कहानी देश के पहले ऑनलाइन रेडियो की, जो बनी उत्तराखंड के हिल की धड़कन

By Prerna Bhardwaj
January 15, 2023, Updated on : Tue Jan 17 2023 11:56:32 GMT+0000
कहानी देश के पहले ऑनलाइन रेडियो की, जो बनी उत्तराखंड के हिल की धड़कन
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जुलाई, 2018 को देहरादून के लोग एक नई आवाज़ के साथ उठे, आवाज़ रेडियो के “मॉर्निंग नंबर 1” शो के RJ काव्य की थी. पहाड़ों की तरह दमदार, लेकिन पहाड़ों से छनकर आने वाली धूप की तरह नर्म काव्य की न सिर्फ आवाज़ अलग है, उनके काम करने का तरीका भी जुदा है. 

 

किसी भी युवा की तरह काम की तलाश में उत्तराखंड के बागेश्वर में जन्में काव्य उर्फ़ कवीन्द्र सिंह मेहता को भी अपना घर छोड़ बाहर रहना पड़ा. कभी जयपुर, कभी कोलकाता, कभी दिल्ली में बतौर रेडियो जॉकी 12 साल का लंबा सफ़र तय कर साल 2018 में अपनी आवाज़, पहाड़ों के प्रति अपना प्रेम और अपने पहाड़ों के लिए कुछ अलग करने का जज़्बा लेकर काव्य उत्तराखंड वापस लौटे. मौका था fm का देहरादून में रेडियो स्टेशन खोलने का निर्णय लेना जहां काम करने के दौरान काव्य का “एक पहाड़ी ऐसा भी” उत्तराखंड के लोगों के बीच बहुत पॉप्युलर हुआ. 

 

साल 2021 की फरवरी में OHO Radio की स्थापना हुई, जो RJ काव्य का अपना ख़ुद का डिजिटल रेडियो स्टेशन है. इसकी ख़ास बात है कि यह उत्तराखंड का ही नहीं देश का भी पहला डिजिटल रेडियो है. यह रेडियो स्टेशन ऐप बेस्ड है इसलिए इसको पूरे उत्तराखंड के साथ-साथ दुनिया भर में कहीं भी डाउनलोड कर सुना जा सकता है. इसके लिए आपके मोबाइल पर इन्टरनेट होना आवश्यक है जो आजकल किसके पास नहीं होता है. 

 

OHO रेडियो की स्थापना के साथ काव्य की कोशिश रही है कि रेडियो को लोगों की आवाज़ बनाई जाए. 

 

लक्ष्य पहाड़ों जैसा था… और इरादे भी. 


तभी OHO रेडियो स्टेशन का नाम, टैगलाइन, विजन, सोच- सबकुछ पहाड़ों से प्रेरित दीखता है और उसी को समर्पित भी. “मेरे हिल की धड़कन” की टैगलाइन, और "सोच लोकल, अप्रोच ग्लोबल" के विज़न के साथ उत्तराखंड की हर बात को OHO रेडियो के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश OHO रेडियो को अन्य सभी FM स्टेशन से अलग करती है. उनका रेडियो ऐप अब तक 3 लाख लोगों ने डाउनलोड किया है. वे अपने श्रोताओं के साथ वाट्सअप के ज़रिए लगातार सम्पर्क में रहते हैं. उनके ऐप में वाट्सअप के लिए एक बटन है. क़रीब 18 हजार श्रोता उस ग्रुप से जुड़े हुए हैं और लगभग हर मिनट OHO के पास एक संदेश आता है. काव्य टेक्नोलॉजी नहीं जानते लेकिन उनकी ऐप सरल और प्रभावी डिज़ाइन का एक बेहतरीन उदाहरण है. यह ऐप उन्होंने नागपुर की एक टेक कम्पनी से बनवाया था. 

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लेकिन आख़िर काव्य को जीवन में यही क्यों करना था? 

उत्तराखंड में उत्तरायणी मेला का बहुत महत्व है जो हर साल मकर संक्रांति पर लगता है. काव्य बताते हैं कि बचपन में जब वो मेला घूमने जाते थे तो उस बड़े मेले में लगे स्टेज को देखकर उस स्टेज पर खड़े होने का सपना देखते थे. शायद वहीं पर उनके मन में OHO जैसा कुछ करने का बीज पड़ा था. उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां रेडियो जॉकी का करियर अभी भी मेनस्ट्रीम नहीं है, वहां से निकलकर काव्य ने इस क्षेत्र में एक मुकाम हासिल किया है. वो उत्तराखंड के चहेते हैं! पिछले साल उसी उत्तरायणी मेले के उस स्टेज पर खड़े होकर काव्य ने अपने लोगों के एक विशाल समूह को संबोधित किया. 

