अध्यापक दंपती ने अपनी सैलरी से संवारा गांव का सरकारी स्कूल

20th Mar 2019
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शासकीय प्राथमिक शाला बरमपुर

सोचिए अगर किसी स्कूल को बुनियादी ढांचे की मरम्मत से लेकर स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसी सुविधाओं के लिए सिर्फ 14 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मिलते हों तो उस स्कूल की हालत क्या होगी? आपको क्या लगता है कि इस पैसे में किसी स्कूल की तस्वीर बदली जा सकती है? ये तस्वीर हैरान करने वाली तो है, लेकिन यही हमारे देश के सरकारी स्कूलों की हकीकत है। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के लोरमी गांव में स्थित सरकारी स्कूल को साल भर मरम्मत के लिए सिर्फ 5,000 रुपये मिलते थे। लेकिन 2017 में ये फंड भी मिलने बंद हो गया। इसके बाद स्कूल के हेडमास्टर राम प्रसाद ढिंडोरे ने अपनी तनख्वाह की मदद से इस स्कूल की तस्वीर बदल दी।


राम प्रसाद बीते दिनों को याद करते हुए बताते हैं, 'स्कूल की हालत काफी बदतर थी। बच्चों के बैठने के लिए बेंच नहीं थीं, फर्श टूटी थी, छत से पानी टपकता था। कुल मिलाकर बच्चों के पढ़ने के लिए कोई ढंग की जगह नहीं थी।' 2018 में राज्य सरकार ने सरकारी स्कूल के अध्यापकों की तनख्वाह बढ़ा दी। राम प्रसाद और उनकी पत्नी रीता की सैलरी हर महीने 29,000 रुपये हो गई। जीव विज्ञान पढ़ाने वाली रीता ने अपने पति राम प्रसाद के साथ मिलकर अपनी तनख्वाह से स्कूल की हालत सुधारने का फैसला किया।


बालक और बालिकाओं के लिए अलग-अलग शौचालय

इसके पहले उन्हें हर महीने सिर्फ 12,500 रुपये मिलते थे, इसलिए वे चाहकर भी स्कूल की हालत सुधारने में कुछ योगदान नहीं कर सकते थे। इस पांचवी तक की पढ़ाई कराने वाले इस प्राथमिक स्कूल में लगभग 80 छात्र पढ़ते हैं। लेकिन उन्हें बैठने के लिए सिर्फ दो कमरे बने हैं। इनमें से एक कमरे में सिर्फ कक्षा 5 के बच्चे बैठते हैं वहीं दूसरे कक्षा में बाकी सारे बच्चे।


बीते 14 सालों से ग्रामीण बच्चों को तालीम देने वाले राम प्रसाद हमेशा से बच्चों के भले के लिए सोचते रहते थे। वे कहते हैं, 'हम समाजके लिए कुछ करना चाहते थे ताकि बच्चे हमारे प्रयास को सराह सकें। हम स्कूल की हालत सुधारना चाहते हैं।' जब पहली बार राम प्रसाद की तनख्वाह में इजाफा हुआ तो उन्होंने स्कूल की हालत सुधारने की ठानी। लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे अपने पैसे को कैसे स्कूल में लगाएं।


बदलाव की शुरुआत

नवंबर 2018 में राम प्रसाद ने स्कूल की मरम्मत करानी शुरू की। उन्होंने स्कूल के पुराने ढांचे को ही ठीक कराना बेहतर समझा। वे बताते हैं कि शौचालयों में शीट्स नहीं थीं। उन्होंने सबसे पहले शौचालय की हालत सुधारी, जिसमें उन्हें 16,000 रुपये की लागत आई। उन्होंने स्कूल में बच्चों के किताबें रखने के लिए शेल्फ लगवाए। गांव में रहने वाले बच्चों के पास किताबें नहीं थीं और स्कूल में लाइब्रेरी भी नहीं थी। इसलिए राम प्रसाद ने स्कूल के बच्चों के लिए लगभग 600 किताबें खरीदीं और एक आलमारी भी खरीदी जिसमें बच्चों के लिए किताबें रखी जा सकें। इस तरह से दोनों कमरों में 300-300 किताबें रखी गईं।


