस्क्रोनिया (Dyscronia), द रूम वीआर (The Room VR), पज़लिंग प्लेसेज (Puzzling Places) और अन्य कई गेम्स और ऐप्स की वर्चुअल दुनिया में जा सकते हैं. लेकिन अगर इनके यूजर्स नहीं बढ़े तो ये ऐप्स भूत बंगलों जैसे वीरान पड़ जाएंगे.

इंडियन मेटावर्स 'लोका' पर काम कर रहे कृष्णन सुंदरराजन का मानना है कि मेटा को इंफ्रास्ट्रक्चर से अधिक यूजर्स पर फोकस करना चाहिए था.

उनके मुताबिक़, "एक प्लेटफ़ॉर्म का महत्व तभी होता है जब उसके अच्छे-खासे यूजर हों. ये बात कई मेटावर्स प्रोजेक्ट समझ नहीं पाए हैं."

उनके मुताबिक़ इसमें द सैंडबॉक्स और डीसेंट्रालैंड जैसे वेबथ्री प्रोजेक्ट भी शामिल हैं. डाटा एग्रीगेटर डैपरेडार के मुताबिक़, 6 अक्टूबर 2022 की तारीख को डीसेंट्रालैंड के 38 एक्टिव यूजर थे जबकि द सैंडबॉक्स के 522 एक्टिव यूजर थे.

डीसेंट्रालैंड के मुताबिक उनके प्रति दिन 8000 यूजर थे. एक विवादास्पद संख्या होने के साथ-साथ ये संख्या कम भी है. खासकर एक ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी पर बने सबसे पुराने मेटावर्स प्लेटफ़ॉर्म के लिए.

किष्णन के मुताबिक़, मेटा के साथ साथ अन्य मेटावर्स प्लेटफॉर्म्स को गेम्स और अन्य भौतिक अनुभवों के ज़रिये कस्टमर बढ़ाने पर फोकस करना चाहिए, न कि लगातार नया इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने पर.

"ये एक ऐसी चीज है जिसे वे पुराने वर्चुअल गेमिंग प्लेटफॉर्म्स जैसे फोर्टनाइट, रोब्लोक्स और माइनक्राफ्ट से सीख सकते हैं," कृष्णन कहते हैं.

कई कारोबारी जो वर्चुअल फील्ड में काम कर रहे हैं, मानते हैं कि ये तमाम मेनस्ट्रीम फील्ड्स जैसे प्रोडक्टिविटी, फिटनेस, काम, म्यूजिक, आर्ट वगैरह में सफलता की चाबी बन सकता है. वहीं कई लोग ऐसे भी हैं जो वर्चुअल रिएलिटी में विश्वास नहीं रखते हैं.

कई आंत्रप्रेन्योर मानते हैं कि VR दुनिया में अपनी पकड़ नहीं बना पाएगा, खासकर विकासशील देशों में, जहां VR हेडसेट अत्यधिक महंगे हैं.

"मुझे नहीं लगता कि VR शॉर्ट टर्म सफलता देख पाएगा. मेटा को मोबाइल फर्स्ट या पीसी सपोर्ट वाली टेक्नोलॉजी पर काम करना चाहिए," कृष्णन कहते हैं.

फेसबुक का खुद को डेस्कटॉप से मोबाइल-फर्स्ट बनाना उनके लिए बेहद कारगर साबित हुआ था. जिसकी सबसे बड़ी वजह थी कि मोबाइल पहले ही लोगों के बीच आसानी से मौजूद थे.

VR हेडसेट्स फिलहाल मोबाइल के आस पास नहीं हैं. ABI की एक रीसर्च के मुताबिक़, इस साल कुल एक करोड़ हेडसेट ही शिप हुए हैं.

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मेटावर्स का भविष्य

मेटा उन शुरुआती टेक कंपनियों में से हैं जिन्होंने मेटावर्स में भरोसा दिखाते हुए बड़े निवेश किए हैं. इससे भले ही मेटा को नुकसान हो रहगा हो लेकिन मेटावर्स की दुनिया में कदम रख रही दूसरी कंपनियों को फायदा हो रहा है.