 

काव्य का बचपन का सपना पूरा हुआ. काव्य के लिए यह भावुक करने वाला क्षण था और उन्हें लगता है कि इस सफ़र में अपने लोगों के लिए काम करते रहने से कई और ऐसे क्षण उनके जीवन में आएंगे!

समाज को वापस देना ही जीवन

रेडियो की दुनिया में लगभग 15 साल बिताने की वजह से काव्य न केवल इस माध्यम की पावर समझते हैं बल्कि इस माध्यम की ज़िम्मेदारी भी. काव्य का मानना है कि एक वक़्त के बाद समाज को देने में ही जीवन की सार्थकता निहित है.

 

काव्य जिस समाज से आते हैं वहां की संस्कृति, साहित्य, पर्यटन, खानपान, पहनावे और बोलचाल को बढ़ावा देने के साथ-साथ उसको संरक्षित करना भी अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं. एक क्लिक के साथ उत्तराखंड के बारे में हर तरह की जानकारी समग्र रूप से एक प्लेटफार्म पर मिलने का नाम है OHO रेडियो. एक ऐसा मंच जो एक व्यापक दृष्टि के साथ लोगों को एक ऐसे समाज का निर्माण करने के लिए लाता है, जो एक साथ रहते हैं, सीखते हैं, अनजान होते हैं, फिर से बढ़ते हैं, और एक साथ बढ़ते हैं. उनका यूट्यूब चैनल “उत्तर का पुत्तर” उत्तराखंड की संस्कृति के प्रचार-प्रसार और स्थानीय कलाकारों को एक मंच प्रदान करने के लिए बनाया गया है. अपने समाज को वापस देने का उनका यह तरीका ही उत्तराखंड के लोगों के दिल में उनके लिए स्नेह की सबसे बड़ी और वाजिब वजह दिखती है.

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फ़ौजियों के लिए एक शो अपने दादा और नाना की याद के नाम करना है 

उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जहां के युवा बड़ी संख्या में भारतीय फौज में भर्ती होते हैं. आंकड़ों के मुताबिक, देश की सेना में हर 100वां सैनिक उत्तराखंड का होता है. काव्य के दादा और नाना दोनों ने ही इन्डियन आर्मी में थे और उन्होंने ’62, ’65, ’71 के युद्ध लड़े.

 

इसी वजह से, इतना विस्तृत काम करने के बावजूद एक ऐसा काम है जो काव्य की विशलिस्ट में है. काव्य OHO रेडियो पर एक शो ऐसा करना चाहते हैं जो पूरी तरह से फौज के जवानों के लिए समर्पित हो. वह कहते हैं, “आर्मी बैकग्राउंड से होने के कारण फौज में हमेशा इंटरेस्ट रहा है. बचपन में “बॉर्डर” फिल्म का गाना “संदेशे आते हैं…” सुनकर भावुक हो जाता था और आज इस मुकाम पर पहुंच चूका हूं कि इन शब्दों को चरितार्थ कर सकूं. सियाचिन हो, या नेपाल बॉर्डर, या कश्मीर- फील्ड में जाकर जवानों के बीच में रहकर उन पर एक शो करना चाहता हूं.”

लौट आओ अपने पहाड़

इसी के साथ उत्तराखंड वह राज्य भी है जो पलायन की समस्या से जूझ रहा है. उत्तराखंड के पलायन आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में आजीविका/रोजगार की कमी के कारण बड़ी संख्या में गांवों से पलायन हुआ है. अधिकांश लोग पलायन करके उत्तराखंड के ही नगरों में गए हैं लेकिन राज्य से बाहर जाने वालों की संख्या भी कम नहीं है.  2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ के 3.7 लाख लोगों ने राज्य से अस्थायी रूप से पलायन कर लिया जबकि 1 लाख 18 हजार लोग हमेशा के लिए राज्य छोड़ गए. सैकड़ों गांवों की जनसंख्या कम हुई है और कई गांव लगभग निर्जन हो गए. 

 

पलायन के मुद्दे पर काव्य संवेदनशील दिखते हैं. उनका कहना है कि उत्तराखंड अच्छे-से एक्सप्लोर नहीं हुआ है. यहां टूरिज्म का बहुत स्कोप है. फिर कुछ याद दिलाने के अंदाज़ में कहते हैं कि "उत्तराखंड सिर्फ घूमने-फिरने की जगह नहीं है. यहां क्या नहीं है- फल, फ़ूल, नदियां, पहाड़ और मेहनती लोग! उत्तराखंड की संस्कृति, यहां का खानपान, म्यूज़िक, पहनावा, बोलचाल - ये सारी चीजें अपने आप में समृद्ध हैं. इसलिए होम-स्टे से लेकर एग्रो-बिजनस के स्कोप पर ध्यान दिया जाना चाहिए तभी हम अपने लोगों को यहां रोक पाएंगे.”