फर्श से अर्श तक: 1 लाख रुपये की लागत से खड़ी कर दी 8 करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनी, मेट्रो कूल जॉइन्ट्स की कहानी

बेंगलुरु स्थित मेट्रो कूल जॉइन्ट्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड के को-फाउंडर ललित खंडेलवाल की ज़ुबानी उनकी कंपनी की कहानी
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कोरोनावायरस महामारी ने हर तरह के उद्योग-धंधों पर असर डाला है, कहीं ग्राफ नीचे गया तो कहीं ग्राफ बहुत ऊपर चला गया।

ऐसा हमेशा से कहा जाता है कि खाने का बिज़नेस करोगे तो कभी घाटे में नहीं जायेगा, फायदा ही देगा, लेकिन पिछले दिनों की रिपोर्ट को देखते हुए यदि हम रेस्तरां उद्योग की बात करें तो इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने वजूद को बचाने की है। रेस्तरां बिज़नेस की कमाई 60 प्रतिशत तक घट गई है।

महाराष्ट्र सरकार ने तो लॉकडाउन में ढील देते हुए 8 जुलाई से होटल और लॉज खुलवा भी दिए थे लेकिन रेस्तरां अब भी बंद हैं। वहीं दिल्ली की बात करें तो रेस्तरां खोलने की इजाजत तो दे दी गई, लेकिन न ग्राहक हैं न धंधा है और खर्च पूरे हैं। ऐसे में महानगरों में हजारों रेस्तरां बंद होने की नौबत आ गई है।

यदि हम चीन की बात करें, तो कोरोना के बाद जब बाजार खुले तो डॉमिनोज पिज्जा की बिक्री पहले से लगभग एक तिहाई तक कम हो गई। चीन में अगर यह हालत है तो भारत में क्या होगा इसके बारे में सोचा जा सकता है।

नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) का अनुमान है कि कोरोना की वजह से उसके 5 लाख सदस्यों को साल 2020 में 80 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। अगर ये सब ऐसे ही चलता रहा तो देश के 50 फीसदी रेस्टोरेंट बंद हो सकते हैं। अनुमान के मुताबिक डिलिवरी चेन्स का कारोबार भी घटकर बहुत नीचे आ गया है।

लेकिन बेंगलुरु की एक कंपनी है जो अभी भी प्रॉफिट में है, जिसके फाउंडर ललित खंडेलवाल आज हमारे साथ हैं। ललित ‘मेट्रो कूल जॉइन्ट्स सर्विसिज़ प्राइवेट लिमिटेड’ के फाउंडर हैं। इन्होंने साल 2011 में मेट्रो कूल जॉइन्ट्स सर्विसेज़ की शुरुआत मात्र 1 लाख रुपये की लागत से की और आज इनकी कंपनी का टर्नओवर 8 करोड़ रुपये है। कंपनी के सिर्फ बेंगलुरु में ही 35 से अधिक आउटलेट्स हैं। ये आउटलेट्स आईटी कॉरपोरेट कंपनीज़ से लेकर, रेलवेज़ और एयरपोर्ट तक फैले हुए हैं।


मेट्रो कूल जॉइन्ट्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड के को-फाउंडर्स (L-R) विष्णु अग्रवाल, ललित खंडेलवाल और राजेश शर्मा (फोटो साभार: ललित खंडेलवाल)


कैसे हुई शुरूआत

मेट्रो कूल जॉइन्ट्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड के को-फाउंडर ललित खंडेलवाल का परिवार राजस्थान से हैं लेकिन उनका जन्म पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता (पहले कलकता) में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से की।

ललित बताते हैं,

साल 1999 में मैं बेंगलुरु (पहले बेंगलौर) आया। यहाँ मैंने साल 2010 तक अपने पिताजी के लॉजिस्टिक और ट्रांसपोर्ट के बिजनेस में हाथ बटांया।

इस दौरान उनकी कई नामचीन लोगों से मित्रता हुई। इन्हीं में से राजेश शर्मा, विष्णु अग्रवाल, प्रदीप शर्मा आज उनकी कंपनी के डायरेक्टर हैं।

मेट्रो कूल जॉइन्ट्स की शुरूआत से पहले ये चारों दोस्त अपनी-अपनी जिंदगी में संघर्ष कर रहे थे, क्योंकि ये सभी दूसरे शहरों और राज्यों से बेंगलुरु आए थे।

