Brands
YSTV
Discover
Events
Newsletter
More

Follow Us

twitterfacebookinstagramyoutube
Yourstory

Brands

Resources

Stories

General

In-Depth

Announcement

Reports

News

Funding

Startup Sectors

Women in tech

Sportstech

Agritech

E-Commerce

Education

Lifestyle

Entertainment

Art & Culture

Travel & Leisure

Curtain Raiser

Wine and Food

Videos

ADVERTISEMENT
Advertise with us

पढ़ें इस हफ्ते की टॉप 5 स्टोरीज़!

पढ़ें इस हफ्ते की टॉप 5 स्टोरीज़!

Saturday May 09, 2020 , 5 min Read

यहाँ हम आपके सामने इस हफ्ते की कुछ टॉप स्टोरीज़ को संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

पढ़ें इस हफ्ते की टॉप स्टोरीज़

पढ़ें इस हफ्ते की टॉप स्टोरीज़



एक उद्यमी किस तरह से अपने सफर की शुरुआत करता है और इससे जुड़े हुए मिथक क्या हैं जिनके चलते आपको अपने उद्यमशीलता के सफर में शुरुआती समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, या किस तरह से दो दोस्त आज ग्रामीण इलाकों तक क्वालिटी आईवियर की पहुँच बढ़ा रहे हैं! ये ऐसी ही कुछ बेहतरीन स्टोरीज़ हैं जो इस हफ्ते प्रकाशित हुई हैं।


ऐसी ही कुछ प्रेरक और रोचक स्टोरीज़ को यहाँ हम आपके सामने संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे जिनके साथ दिये गए लिंक पर क्लिक कर आप उन्हे विस्तार से पढ़ सकते हैं।

रास्ता नहीं रोक सकी बीमारी

आशीष कुमार वर्मा, IDAS अधिकारी

आशीष कुमार वर्मा, IDAS अधिकारी



बिहार के आशीष को बचपन से सेरेब्रल पाल्सी नामक दुर्लभ बीमारी थी। पर बचपन से ही प्रतिभाशाली और पढ़ने-लिखने के शौक़ीन। दिव्यांगों के बारे में प्रचलित हर ‘स्टीरियो टाइप’ को तोड़ा और हर अपनी ज़िंदादिली से मुक़ाम हासिल किया। इस बीमारी का पता लगने के साथ ही डॉक्टरों ने उनके परिवार को बताया कि यह अच्छी बात है कि उनका आईक्यू ठीक नहीं, नहीं तो अधिकांश मामलों में मानसिक क्षमता नष्ट होने की संभावना अधिक रहती है।


आशीष कुमार शर्मा के यूपीएससी परीक्षा क्लियर करने का सफर आप इधर जान सकते हैं। आशीष बताते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब उन्हे स्कूलों में दाखिला भी नहीं मिल रहा था, बावजूद इसके आशीष ने जिस भी स्कूल में दाखिला लिया वहाँ टॉप किया। आशीष ने साल 2011 में यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास की, लेकिन कुछ समस्याएँ उनके साथ फिर भी बाकी रहीं।

मदद करने का जज़्बा

5 साल की अरन्या दत्त बेदी (चित्र: ANI)

5 साल की अरन्या दत्त बेदी (चित्र: ANI)


कोरोना वायरस के चलते बने हालातों में जरूरतमंदों की मदद के लिए लोग आगे आ रहे हैं और अपनी क्षमता के अनुसार मदद भी कर रहे हैं। इस लिस्ट में सबसे खास नाम एक 5 साल की लड़की अरण्या दत्त बेदी का भी जुड़ गया है, जिन्होने जरूरतमंदों की मदद करने के लिए पैसे इकट्ठे करने के लिए एक किताब लिख दी। अरण्या यूनिसेफ और अक्षय पात्र फ़ाउंडेशन के साथ मिलकर पैसे इकट्ठी कर रही हैं।


अरण्या के बारे में आप इधर पढ़ सकते हैं। अरण्या ऐसा करके राहत की भावना महसूस करती हैं क्योंकि वह मानती है कि उसने कमजोर कामगारों की मदद के लिए कुछ किया है और वह जल्द ही और अधिक पुस्तकों को चित्रित करने की योजना बना रही है।

