Women @ work : कम-से-कम दफ्तर में तो औरतों से औरताना व्‍यवहार की उम्‍मीद मत करो

By Manisha Pandey
May 31, 2022, Updated on : Mon Jun 20 2022 11:21:51 GMT+0000
Women @ work : कम-से-कम दफ्तर में तो औरतों से औरताना व्‍यवहार की उम्‍मीद मत करो
अमेरिका की कॉरनेल यूनिवर्सिटी की यह रिसर्च इस पर है कि जब वर्कप्‍लेस यानि काम की जगह पर औरतों से औरताना और मर्दों से मर्दाना व्‍यवहार की उम्‍मीद की जाती है तो इस बात का दोनों जेंडर पर क्‍या असर होता है.
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जेंडर से जुड़े टैबू और उस टैबू से जुड़ी अपेक्षाएं तो स्‍त्री और पुरुष दोनों से होती हैं. मर्दों से उम्‍मीद की जाती है कि वो हमेशा मजबूत और ताकतवर ही रहेंगे, आंसू नहीं बहाएंगे, कमजोरी नहीं दिखाएंगे, नाजुक और वलनरेबल नहीं होंगे. वहीं औरतों से उम्‍मीद की जाती है कि वो ताकतवर नहीं हो सकतीं, आजाद फैसले लेने वाली नहीं हो सकतीं, बुद्धिमान तो हो सकती हैं, लेकिन अपनी बुद्धिमत्‍ता का ज्‍यादा प्रदर्शन न ही करें तो ठीक. उन्‍हें कोमल और नाजुक ही होना चाहिए. हर बात पर मदद और सहारे के लिए मर्दों की ओर मुंह उठाकर देखना चाहिए.


ऊपर लिखी एक भी बात आपके लिए नई नहीं है. लेकिन अगर आपको लगता है कि ऐसे पूर्वाग्रह, टैबू और अपेक्षाएं सिर्फ भारत में ही होती तो आपका यह अनुमान एकदम गलत है. क्‍योंकि अमेरिका की कॉरनेल यूनिवर्सिटी से आई यह स्‍टडी बिलकुल उलट दावा कर रही है. कॉरनेल यूनिवर्सिटी के द न्‍यूयॉर्क स्‍टेट स्‍कूल ऑफ इंडस्ट्रियल एंड लेबर रिलेशंस (आईएलआर) द्वारा यह स्‍टडी की गई है.  


कॉरनेल यूनिवर्सिटी की यह रिसर्च इस बात पर केंद्रित है कि जब वर्कप्‍लेस यानि काम की जगह पर औरतों से औरताना और मर्दों से मर्दाना व्‍यवहार की उम्‍मीद की जाती है तो इस बात पर दोनों जेंडर का रिएक्‍शन क्‍या होता है. रिसर्च कहती है कि मर्दों के मुकाबले औरतें इस तरह की पूर्वाग्रहपूर्ण जेंडर अपेक्षाओं से ज्‍यादा तकलीफ महसूस करती हैं.


कॉनरेल अमेरिका की वही प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी है, जिसे हाल ही में यूके ने दुनिया की सर्वश्रेष्‍ठ यूनिवर्सिटीज की अपनी लिस्‍ट में शामिल किया है.


यह रिसर्च ‘जरनल ऑफ पर्सनैलिटी एंड सोशल साइकॉलजी’ में प्रकाशित हुई है.  


यह स्‍टडी कहती है कि वर्कप्‍लेस पर जब महिलाओं से यह उम्‍मीद की जाती है कि वो ज्‍यादा मददगार, ज्‍यादा दोस्‍ताना, ज्‍यादा सहयोगपूर्ण होंगी तो यह बात महिलाओं को मानसिक रूप से परेशान करती है. हालांकि इस स्‍टडी के मुताबिक महिलाएं खुद मानती हैं कि कॅरियर में आगे बढ़ने में ये सारे गुण मददगार होते हैं. लेकिन जैसे ही इस अपेक्षा का बोझ उन पर डाला जाता है कि वो इस तरह से इसलिए व्‍यवहार करेंगी क्‍योंकि वो महिलाएं तो यह बात महिलाओं को काफी दिक्‍कततलब लगती है.


कॉरनेल यूनिवर्सिटी के आईएलआर स्‍कूल में ह्यूमन रिसोस स्‍टडीज के प्रोफेसर डेवॉन प्राउडफूट कहते हैं कि वर्कप्‍लेस पर महिलाओं से की‍ जाने वाली सकारात्‍मक अपेक्षाओं का भी उन पर नकारात्‍मक प्रभाव ही पड़ता है. वह इसी विषय पर लिखी गई एक किताब 'कॉम्‍युनल एक्‍सपेक्‍टेशंस कॉन्फ्लिक्‍ट विद ऑटोनॉमी मोटिव्‍स' के लेखक भी हैं.


प्रोफेसर डेवॉन कहते हैं कि जिस स्‍त्रीसुलभ गुणों को महिलाएं स्‍वतंत्र रूप से खुद भी एक पॉजिटिव गुण की तरह ही देखती हैं, दफ्तर में उनसे उसकी अपेक्षा किए जाने पर उनका रिएक्‍शन निगेटिव हो जाता है. वजह साफ है कि इसे सिर्फ एक मानवीय गुण की तरह नहीं देखा जा रहा. न ही ये कहा जा रहा है कि वर्कप्‍लेस पर कॉलेबोरिटव माहौल बनाए रखने के लिए यह जरूरी है. उनसे उम्‍मीद की जा रही है कि वो ज्‍यादा मददगार और सबको साथ लेकर चलने वाली इसलिए होंगी क्‍योंकि वो महिला हैं.  

इसके ठीक उलट वर्कप्‍लेस पर जब पुरुषों से ज्‍यादा ताकतवर, ज्‍यादा निर्णायक होने, स्‍वतंत्र रूप से फैसले करने और पहल करने जैसे गुणों की उम्‍मीद की जाती है तो इसका उन पर निगेटिव असर नहीं पड़ता. प्रोफेसर डेवॉन के मुताबिक इसकी वजह भी समाज में प्रचलित वो पूर्वाग्रह ही हैं, जो इन सारे गुणों को पुरुषों के महत्‍वपूर्ण गुण के रूप में देखते हैं.  


इस स्‍टडी में कही गई बातों में कुछ भी नया और आश्‍चर्यजनक नहीं है, सिवा इसके कि पश्चिम का ज्‍यादा आधुनिक समाज आज भी इस तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्‍त नहीं हो पाया है और वहां की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज में से एक इस सामाजिक व्‍यवहार पर रिसर्च कर रही है.