कॉलेज के लिए रोज सुबह बस की सवारी ने इस CA को ग्रामीण भारत के बारे में सिखाया अहम सबक, जानिए कैसे खड़ा किया रूरल कॉमर्स स्टार्टअप

प्रसन्ना कुमार एक सीए हैं जिन्होंने फाइनेंशियल सर्विस इंडस्ट्री में करीब एक दशक बिताया है। हालांकि उनकी अंतरात्मा हमेशा उन्हें आंत्रप्रेन्योरशिप की ओर कदम बढ़ाने और ग्रामीण भारत के लिए कुछ बनाने के लिए कहती रहती थी।

कॉलेज के लिए रोज सुबह बस की सवारी ने इस CA को ग्रामीण भारत के बारे में सिखाया अहम सबक, जानिए कैसे खड़ा किया रूरल कॉमर्स स्टार्टअप

Tuesday March 15, 2022,

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प्रसन्ना कुमार जब युवा थे, तब वह रोज सुबह कर्नाटक में अपने गांव से थोड़ी दूर एक छोटे कस्बे में स्थित कॉलेज में पढ़ने जाते थे और शाम में वहां से वापस आते थे। उनका कॉलेज थोड़ा दूर था। ऐसे में कॉलेज जाते समय उन दिनों रोज उन्हें अपने आसपास की बदलती दुनिया पर चिंतन करने और उसे समझने के लिए बहुत समय मिलता था।


वह बस से कॉलेज जाते थे और इस दौरान सफर में अपने सह-यात्रियों के साथ बातचीत करते थे, जिनमें से अक्सर कई किराना दुकान के मालिक होते थे। ये दुकानदार अपने दुकान के सामान या सप्लाई को फिर से भरने के लिए शहर की यात्रा करते थे। शाम में आते समय भी उनकी मुलाका इन्हीं लोगों से होती थी, हालांकि इस दौरान उनके पास अपने दुकान के सामानों से भरा कई बड़े बैग होते थे।


प्रसन्ना ने योरस्टोरी के साथ एक बातचीत में बताया, "हर दूसरे गांव की तरह, हमारे गांव के लिए भी बहुत कम बसें थीं। इसलिए जब मैं सुबह शहर जाता था, तो किराना दुकान के मालिक भी उसी बस में आते थे। पूरा दिन मैं कॉलेज में बिताता था, और किराना स्टोर के मालिक बाज़ार में अपने दुकानों का सामान खरीदने में बिताते थे।"


अपना पूरा बचपन और युवावस्था का अधिकांश समय ग्रामीण भारत में बिताने के बाद, प्रसन्ना ने अपने आस-पास के कामकाजी वर्ग के संघर्षों को समझा। खासतौर से किराना स्टोर के मालिकों का, जिन्हें वह अपने कॉलेज जीवन के दौरान रोज देखते थे। किराना दुकानदारों को सामान खरीदते समय दिक्कत यह थी कि उन्हें सारा सामान खुद अपने साथ ले जाना होता था। ऐसे में वह उतना ही खरीदते थे, जितना सामान उठा सकें या अपने साथ ले जा सकें। ऐसे में कई बार उनके सामान हफ्ते के बीच में खत्म हो जाते थे और उन्हें अपने ग्राहकों को लौटाना पड़ता था। हालांकि जिंदगी आगे बढ़ती रहती। प्रसन्ना इन सभी विचारों को अपने दिमाग में रखते हुए जिंदगी में आगे बढ़ गए।


एक दशक तक उन्होंने एक चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में अपना करियर शुरू किया।

Prasanna Kumar,  Founder, VilCart

उन्होंने बताया, "10 साल तक सीए के रूप में काम करने के बाद, मैं ग्रामीण भारत की आर्थिक क्षमता को अच्छे से देख और समझ पाया।"


और ऐसा हो भी क्यों नहीं? ग्रामीण भारत भारत की अर्थव्यवस्था का आधार है। आज, यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब 46 प्रतिशत योगदान ग्रामीण भारत का है। यह देश के शीर्ष एंप्लॉयर में से एक है और इसमें कुल वर्कफोर्स का करीब दो-तिहाई हिस्सा शामिल है।


स्टार्टअप इकोसिस्टम से लेकर भारतीय कारोबारी जगत तक, हर दूसरी कंपनी केवल कस्टमर/ यूजर्स के नजरिए से नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत में मौजूद संभावित क्षमता का लाभ उठाने में सक्षम होने के लिए खुद को नए सिरे से मजबूत कर रही है।


