अपनी पहचान छिपाती नहीं देश की पहली लेस्बियन वेडिंग फ़ोटोग्राफ़र मोनिशा

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'द फोटो डायरी' की संस्थापक मोनिशा अजगांवकर भारत की पहली लेस्बियन वेडिंग फोटोग्राफ़र ही नहीं, मुंबई की मुखर एलजीबीटी एक्टिविस्ट भी हैं। घर-परिवार से अस्वीकार्य अब वह अकेली रहती हैं। अपनी पहचान किसी से छिपाती नहीं। वह 'द फोटो डायरी' की एक यूनिट अमेरिका या कनाडा में भी स्थापित करना चाहती हैं।


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'द फोटो डायरी' की संस्थापक-निदेशक मोनिशा अजगांवकर भारत की पहली मशहूर लेस्बियन 'वेडिंग फोटोग्राफ़र' हैं। आज वह भारत के चुनिंदा 'वेडिंग फोटोग्राफ़र्स' में शुमार हैं। मोनिशा अपने घर-परिवार के लिए अस्वीकार्य मुंबई में अकेली रहती हैं। वह जब जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में पढ़ाई कर रही थीं, तभी उन्हें एहसास हो गया था कि वह लेस्बियन हैं लेकिन इस बात को उन्होंने काफी समय तक उजागर नहीं होने दिया। कुछ साल पहले जब उनके लेस्बियन होने का एक खबर में उल्लेख किया गया, उनके घर वाले भी इस बात को जान गए। फिर उन्हे अपने परिजनों से अलग होना पड़ा। आज वह देश की मशहूर वेडिंग फोटोग्राफ़र ही नहीं, हर समय लेस्बियन समुदाय के लिए संघर्षरत एक मुखर एलजीबीटी एक्टिविस्ट भी हैं। अब वह अपनी पहचान किसी से छिपाती नहीं हैं।


मोनिशा बताती हैं कि उन्होंने फोटोग्राफी के बारे में और अधिक जानने के लिए जिन दिनो जेजे कॉलेज, मुंबई को ज्वॉइन किया, उनके पास कॉलेज नोकिया-6600 मोबाइल फोन था, जिसके कैमरे से पहली बार शूटिंग करने की अपनी ताज़ा सोच से वह रोमांचित थीं। वह पिछले एक दशक से मुंबई में सभी विधाओं में, खासकर वैवाहिक उत्सवों की फोटोग्राफी कर रही हैं। उनकी फोटोग्राफी शादियों के दौरान, आमतौर से दुल्हन और उनके भावनात्मक क्षणों पर केंद्रित होती है। ऐसे क्षणों में उनकी फोटो रिश्तों की उद्दाम तपिश तलाशती रहती है। उनकी फोटोग्राफी की हर छवि एक ग्रेट आर्ट को परिलक्षित करती है। 


मोनिशा ने माहिम के डीजे रूपारेल कॉलेज से साइकोलॉजी में डिग्री ले रखी है। उसके बाद वह पूरे एक साल तक घर पर रहीं। उनके पास कोई काम नहीं था। वह तय करने में व्यस्त थीं कि आखिर भविष्य की कौन सी योजना उनके लिए प्राथमिक होनी चाहिए। आखिरकार, फोटोग्राफी में लग गईं। वह रोलिंग स्टोन्स, पेज थ्री पार्टियां और फैशन इवेंट्स कवर करने लगीं। उन्हीं दिनो अपने एक कैथोलिक दोस्त की शादी की फोटोग्राफी के बाद उन्होंने 'द फोटो डायरी' की शुरुआत की। उनको संगीत समारोहों में शूटिंग करना हमेशा से पसंद रहा है, इस हकीकत के बावजूद कि वह रोज़ाना इतने सारे नए कलाकारों से मिलती हैं। संगीत की अभिरुचि के नाते उन्हें अपने पेशे में नया मोकाम मिला है। एक फोटोग्राफर के रूप में, एक अच्छी याद्दाश्त का एकमात्र तरीका है, अपनी भावना और और अपने अस्तित्व की पहचान।





