विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के रिश्ते को बिगाड़ दिया है- हेमन्त सोरेन

By भाषा पीटीआई
January 19, 2020, Updated on : Sun Jan 19 2020 14:01:31 GMT+0000
विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के रिश्ते को बिगाड़ दिया है- हेमन्त सोरेन
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झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शुक्रवार को कहा कि विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के बीच के रिश्ते के सन्तुलन को बिगाड़ दिया है। दुनिया में आत्महत्या करने वालों में सबसे अधिक आदिवासी समूह के ही लोग रहे हैं।


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फोटो क्रेडिट: dainikbhaskar



रांची, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शुक्रवार को कहा कि विकास के आधुनिक मॉडल ने आदिवासी और प्रकृति के बीच के रिश्ते के सन्तुलन को बिगाड़ दिया है।


सोरेन ने यहां आदिवासी संस्कृति पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय विचार गोष्ठी में कहा कि संसाधन की वैश्विक भूख से अधिकतर आदिवासी पहचान को ही आघात पहुंचा है। उन्होंने कहा कि विश्व में कई देशों जैसे ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया आदि ने बड़े पैमाने पर आदिवासियों को अपनी प्रकृति-संस्कृति से अलग किया है और इस समुदाय को पलायन का रास्ता अपनाना पड़ा है।


उन्होंने कहा,

‘‘वर्तमान में पूरे विश्व ने जिस आधुनिकीकरण और विकास के मॉडल को अपनाया है, क्या आदिवासी समूह इस विकास के पैमाने के साथ साथ चल पा रहा है? यह एक बहुत ही बड़ा सवाल है।’’


मुख्यमंत्री ने मलेशिया और ब्राजील का उदाहरण देते हुए कहा कि मलेशिया में आदिवासी समुदाय के लोग मछलियां पकड़ कर अपना जीवन यापन करते थे, इसीके साथ-साथ लंबी यात्रा करते आ रहे थे परंतु उन्हें शोषित और पीड़ित किया गया।


उन्होंने ने कहा कि ब्राजील में गौरानी समूह के रूप में चर्चित आदिवासी समुदाय गन्ने की खेती करते थे परंतु वे भी शोषित हुए और उन्हें भी पलायन करना पड़ा।


सोरेन ने कहा कि दुनिया में आत्महत्या करने वालों में सबसे अधिक आदिवासी समूह के ही लोग रहे हैं।


मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड में खनिज संपदा के उत्खनन के लिए आदिवासी समूह को जल, जंगल, जमीन से अलग किया गया है, उनकी जमीन छीनने का भी काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि झारखंड के आदिवासी समूहों को कॉरपोरेट के नाम पर भी छला गया है और उद्योग के क्षेत्र में जितना लाभ आदिवासी समाज को मिलना था वह लाभ नहीं मिल पाया।


सोरेन ने कहा कि प्रकृति में बदलाव के वजह से जो परिस्थिति उत्पन्न हुई है, वह काफी चिंतनीय है, ऐसे में प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में आदिवासी समुदाय की भूमिका सबसे अहम रही है और आगे भी रहेगी।


उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से बचाव आदिवासी समाज से बेहतर और कोई नहीं कर सकता है।


उन्नीस जनवरी तक चलने वाले इस सेमिनार में 12 देशों से आदिवासी दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञ और शोधकर्ता हिस्सा ले रहे हैं।


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