वंचितों के टैलेंट का मापदंड सिर्फ मेरिट नही

By जय प्रकाश जय
May 13, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:32:07 GMT+0000
वंचितों के टैलेंट का मापदंड सिर्फ मेरिट नही
आज के जो युवा मेरिट से वंचित रह जा रहे हैं, जिन्हें आरक्षण का भी लाभ नहीं मिल पा रहा है, उनकी चिंता कौन करे? सवाल गंभीर है, चिंताजनक भी। कर्नाटक से जुड़े एक मामले पर फैसला सुनाते हुई माननीय सुप्रीम कोर्ट की इस ताज़ा, महत्वपूर्ण टिप्पणी ने समाज और सिस्टम की उसी दुविधा, उसी सोच को साफ किया है।
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सांकेतिक तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस यूयू ललित और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ की सुनवाई में बेरोजगारी पर आई एक महत्वपूर्ण टिप्पणी ने शायद बहुतों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित नहीं किया हो लेकिन हमारी न्याय व्यस्था से निकली यह सच्ची आवाज विचारधाराओं की मुठभेड़ में फंसे देश के उन हजारों बौद्धिकों के लिए भी जरूर गौरतलब होनी चाहिए कि इस टिप्पणी के बरअक्स, मौजूदा हालात में हमारी पूरी समाज व्यवस्था, पूरा सिस्टम, सीधे तौर पर अपनी असफलताओं ही नहीं, व्यावहारिक उपेक्षा के लिए भी जवाबदेह हो जाता है। आइए, पहले 'कर्नाटक आरक्षण कानून, 2018' की वैधता को सही करार देने वाले फैसले के साथ माननीय न्यायाधीश की वह गौरतलब टिप्पणी पढ़ते हैं।


जस्टिस यूयू ललित और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा है कि सिर्फ किसी परीक्षा से सफलता और टैलेंट तय नहीं होते। परीक्षा के आधार पर बनी मेरिट के लोगों को ही सरकारी नौकरी में अहमियत देने से समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों के उत्थान का हमारे संविधान का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता है। प्रशासन में समाज की विविधता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। समाज का वह वर्ग, जो वर्षों से हाशिए पर रहा हो या असमानता का शिकार होता रहा हो, उसे आरक्षण देने से शासन में उनकी आवाज को पहचान मिलेगी।


तभी 'संपूर्ण सरकार' की परिकल्पना पूरी हो सकती है। मेरिट की परिभाषा किसी परीक्षा में पाए अंकों में सीमित नहीं की जानी चाहिए। इसका आकलन ऐसे कार्यों से होना चाहिए, जो हमारे समाज की जरूरत हैं और जिनसे समाज में समानता और लोक प्रशासन में विविधता लाई जा सके। संसाधन और शिक्षा में असमानता भरे समाज में अगर सरकार का लक्ष्य किसी परीक्षा में ‘सफल’ हुए ‘टैलेंटेड’ व्यक्ति की भर्ती होकर रह जाए, तो संविधान के लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएंगे।


संविधान के अनुच्छेद 335, 16(4) और 46 का हवाला देते हुए माननीय पीठ ने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के उस आलेख का उल्लेख भी किया है, जिसमें कहा गया है कि अगर यह माना जाए कि जो लोग कट ऑफ मार्क्स से अधिक अंक लेते हैं, वही मेधावी हैं, बाकी नहीं, तो यह विकृत सोच है। अगर विविधता और अनेकता को तरजीह नहीं दी गई तो हमारा समाज असमानता के चुंगल से नहीं निकल पाएगा। हमारा मानदंड ही हमारे परिणाम को परिभाषित करता है। अगर हमारी कुशलता का मानदंड बुनियादी तौर पर समान पहुंच पर आधारित होगा तो उसका परिणाम बेहतर होगा।


माननीय न्यायालय ने हमारे समाज और देश के लिए सचमुच बेहद महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि मेरिट प्रत्याशी वह नहीं, जो सफल या टैलेंटेड है, बल्कि वह है, जिसकी नियुक्ति से संविधान के लिए लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिले। संविधान बनाने वालों ने इसे जाति आधारित सामंती समाज में बदलाव लाने वाले उपकरण के तौर पर देखा। वह समाज, जिसमें हाशिए पर रहने वाले समुदायों के प्रति सदियों से शोषण और भेदभाव था।


आलोचक आरक्षण या सकारात्मक विभेद को सरकारी कार्यकुशलता के लिए नुकसानदेह बताते हैं। वे मेरिट के आधार पर चलने वाली व्यवस्था चाहते हैं लेकिन यह मान लेना कि एससी और एसटी वर्ग से रोस्टर के तहत प्रमोट होकर आए कर्मचारी कार्यकुशल नहीं होंगे, एक गहरा मानसिक पूर्वाग्रह है। जब समाज के विविध तबके सरकार और प्रशासन का हिस्सा बनें, उसे प्रशासकीय कुशलता माना जाना चाहिए।


एक और बात नवंबर 2015 की है लेकिन यहां गौरतलब होगी। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में सुपर स्पेशयलिटी कोर्सेज को लेकर योग्यता मानकों को चुनौती देने के संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश में दुःख जताते हुए कहा गया है कि उच्च शिक्षण संस्थाओं से सभी प्रकार के आरक्षणों को समाप्त कर देना चाहिए। देश को आज़ाद हुए इतने दशक बीत गए लेकिन वंचितों के लिए जो सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं उनमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।


उस समय न्यायधीश दीपक मिश्रा और न्यायधीश पीसी पंत की बेंच ने केंद्र सरकार को राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए इस संदर्भ में उपयुक्त कदम उठाने के लिए आगाह किया था कि मेरिट बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कई बार स्मरण दिलाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। मेरिट पर आरक्षण का आधिपत्य रहता है अब समय आ गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए।


यह तो रही न्यायपालिका की पहले, दूसरी तरफ, आज भी मौजूदा परिस्थितियों पर गौर करें तो कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण को समाप्त करने की बात तो दूर उसकी समीक्षा की बात कहने तक से हिचकिचाता है। जब आरक्षण को लागू करने की बात आई थी तब संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ.अम्बेडकर ने कहा था कि हर दस साल के बाद सरकार इसकी समीक्षा करेगी, यदि किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो उसके आगे की पीढ़ी को इस व्यवस्था से वंचित रखा जाए। इस समीक्षा का मतलब ये था कि जिन उद्देश्यों के लिए आरक्षण को प्रारम्भ किया गया है वो कितनी कारगर साबित हुई है।


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