अब तो मोनिशा शादियां, संगीत प्रोग्राम और फैशन शूट करने में माहिर हो चुकी हैं। अब उनकी 'द फोटो डायरी' को भी देश की टॉप फोटोग्राफी कंपनियों में जगह मिल चुकी है, वह प्री-वेडिंग शूट, फिल्मों आदि में भी गहरी दिलचस्पी लेने लगी हैं। वह फिल्म 'वजीर' के लिए अमिताभ बच्चन के साथ शूटिंग का अपना अनुभव साझा कर चुकी हैं। वह बताती हैं कि उनके लिए वह बहुत ही सुखद क्षण रहा था। उससे उन्हे सबक मिला कि किसी एक क्षेत्र में कोई एक तरह की योग्यता व्यक्ति को परिपूर्ण बनाती है। वह मानती हैं कि वेडिंग फोटोग्राफी के क्षेत्र में रचनात्मकता की अपार संभावनाएं हैं। वह इसे विस्तार देते हुए इसके लिए वह विभिन्न तरह के आधुनिक बाजारों और अवसरों का पता लगाना चाहती हैं। वह अमेरिका अथवा कनाडा में भी 'द फोटो डायरी' की यूनिट स्थापित करना चाहती हैं। 


मोनिशा कहती हैं, अंत में, दुनिया में सब कुछ समाप्त हो जाता है। सिर्फ एक तस्वीर बन जाती है या एक पेंटिंग। सभी कलाएं मनुष्यों द्वारा बनाई गई हैं, जो मनुष्यों द्वारा प्रेरित हैं और मनुष्यों के प्रयास से उत्पन्न हुई हैं। 'द फोटो डायरी' ने समकालीन कला का आविष्कार किया है। उनके प्रयास कुछ लोगों को निरा आदर्शवादी लग सकते हैं लेकिन इससे सपने देखने वालों को कभी-कभी कथानक बदलने में मदद मिलती है। इससे वह अपने सपनों के साथ न्याय कर पाते हैं।


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मुंबई में एक एंत्रप्रेन्योर और लेस्बियन समुदाय की चुनौतियों से निपटने वाली एक सक्रिय एक्टिविस्ट के रूप में वह कई परियोजनाओं पर एक साथ अपने कामों में व्यस्त रहना चाहती हैं। उन्ही परियोजनाओं में एक है- 'एल: लव मैटर्स', जो इस समुदाय के सवालों से मुठभेड़ करने के साथ ही इससे जुड़े लोगों को राह भी दिखाती है। 


मोनिशा बताती हैं कि 'द फोटो डायरी' को स्थापित करने में उनका पाँच साल से अधिक का समय लगा है। तभी से वह  देशभर में व्यक्तिगत और कॉर्पोरेट परियोजनाओं के साथ कई शादियों की शूटिंग करती आ रही हैं। फोटो डायरी अब देश की शीर्ष 10 वेडिंग फोटोग्राफी कंपनियों में से एक है। वह सिर्फ अपने काम के माध्यम से अपने विचारों को साझा करना चाहती हैं। वह उन लोगों की मदद और समर्थन करना चाहती हैं, जो ओपन होने से हिचकते हैं। वह उनको सुरक्षित महसूस कराना चाहती हैं। उनके इस तरह के प्रयासों को सम्मानित किया जा चुका है।