ललित आगे बताते हैं,

“साल 2004 में राजेश (शर्मा) ने एक रेस्टॉरेंट शुरू किया था, लेकिन वो बिजनेस फ्रंट पर उतना अच्छा नहीं चल रहा था। तब हमने सोचा कि ये एक शख्स इसे चला रहा है तो क्यों न सब मिलकर कुछ करें ताकि इसे सफल बिजनेस में तब्दील कर दिया जाए। और इसी सोच के साथ साल 2011 में हमने मेट्रो कूल जॉइन्ट्स सर्विसिज़ प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी की शुरूआत की।

ललित बताते हैं कि कंपनी की शुरूआत के समय वे सिर्फ तीन ही थे - राजेश (शर्मा), विष्णु (अग्रवाल) और मैं।

मेट्रो कूल जॉइन्ट्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड के को-फाउंडर ललित खंडेलवाल

शुरूआती निवेश के बारे में बात करते हुए कंपनी के को-फाउंडर ललित खंडेलवाल ने बताया कि हम तीनों ने एक-एक लाख रुपये का शुरूआती निवेश इस कंपनी में किया।

कंपनी की पहली कमाई के बार में बताते हुए ललित कहते हैं,

कंपनी के शुरूआती 2 साल बड़े संघर्ष भरे रहे। जब हमने सारे अकाउंट्स चेक किए तब पता चला कि हम तीनों ने 800-800 रुपये कमाए हैं। ये काफी निराशाजनक था बावजूद इसके हमने हिम्मत नहीं हारी।


पहला आउटलेट

मेट्रो कूल जॉइन्ट्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड के को-फाउंडर ललित खंडेलवाल बताते हैं कि कंपनी ने बेंगलुरु में अपना पहला आउटलेट सेप लैब्स (SAP Labs) में खोला था और उसी दौरान उन्हें ऑरेकल के दो छोटे अकाउंट और मिले जिन्हें उन्होंने चुनौती के रूप में स्वीकार किया। दिलचस्प बात ये है कि ये दोनों आउटलेट्स इन कॉर्पोरेट कंपनियों में अभी भी चल रहे हैं। और यहीं से मेट्रो कूल जॉइन्ट्स की गाड़ी सफलता की डगर पर चलते हुए आज इसके शिखर पर है।

ललित बताते हैं कि, सफलता का ये मकाम इतना आसान नहीं था लेकिन हमारी लगन, मेहनत और माँ-बाप के आशीर्वाद और दोस्तों के सपोर्ट से संघर्ष सफलता में तब्दील हो गया।

ललित ने बताया कि अब तक उनकी कंपनी के बेंगलुरु में 35 आउटलेट्स हैं जिनमें से 1-2 आउटलेट्स प्राइवेट फूड कोर्ट्स में है बाकी सभी कॉर्पोरेट कंपनीज में लगे हुए हैं।

कोरोना काल में बिजनेस

कोरोना काल में बिजनेस पर पड़ने वाले असर पर बात करते हुए ललित कहते हैं,

हमारा बिजनेस मॉडल कॉर्पोरेट बेस्ड है। जहांं हमारा किराया कम लगते है इसकी एवज में हमें सब्सीडाइज फूड देना होता है। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है कि 'खाने की चीजों की जो रेट बाहर होगी, हम उससे कम रेट पर इन आउटलेट्स पर फूड देते हैं'। ऐसे में हमें उतना फर्क नहीं पड़ा लेकिन हां मार्च में लॉकडाउन की शुरूआत में हम जरूर कन्फ्यूज हो गए थे। क्योंकि ऐसा पहले किसी के साथ हुआ नहीं था। हम चिंता में थे कि अब ये कैसा जायेगा? कैसे हम लोग आगे बढ़ेंगे?

ललित आगे बताते हैं,

“बेंगलुरु एयरपोर्ट पर कैफेटेरिया हम लोग ही चलाते हैं, हमारे पास काफी मैनपावर था। लेकिन मार्च के पहले सप्ताह से ही महामारी का असर दिखना शुरू हो गया था। सेल डाउन हो गई थी। हमारे मैनपावर में से लगभग 30 प्रतिशत लोग वापस अपने घरों को लौट गए, हमने रोकने की भी कोशिश की लेकिन वे नहीं माने।”

कोरोना से उबरने के बारे में बताते हुए ललित ने बताया,

हमने अपने बिजनेस मॉडल में कुछ बदलाव किए, जो कि जरूरी थे। हम पहले पैक फूड नहीं देते थे। हम लोग लाइव फूड और रेडी-टू-इट फूड पर ज्यादा केंद्रित थे। इस दौरान कंपनियों का परिदृश्य बदला और जितना भी स्टाफ ऑफिस आता था, उन्हें पैक्ड फूड चाहिए होता था। हमने तुंरत इसे शुरू कर दिया। और आज ये काफी अच्छा चल रहा है। तो इस वजह से हमें नुकसान नहीं हुआ।

