लाखों रुपये ट्यूशन फीस लेने पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार, कहा- शिक्षा का उद्देश्य प्रॉफिट कमाना नहीं

By Vishal Jaiswal
November 09, 2022, Updated on : Wed Nov 09 2022 05:54:52 GMT+0000
लाखों रुपये ट्यूशन फीस लेने पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार, कहा- शिक्षा का उद्देश्य प्रॉफिट कमाना नहीं
जस्टिस एम. आर. शाह और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने याचिकाकर्ता नारायण मेडिकल कॉलेज और आंध्र प्रदेश पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. यह राशि छह सप्ताह के अंदर न्यायालय की रजिस्ट्री में जमा करानी होगी.
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शिक्षा लाभ कमाने का जरिया नहीं है और ट्यूशन फीस हमेशा सस्ती होनी चाहिए. इसके साथ ही न्यायालय ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें मेडिकल कॉलेजों में ट्यूशन फीस बढ़ाकर 24 लाख रुपये सालाना किए जाने के राज्य सरकार के फैसले को रद्द कर दिया गया था.


जस्टिस एम. आर. शाह और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने याचिकाकर्ता नारायण मेडिकल कॉलेज और आंध्र प्रदेश पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. यह राशि छह सप्ताह के अंदर न्यायालय की रजिस्ट्री में जमा करानी होगी.


पीठ ने कहा, "फीस (ट्यूशन) बढ़ाकर 24 लाख रुपये सालाना करना, यानी पहले से तय की गई फीस से सात गुना अधिक, बिल्कुल भी उचित नहीं है. शिक्षा लाभ कमाने का व्यवसाय नहीं है. ट्यूशन फीस हमेशा सस्ती होनी चाहिए."


पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ मेडिकल कॉलेज द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 6 सितंबर, 2017 के सरकार के आदेश के तहत इकट्ठा किए गए ट्यूशन फीस को लौटाने के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश में कुछ भी गलत नहीं है. इस तरह 6 सितंबर, 2017 के सरकार के आदेश को रद्द करके हाईकोर्ट ने बिल्कुल सही फैसला किया.


पीठ ने कहा कि ट्यूशन फीस का निर्धारण या समीक्षा करते समय पेशेवर संस्थान का स्थान, पेशेवर पाठ्यक्रम की प्रकृति, उपलब्ध बुनियादी ढांचे की लागत जैसे कई कारकों पर प्रवेश एवं शुल्क नियामक समिति द्वारा विचार किया जाना आवश्यक है. उसने कहा कि कॉलेज प्रबंधन को सरकार के अवैध आदेश के अनुसार एकत्र की गई राशि को अपने पास रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.

प्रॉफिटेबल एजुकेशनल इंस्टीट्यूट को टैक्स में छूट देने से भी कोर्ट का इनकार

इससे पहले अक्टूबर में एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि एक चैरिटेबल एजुकेशनल इंस्टीट्यूट, सोसायटी या ट्रस्ट आयकर छूट का दावा तभी कर सकता है जब वह पूरी तरह से शिक्षा या शिक्षा से संबंधित गतिविधियों से संबंधित हो और उसे किसी भी व्यावसायिक या लाभ में संलग्न नहीं होना चाहिए.


सीजेआई यूयू ललित, जस्टिस एस. रवींद्र भट और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि जहां इंस्टीट्यूट का उद्देश्य प्रॉफिट कमाना होता है, ऐसे संस्थान आईटी अधिनियम की धारा 10 (23सी) के तहत अनुमोदन के हकदार नहीं होंगे.


कोर्ट ने कहा था कि हमारा संविधान एक ऐसे मूल्य को दर्शाता है जो शिक्षा को दान के साथ समानता देता है. इसका मतलब है कि इसे न तो व्यापार और न ही वाणिज्य के रूप में माना जाना चाहिए. इस अदालत ने भी इस संबंध में फैसले दिए हैं.


अदालत आयकर अधिनियम की धारा 10(23सी) की व्याख्या कर रही थी, जो किसी विश्वविद्यालय या अन्य शैक्षणिक संस्थान की ओर से किसी को प्राप्त होने वाली किसी भी आय पर कराधान से छूट देती है. हालांकि, ऐसे संस्थाओं का उद्देश्य केवल शिक्षा होना चाहिए, न कि लाभ कमाना होना चाहिए.