जब प्रसन्ना कॉर्पोरेट फाइनेंस सेक्टर में 10 साल बिताने के बाद ड्राइंग बोर्ड में वापस गए, तो उन्हें पता था कि वह अपने युवावस्था के सह-यात्रियों यानी किराना मालिकों के लिए कुछ समाधान बनाना चाहते हैं।


उन्होंने 2018 में तीन अन्य को-फाउंडरों- महेश भट, राजशेखर और अमित एस माली के साथ मिलकर VilCartको लॉन्च किया। यह एक ईकॉमर्स प्लेटफॉर्म है, जिसका उद्देश्य किराना दुकानों के लिए रूरल लॉजिस्टिक को आसान बनाना है।महेश, राजशेखर और अमित सभी प्रसन्ना की तरह ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं, और व्यक्तिगत रूप से ग्रामीण भारत में दुकानों की कमियों के साक्षी रहे हैं।


ऐसे में जब प्रसन्ना ने उन्हें बताया कि उनके मन में क्या विचार चल रहा है, तो उन्होंने भी प्रसन्ना के साथ उनकी यात्रा में शामिल होने का फैसला किया।

VilCart की फाउंडिंग टीम

VilCart की फाउंडिंग टीम

पुराने के साथ बाहर निकलें, नए के साथ अंदर आएं

विलकार्ट अपनी तरह का एक स्टार्टअप है, जो "ग्रामीण किराना स्टोरों के लिए पुल का काम कर रहा है।" यह मूल रूप से डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करके लॉजिस्टिक, सप्लाई चेन और फाइनेंस से जुड़े ग्रामीण रिटेल स्टोरों के दर्द-बिंदुओं को खत्म करता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह ग्रामीण भारत को उन उत्पादों और वस्तुओं तक पहुंचने में मदद करता है जो आमतौर पर किसी गैर-शहरी स्टोर पर नहीं मिलते हैं।


प्रसन्ना कहते हैं, " पिछले तीन से चार सालों में हमने विलकार्ट के निर्माण में जो महसूस किया है, वह यह है कि ग्रामीण भारत नए उत्पादों का अनुभव करना चाहता है, लेकिन वे आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।"


विलकार्ट वही करता है जो किराना स्टोर के मालिक परंपरागत रूप से करते हैं - वस्तुओं की खरीदना और उन्हें गांवों में रिटेल बिक्री के लिए ले जाना। लेकिन यह इसे एक कदम आगे बढ़कर किराना दुकानों को उन सामानों को भी खरीदने में मदद करता है जो कि आम तौर पर मांग की कमी और ट्रांसपोर्टेशन में कठिनाई सहित कई कारणों से उनके पास नहीं होता है।


सबसे पहले, स्टार्टअप ने किराने की डिलीवरी और FMCG सामानों के साथ शुरुआत की, जहां एक किराना स्टोर का मालिक, विलकार्ट के आसान ऐप या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके, उन वस्तुओं के लिए ऑर्डर दे सकता था, जिन्हें वह स्थानीय बिक्री के लिए स्टॉक करना चाहता था, और करीब तीन दिनों में यह सामान उसके दरवाजे पर पहुंच जाता।


अब, विलकार्ट दुकान मालिकों को सिर्फ रोजमर्रा की वस्तुओं को ऑर्डर करने का विकल्प ही नहीं देता है, बल्कि उन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स, होम अप्लायंस, पशु चारा, बेबीकेयर आइटम, खिलौने, ब्रांडेड फूड प्रोडक्ट और स्नैक्स जैसे कई अन्य विशेष उत्पाद भी ऑर्डर करने की सुविधा देता है।


प्रसन्ना कहते हैं, "शहरी भारत में लॉन्च होने वाला कोई भी उत्पाद अगले तीन से चार सालों में ग्रामीण भारत को प्रभावित करता है। लेकिन असल ग्रामीण भारत पहले दिन से ही उस उत्पाद के लिए तैयार रहते हैं - और यही वह समस्या है जिसका हम समाधान कर रहे हैं।"

VilCart

किराना दुकान मालिकों के लिए, बुनियादी और दैनिक जरूरतों के सामान के अलावा दूसरे उत्पाद खरीदना आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं था क्योंकि उन्हें उन उत्पादों की मांग को लेकर यकीन नहीं था। इसके अलावा इन सब समानों को बस से या दोपहिया के जरिए ढोना भी उनके लिए एक दु:स्वपन था।