ऐसे हुई कोरोना की खोज

जून अल्मीडा ने सबसे पहले कोरोनावायरस का पता लगाया था

जून अल्मीडा ने सबसे पहले कोरोनावायरस का पता लगाया था।



आज से ठीक छप्पन साल पहले 1964 में जब जून अल्मीडा ने अपने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप में देखा, तो उन्हें एक छोटा गोल, ग्रे डॉट दिखा। तब उन्होंने और उनके सहकर्मियों ने नोट किया कि इसके चारों ओर एक प्रभामंडल बना हुआ था - जैसे सूर्य के कोरोना की तरह। उन्होंने जो देखा वह कोरोनावायरस के रूप में जाना गया, और अल्मीडा ने इसे पहचानने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उपलब्धि सभी के लिए बेहद खास थी क्योंकि 34 वर्षीय अल्मीडा ने अपनी औपचारिक शिक्षा कभी पूरी नहीं की थी।

अल्मीडा ने 16 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया और ग्लासगो रॉयल इन्फ़र्मरी में एक लैब टेक्नीशियन के रूप में काम करना शुरू कर दिया, जहाँ उन्होंने ऊतक के नमूनों का विश्लेषण करने में मदद करने के लिए माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल किया। अल्मीडा की दिलचस्प यात्रा आप ऊपर दिये गए लिंक पर क्लिक कर जान सकते हैं।

ग्रामीण क्षेत्र तक पहुंचा रहे हैं बेहतर आईवियर

क्लियरदेखो के संस्थापक सौरभ और शिवी

क्लियरदेखो के संस्थापक सौरभ और शिवी



भारत जैसे विशाल देश में चश्मों का बाज़ार काफी बड़ा है, लेकिन इन बेहतरीन सेवाओं तक ग्रामीण क्षेत्र की पहुँच बेहद कम है। आज क्लियरदेखो के संस्थापक शिवी सिंह और सौरभ दयाल इस खाईं को पाटने की दिशा में बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ रहे हैं। वे ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते और बेहतर क्वालिटी वाले चश्में उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन यह यात्रा शुरू कैसे हुई ये आप इधर जान सकते हैं।


इस क्षेत्र के बारे में बात करते हुए शिवी कहते हैं,

"भारत में आईवियर इंडस्ट्री 30 प्रतिशत सीएजीआर से बढ़ रही है और यह जानकर हैरानी होती है कि भारत में 70,000 लोगों के लिए केवल एक ही स्टोर उपलब्ध है।"

गौरतलब है कि भारत में अधिकांश ग्रामीण जनसंख्या गुणवत्ता वाले चश्मे नहीं खरीद सकती है, जबकि लेंसकार्ट और बेन फ्रैंकलिन जैसे ब्रांड शहरी केंद्रों की सेवा करते हैं, लेकिन ग्रामीण बाजारों की अच्छे आईवियर तक पहुंच नहीं है।

उद्यमी बनने के मिथक

सांकेतिक चित्र

सांकेतिक चित्र



एक सफल उद्यमी किस तरह से फैसले लेता है या क्या कदम उठाता है, ये सवाल सबके मन में आता है, लेकिन इससे जुड़े हुए कई मिथक भी हैं जो आपको उद्यमशीलता के सफर में आगे बढ़ने से रोकते हैं। ऐसे मिथक को असल में किसी आंत्र्प्रेन्योर या उद्यमशीलता के लिए घातक साबित हो सकते हैं या ये यात्रा की शुरुआत में आपका काफी समय बर्बाद कर सकते हैं। इन मिथकों को जानना आपके लिए बेहद जरूरी है।

इन मिथकों के बारे में आप विस्तार से इधर जान सकते हैं और इस सफर में अपने कदम आगे बढ़ा सकते हैं। हालांकि इस बात पर भी गौर करना आवश्यक है कि उद्यमशीलता के लिए सबके लिए स्थितियाँ एक सी नहीं होतीं।