वह कहती हैं कि स्कूल और कॉलेज सीखने का एक बड़ा माध्यम होते हैं, लेकिन व्यावहारिक अनुभव हमें अधिक पेशेवर होना सिखाते हैं। किसी स्थायी नौकरी अथवा व्यवसाय से सिर्फ उसके कौशल और योग्यता को जाना जा सकता है, लेकिन जब वास्तव में समाज के लिए अस्वीकार्यता बहुल कोई काम होता है, उसके जोखिम से अलग हटकर कुछ सीखने को मिलता है। इसी तरह वह हर दिन कुछ न कुछ नया सीखती हैं। वह अपने हुनर को कैमरे के एंगल और लाइटिंग के साथ ज्यादा सहज पाती हैं। वह बताती हैं कि संगीत उनके अंदर जुनून पैदा करता है।


मोनिशा कहती हैं कि उनके समुदाय को एक अलग तरह के बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। खुद को खामोश रखते हुए कमतर आंकना पड़ता है। मीडिया और टेलीविज़न उन्हे स्टीरियोटाइप प्रदर्शित करते हैं। ऐसे में वह अपने काम को अधिकांश अपने जीवन के अनुभवों और वास्तविकताओं पर केंद्रित रखती हैं। उनके एक फोटो निबंध में मुम्बई के विभिन्न स्थानों पर एक वास्तविक जीवन के लेस्बियन जोड़ों को दिखाया गया था, जो निजी क्षणों में बाकी दुनिया जैसे ही दिखें।


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उन्होंने 'लव मैटर्स इंडिया' प्रोजेक्ट की शूटिंग की है, जो वयस्क रिश्तों को नए अर्थ, नए मायने देने की एक खास तरह की कोशिश रही है। उनके समुदाय को लेकर भारतीय समाज के नजरिये में धीरे-धीरे बदलाव तो आ रहा है लेकिन हालात पूरी तरह अनुकूल होने में अभी लंबा वक़्त लगना है। फिलहाल, समुदाय को नई पीढ़ी का समर्थन मिल रहा है, लोग हमे स्वीकारने लगे हैं तो नई सुबह भी कभी न कभी आएगी ही। वह अपने इस समुदाय के सपनों को फोटोग्राफी के जरिए दिखाना चाहती हैं ताकि अधिकाधिक लोग इससे प्रभावित हो सकें। उनकी हर परियोजना उनके अभियान का एक हिस्सा होती है। 

मोनिशा कहती हैं कि फोटो, फिल्में हों या वृत्तचित्र, वह अपने ऐसे हर काम के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त कर अपने समुदाय को सशक्त बनाना चाहती हैं। वे मीडिया में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के तरीके को बदलने को लेकर भी प्रयासरत हैं। आज भी महिलाओं का मीडिया और विज्ञापनों में लगभग 70 प्रतिशत प्रतिनिधित्व नहीं है। उनकी कोशिश स्टीरियो टाइप ब्यूटी का मिथक भी तोड़ना है। वह कहती हैं कि जब तक उनकी अपनी जिंदगी गुमनाम सी रही, किसी ने 'मोनिशा अजगांवकर' को नहीं जाना। फोटोग्राफी और समुदाय की एक्टिविस्ट के रूप में सक्रिय होते ही उनकी उभर आई नई छवि ने उन्हे ढर्रे से हटकर लोगों से जोड़ना शुरू कर दिया।


मोनिशा बताती हैं कि अब, जबकि लेस्बियन समुदाय के लिए बहुत कुछ बदल चुका है, खासकर धारा 377 के डिक्रिमिनलाइजेशन के बाद से, यह कोई रहस्य नहीं है कि अभी एक लंबा रास्ता तय करना है। लोग अब इस समुदाय को स्वीकारने और चाहने लगे हैं, कई बड़े ब्रांड भी उनके अभियान की मेजबानी करने लगे हैं। उनके सपोर्ट में इधर कई लघु फिल्में भी बनी हैं। इस तरह की गतिविधियों से इस समुदाय को खुले में सांस लेने का अवसर मिल रहा है। इस समुदाय के लिए अब एक सबसे बड़ी चुनौती है, उनका आपस में शादियां रचाने और बच्चे गोद लेने की परिस्थितियों की अनुकूलता।




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