विलकार्ट के साथ, यह सब कुछ बदल गया। यह प्लेटफॉर्म न केवल किराना दुकानों को यूजर्स की मांग के अनुसार ऑर्डर देने की अनुमति देता है, बल्कि उन्हें उनके दरवाजे तक भी पहुंचाता है।


विलकार्ट सप्लाई के मोर्च पर, उत्पादों के लिए दूसरे ग्रामीण व्यवसायों का भी इस्तेमाल करता है। उदाहरण के लिए, यह अक्सर गांवों में छोटे व्यवसायों के साथ साझेदारी करता है और अन्य किसानों के उत्पादों को अपने प्लेटफॉर्म पर सूचीबद्ध करता है ताकि दूसरे किराना स्टोर मालिक इन्हें खरीद सकें और इससे किसानों के लिए स्थायी औप त्वरित आय का जरिया पैदा हो सके।


इस सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल ने ना केवल ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद की है, बल्कि किसानों के लिए अपने स्वयं के व्यवसायों के मालिक बनना आसान बना दिया है। इससे वे बड़े कॉरपोरेशंस को सप्लाई करने या बिचौलियों के जरिए उसे बेचने की तुलना में अधिक लाभ कमाते हैं।

क्या बिजनेस मॉडल काम करता है?

हां, और इसका सबूत इस फील्ड में उतर कर ही मिल सकता है।


विलकार्ट अपनी स्थापना के पहले दो वर्षों के दौरान कर्नाटक में केवल एक जिले की सेवा देता था। हालांकि आज यह 5,000 गांवों तक फैल गया है और 45,000 से अधिक किराना स्टोरों में अपनी सेवाएं देता है। कर्नाटक में इसकी पैठ और पहुंच बेमिसाल है और प्रसन्ना का कहना है कि उनकी कंपनी का उद्देश्य राज्य में तब तक अपनी पहुंच बढ़ाते जाना है, जब तक कि हर एक किराना इसका ग्राहक न बन जाए।


ग्रामीण इलाकों और वहां कंज्यूमर साइकल व पैटर्न की गहराई से समझ के चलते स्टार्टअप को लोगों के खरीद पैटर्न को समझने मे मदद मिली, जो यह स्टार्टअप के लिए काफी मूल्यवान रहा है।

भारत में VilCart की मौजूदगी (फोटो साभार: VilCart)

भारत में VilCart की मौजूदगी (फोटो साभार: VilCart)

ग्रामीण भारत के उपभोक्ता फसल की खेती या पशुपालन जैसे कृषि पहलूओं पर बहुत अधिक निर्भर हैं। इन्हीं पहलुओं से जुड़े चक्र उनके खर्च करने की क्षमता को किसी भी समय प्रभावित करते हैं या तय करते हैं।


विलकार्ट ने अपना कामकाज शुरू करने के बाद से काफी डेटा इकठ्ठा किया है। यह डेटा उन्हें दुकानदारों के हिसाब से प्रोडक्ट को अनुकुलित करने में मदद करता है और उन्हें बेहतर फैसले लेने में मदद करता है।


यह डेटा इस बात की भी सापेक्ष सटीकता के साथ भविष्यवाणी करने में सक्षम हैं कि कब किस उत्पाद की बिक्री बढ़ने की संभावना है। इससे उन्हें उस अवधि के लिए अपनी बिक्री रणनीति बनाने में मदद मिलती है।


प्रसन्ना कहते हैं, "हम हर गांव और यहां तक कि आय और व्यय के चालकों के बारे में भी डेटा इकठ्ठा करते हैं, जो त्योहारों और व्यापार मेलों (जिन्हें 'संथे' भी कहा जाता है) जैसे गांवों में होने वाले विशिष्ट कार्यक्रमों पर निर्भर करते हैं। ये महत्वपूर्ण कारक हैं जो खपत को बढ़ाते हैं, और हम अपने डेटा में उन सभी को कैप्चर करते हैं।"

ग्रामीण भारत तक डिजिटल भुगतान ले जाना

टिकटॉक और इसके जैसे ऐप को ग्रामीण भारत के लोगों में FOMO असर पैदा करने और अधिक से अधिक यूजर्स को ऑनलाइन लाने के लिए आप दोष या श्रेय दे सकते हैं। हालांकि तथ्य यह है किइंटरनेट सेवाओं तक पहुंच के मामले में गांवों और छोटे शहरों में लोग अब अपने शहरी समकक्षों से पीछे नहीं हैं।