राम बताते हैं कि इन किताबों में देश के महापुरुषों- सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी की जीवनियां, विज्ञान से जुड़ी किताबें, करेंट अफेयर्स और कई किताबें। बच्चों को समझाने के लिए स्कूल में ब्लैक बोर्ड नहीं था। नया ब्लैकबोर्ड काफी महंगा आ रहा था इसलिए रामप्रसाद ने दीवार को काले रंग से पुतवा दिया और उसे ब्लैकबोर्ड बना दिया। स्कूल में काफी दिनों से पेंट नहीं हुआ थआ इसलिए पेंट और 18 बोरी वॉल पुट्टी मंगाई गई। हर बोरी की कीमत 850 रुपये थी। इस काम को पूरा होने में 18 दिन लगे। इसके बाद मजदूरी जो दी गई सो अलग।


राम प्रसाद और रीता

राम मानते हैं कि बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और उनके पास महापुरुषों की जानकारी होनी चाहिए जिनके बताए कदमों पर वे चल सकें। इसके लिए राम प्रसाद ने भारतीय इतिहास के विभिन्न महापुरुषों के अलग-अलग 35 पोस्टर्स भी मंगवाए जिन्हें स्कूल की दीवारों पर लगाया गया। रामप्रसाद बताते हैं, 'हमारे इतने प्रयासों के बावजूद स्कूल में काफी कमी थी। हमें जो सुविधाएं चाहिए थीं वो सरकार की तरफ से मुहैया नहीं कराई जा रही थीं। जिसमें कंप्यूटर भी शामिल है।'


रामप्रसाद कहते हैं कि स्कूली बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए काफी संसाधनों की जरूरत होती है जिसमें खेल का मैदान भी शामिल होता है। इसके लिए उन्होंने आठ ट्रक बालू और मिट्टी मंगवाई और बच्चों के खेलने के लिए एक छोटा सा मैदान बनवाया। इस दंपती ने अब तक स्कूल के विकास में लगभग एक लाख रुपये खर्च कर दिए हैं। लेकिन इसके बदले वे सरकार से किसी भी प्रकार के आर्थिक पुरस्कार की उम्मीद नहीं करते हैं। अभी स्कूल में राम और रीता के अलावा एक और अध्यापक प्रमोद कुमार हैं जो कि बच्चो को साइंस, हिंदी और अंग्रेजी पढ़ाते हैं।


इन अध्यापकों की वजह से आज गांव में स्कूल की तस्वीर बदल गई है। राम बताते हैं, 'पांच साल पहले मुकुल नाम का बच्चा गांव में इधर उधर घूमा करता था। मैंने उसे स्कूल में पढ़ने की सलाह दी। मैंने उससे कहा कि अगर वह पढ़ लेगा तो आत्मनिर्भर बन सकेगा। इसके लिए उसके माता-पिता के पास भी गया। आज मुकुल ने 90 फीसदी नंबरों के साथ पांचवी कक्षा पास कर ली है।'


स्कूल का बदला नजारा

राम कहते हैं कि वे हर एक बच्चे को छात्र की तरह नहीं बल्कि एक दोस्त की तरह मानते हैं और उन्हें अपने घर भी बुलाते हैं। वे कहते हैं, 'कोई भी छात्र अच्छा प्रदर्शन करेगा अगर उसे भरोसा हो कि उसकी मदद के लिए अध्यापक हर वक्त मौजूद हैं। इससे न केवल छात्र और अध्यापक के बीच संबंध मजबूत होगा बल्कि उन्हें तेजी से आगे बढ़ने में मदद करेगा।' राम और रीता का एक आठ साल का बेटा और एक दो साल कीबेटी भी है। इस दंपती का एक ही सपना है कि गांव के बच्चे शिक्षित हों और आगे बढ़ें।


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