'इंटरैलिटी' की फाउंडर फरहीन अहमद, जो मेटावर्स की दुनिया में काम करती हैं, का मानना है कि असल में मेटा के उठाए गए कदम बिलकुल सही हैं. उनके मुताबिक़, "मेटा के निवेश के चलते AR, VR और AI को बड़े स्तर पर फायदा होगा जो पूरे ईकोसिस्टम के लिए अच्छा होगा."

मेटावर्स की दुनिया में मेटा अकेला नहीं है. डेटा सेंटर, AI, क्लाउड कंप्यूटिंग, नेटवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर और एंसीलरी इंडस्ट्री के कई खिलाड़ियों ने इसमें निवेश किया है.

वहीं अल्फाबेट, माइक्रोसॉफ्ट, एमेज़ॉन, एनविडिया, क्वालकॉम जैसी कंपनियां इंटरनेट की नयी लहर और क्लाउड बेस्ड इनोवेशन पर काम कर रही हैं. ये भी वर्चुअल दुनिया के डेवलपमेंट की ओर एक बड़ा कदम है.

फरहीन के मुताबिक़, बड़ी कंपनियों के द्वारा बिल्ड किए गए इंफ्रास्ट्रक्चर से नए स्टार्टअप्स के लिए उसके ऊपर प्रोडक्ट बनाना आसान होगा. वह कहती हैं, "ये बात सच है कि मेटावर्स का भविष्य बड़ी टेक कंपनियों के हाथों में है. लेकिन स्टार्टअप्स को मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काम करते जाना चाहिए. और एंटरटेनमेंट, रिटेल और शिक्षा जैसे फील्ड में इसे अप्लाई करना चाहिए.

मेटावर्स के सफल भविष्य में स्टार्टअप, क्रिएटर्स और कम्युनिटीज की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है. मेटा और ज़करबर्ग ये पहले भी कहते आए हैं कि दुनिया भर से लाखों क्रिएटर्स को साथ आना होगा और कई ओपन और एक-दूसरे से संचालित होने वाले मेटावर्स बनाने होंगे.

ये मेटावर्स ब्लॉकचेन पर बनते हैं या नहीं, ये तो वक़्त ही बातएगा. मगर नियमों और दिशानिर्देशों की कमी इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं.

बड़े और ट्रेडिशनल ब्रांड जो इसमें उतरना भी चाहते हैं, उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि एक अंतर-संचालित दुनिया में वे कैसे काम करेंगे.

‘मेटावर्स ऐज अ सर्विस’ कंपनी 'एक्सआर सेंट्रल' के फाउंडर अंशुल अगरवाल कहते हैं, "मेटा को मेटावर्स इकोसिस्टम के लिए नियम लाने चाहिए. अगर ऐसा हुआ तो हमारी कंपनियां जैसी अन्य कंपनियां तमाम ब्रांड्स को मेटावर्स में लाने में कामयाब हो जाएंगी."

फिलहाल ज़रूरी है कि ब्रांड्स को ये जानकारी दी जाए कि वे मेटावर्स पर कैसे काम करेंगे. जिससे तमाम स्टार्टअप इस दिशा में तेज़ी से काम कर सकें. अगर ऐसा हो सका तो ये नया नेटवर्क मेटा के लिए कॉमर्स और रिटेल में नए आया खोलेगा. जिससे रेवेन्यू आने के रास्ते भी बढ़ेंगे. कुल मिलाकर कहा जाए तो फेसबुक को अपने ही पुराने अवतार से प्रेरणा लेने की ज़रुरत है.

जब मेटा (उस वक़्त उसे फेसबुक कहा जाता था) नया-नया आया था, इसका काम यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स को आपस में जोड़ना था. उस वक़्त इसने यूजर्स की प्रॉब्लम को सॉल्व करते हुए उन्हें एक आसान नेटवर्क दिया. इसी सहजता के दम पर उन्होंने अपना पूरा वेब टू कारोबार खड़ा किया.

आज पूरे दो साल बाद ऐसा लगता है कि मेटा और ज़करबर्ग को अपने ही इतिहास में झाँककर, मेटावर्स की ओर कूच करते हुए यूजर-फर्स्ट रवैया अपनाने की ज़रुरत है.

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Metaverse: शोर तो बहुत मचा है, मगर ये है क्या?


Edited by Prateeksha Pandey