उन्होंने आगे बताया,

“जहां कोर्पोरेट्स में अगर कुछ बिजनेस कम हुआ तो हमने इंडस्ट्रीज और मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट्स में पैक्ड फूड देना शुरू कर दिया जिससे अगर कॉर्पोरेट साइड का बिजनेस लोस हो रहा था तो वह इन यूनिट्स में रिकवर हो गया। दो से ढ़ाई हजार मील्स हम लोग रोज सेल कर रहे हैं।”

“महामारी के दौरान काफी कॉर्पोरेट कंपनीज नें किराए में छूट दी है और मेट्रो कूल जॉइन्ट्स के कर्मचारियों के लिये वेलफेयर एक्टीविटीज भी की, उनका अनेक-अनेक धन्यवाद, ” ललित ने बताया।


यहां देखें पूरा इंटरव्यू



मेट्रो कूल जॉइन्ट्स का बिजनेस मॉडल

कंपनी के बिजनेस मॉडल के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए को-फाउंडर ललित खंडेलवाल कहते हैं,

कॉर्पोरेट कंपनियों में बहुत सारे फुड कोर्ट्स होते हैं। अमेजन, बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट, एसएपी, आदि पर फूड कोर्ट्स में जगह मिलती है। यहाँ अलग-अलग वेरियंट्स होते हैं। कहीं पर हम लोग टक शॉप (सेंडविच, ज्यूस) चलाते हैं तो कहीं पर चाइनीज फूड शॉप। जरूरत के हिसाब से हम अपने आउटलेट्स चलाते हैं।

साल 2018 में पीएम मोदी द्वारा नोटबंदी की घोषणा किए जाने के बाद मेट्रो कूल जॉइन्ट्स ने अपना मोबाइल ऐप ईटईजी (EatEasy) लॉन्च किया। ये एक वॉलेट है जिसके जरिये कस्टमर्स पेमेंट कर सकते हैं।

ललित और उनके साथी को-फाउंडर्स ने वक्त के साथ अपने बिजनेस मॉडल में भी बदलाव किया है।

ललित बताते हैं,

अब लोग इंडस्ट्रीयल कैटरिंग में एंट्री करने जा रहे हैं। क्योंकि महामारी के बाद भी कॉर्पोरेट को उभरने में 4-5 महीनों का समय लगेगा। इस बीच हम लगातार विकास की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं और हमने 2-3 कंपनियों के साथ एमओयू साइन किये हैं। कोरोना काल में भी हमने कंपनी में लगातार मैनपावर को रिक्रूट किया है। हमने बिलकुल भी कॉस्ट कटिंग नहीं की।

कंपनी में अपनी और अपने को-फाउंडर्स की बिजनेस रेस्पोंसिब्लीटीज़ के बारे में बताते हुए ललित ने कहा,

“हमारे ओवरहैड्स नहीं है। मैं मार्केटिंग और सेल्स देखता हूँ, राजेश (शर्मा) प्रक्योरमेंट देखते हैं। विष्णु (अग्रवाल) ने फायनेंस की कमान संभाल रखी है। प्रदीप (शर्मा) कंपनी के ऑवरआल ऑपरेशंस देखते हैं। ये हमारी बहुत बड़ी सेविंग है - कि सारे डिपार्टमेंट्स को हम खुद पर्सनली देखते हैं।”



भविष्य की योजनाएं

मेट्रो कूल जॉइन्ट्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड की भविष्य की योजनाएं पर बात करते हुए को-फाउंडर ललित ने कहा,

“हम लोग पिछले तीन साल से भारतीय रेलवे की सब्सिडरी IRCTC (Indian Railway Catering and Tourism Corporation) के साथ भी काम कर रहे हैं। हाल ही में हमने पुरुलिया (पश्चिम बंगाल) में एक आउटलेट खोला है और इसे आगे बढ़ा रहे हैं। चैन्नई में हमने एमओयू साइन किया है। टीसीएस में हम आउटलेट शुरू करने वाले हैं। इसके अलावा हम लगातार बिजनेस बढ़ा रहे है।”

नया फूड बिजनेस या अन्य कोई बिजनेस शुरू करने वाले लोगों को सलाह देते हुए ललित ने कहा,

“कोई भी बिजनेस शुरू करने से पहले उसे अच्छी तरह से समझें। कम से कम छह महीने आप नौकरी करें करे ताकि बिजनेस की सारी गणित सीख सकें। इसके अलावा जो जरूरी बातें ध्यान में रखनी चाहिए, वो हैं - जगह, मैन्यू, कॉस्टिंग्स, मैनपावर, कस्टमर बिहेवियर आदि।”


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