FOMO का असर होने और ग्रामीण भारत में अधिक यूजर्स को ऑनलाइन लाने के लिए टिकटॉक की पसंद को श्रेय या दोष देना, तथ्य यह है कि गांवों और छोटे शहरों में लोग अब अपने शहरी समकक्षों से पीछे नहीं हैं जब इंटरनेट सेवाओं तक पहुंचने की बात आती है। जियो एक वरदान रहा है, खासतौर से उन फिनटेक स्टार्टअप्स के लिए जो भारत के रिमोट लोकेशन को जोड़ने के लिए वित्तीय समावेश के एजेंड पर काम रहे हैं।


विलकार्ट ने इस क्षेत्र में भी काफी बदलाव किया है।


प्रसन्ना ने बताते हैं, "जब हमने शुरुआत की थी, हम केवल नकद लेनदेन कर रहे थे। आज ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल फाइनेंस की अच्छी पकड़ है और लोग ऐसी तकनीकों को अपनाने के लिए तैयार हैं। हालांकि अभी अधिक वित्तीय प्लेटफार्मों और सेवाओं के लिए निश्चित रूप से गुंजाइश है,"


फिनटेक सेवाओं को सक्षम करने के लिए, विलकार्ट ग्रामीण और क्षेत्रीय बैंकों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में और अधिक आक्रामक तरीके से आगे बढ़ने की योजना बना रहे प्राइवेट कंपनियों के साथ साझेदारी की खोज में हैं।

VilCart

मुनाफे की दिशा में काम करना

चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में प्रसन्ना के 10 वर्षों ने उन्हें पैसे के बारे में बहुत कुछ सिखाया, लेकिन वह सबसे अधिक फाइनेंशियल कंजर्वेटिज्म का इस्तेमाल करते हैं।


उनका कहना है कि विलकार्ट मुनाफे की ओर बढ़ रहा है। इसकी सभी बिजनेस इकाइयों और डिविजनों ने ऑपरेशंस में ब्रेकइवन को छू लिया है और इसके खर्चों को आराम से सीमित कर दिया गया है।


वह कहते हैं, "हमारी कैपिटल इफिशिएंसी अधिक है, साथ ही एंप्लॉयड कैपिटल पर रिटर्न भी अच्छा है। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि हमने काफी कम (वीसी फंडिंग) जुठाया है। CA के कोर्स ने हमें जो कंजर्वेटिज्म सिखाई है, उसने हमेशा मदद की है- खर्च कम करें, पैसा अधिक बनाएं।"


प्रसन्ना ने योरस्टोरी को बताया कि स्टार्टअप ने अब तक कारोबार में 25 करोड़ रुपये का निवेश किया है और यह सालाना 300 करोड़ रुपये की दर से चल रहा है। वह कहते हैं कि स्टार्टअप के पास वर्तमान में लगभग आठ महीने का कैश रनवे है और अच्छी तरह से पूंजीकृत है।


जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने एक स्टार्टअप को कैसे बढ़ाया है जो अभी चार साल का भी नहीं है, तो उन्होंने जवाब में हंसते हुए कहा, "यह एक घर चलाने जैसा है।"


वे कहते हैं, “जब मैं छोटा था, मैं खुद खरीदारी करने जाता था। मेरे माता-पिता मुझे पैसे देते थे और मैं तय करता था कि कैसे खर्च करना है। मैं उस समय किराना दुकानों और दूसरे विक्रेताओं के साथ सौदेबाजी करता था और मैं आज भी अपने किराना पार्टनप के लिए सबसे बढ़िया रेट हासिल करने के लिए ऐसा करता हूं।"


"मैं अभी भी (अपने व्यवसाय में) यही काम करता हूं, लेकिन अधिक मात्रा में और एक टीम के साथ, जो इसमें हमारी मदद करती है"


विलकार्ट की विकास कहानी आज सिर्फ इसके संस्थापकों के ऐसे क्षेत्र में रणनीतिक दांव के बारे में ही नहीं बताती हैं, जिसे काफी कम समझा गया है। बल्कि यह उस संभावना को भी बताती है और सबसे अहम स्मार्ट, टेक आधारित इनोवेशंस की जरूरत को भी बताता है, जिसके लिए ग्रामीण भारत अपने दरवाजे खोल रहा है।


Edited by Ranjana Tripathi

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