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जब तक 50 फीसदी आबादी बहस से गायब रहेगी, तब तक किसी समस्या का समाधान कैसे निकलेगा: कांक्षी अग्रवाल

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के सवाल को उठाते हुए कांक्षी ने कहा कि इस कमरे में मौजूद हर व्यक्ति राजनीति से प्रभावित होता है. लेकिन हेल्थ, एजुकेशन से लेकर पर्यावरण, आपदा तक जैसे मुद्दों पर बहस तब तक सफल नहीं हो सकती है जब तक आपकी 50 फीसदी आबादी उस बहस से गायब है.

जब तक 50 फीसदी आबादी बहस से गायब रहेगी, तब तक किसी समस्या का समाधान कैसे निकलेगा: कांक्षी अग्रवाल

Sunday March 05, 2023 , 4 min Read

‘मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना’

शुक्रवार को योर स्टोरी के आयोजन SheSparks 2023 के चेंजमेकर्स ऑफ भारत सेशन की शुरुआत नेत्री फाउंडेशन (Netri Foundation) की फाउंडर कांक्षी अग्रवाल ने पाश की इन लाइनों के साथ की.

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के सवाल को उठाते हुए कांक्षी ने कहा कि इस कमरे में मौजूद हर व्यक्ति राजनीति से प्रभावित होता है. लेकिन हेल्थ, एजुकेशन से लेकर पर्यावरण, आपदा तक जैसे मुद्दों पर बहस तब तक सफल नहीं हो सकती है जब तक आपकी 50 फीसदी आबादी उस बहस से गायब है.

उन्होंने आगे कहा, 'राजनीति को गंदा बताकर हमें उससे दूर किया जाता है. भारतीय संसद के इतिहास में पिछले 26 सालों से एक बिल पास नहीं हो पाया है, और वह है महिला आरक्षण बिल. ऐसे भी मौके आते हैं जब महिला सांसदों, विधायकों को हिंसा से बचाने के लिए उनके सहयोगियों को आगे आना पड़ता है.'

उन्होंने आगे कहा कि नेत्री फाउंडेशन के शुरुआत की वजह यह है कि एक नागरिक होने के नाते हमें जो मिला है, उसे महिलाएं आगे बढ़ा सकती हैं. इसका मतलब है कि पॉलिटिक्स, पॉलिसी, गवर्नेंस और डिसिजन मेकिंग में और महिलाएं हो सकती हैं.

वहीं, पिछले 30 सालों से नागरिक सशक्तिकरण की दिशा में काम करने वाली 'वी, द पीपुल अभियान' (We, The People Abhiyan) की ट्रस्टी विनीता गुरसाहनी सिंह ने कहा कि हम सभी के अंदर बदलाव लाने की जिज्ञासा है. सरकार के साथ भी काम करना है, तो कैसे काम करना है.

उन्होंने कहा, 'इसके लिए हमारे पास एक दस्तावेज है, जो भारत का संविधान है. यह बहुत ही नारीवादी दस्तावेज है. यह हमारे लिए फ्री और सर्वसुलभ है. अब हमें यह सीखना है कि हम कैसे इसका इस्तेमाल करके अपनी बेटी को पढ़ने के लिए स्कूल भेज सकते हैं और कैसे अपने घर तक सड़क ला सकते हैं.'

हमारे सामने महिलाओं को यह समझाने की है कि कैसे यह दस्तावेज हमारे लिए उपयोगी है और हम कैसे उसका इस्तेमाल कर सकते हैं. हम अपने सिटिजनशिप एजुकेशन प्रोग्राम के माध्यम से महिलाओं तक पहुंचते हैं और उन्हें संविधान के इस्तेमाल को लेकर जागरुक करते हैं. इस प्रोग्राम के माध्यम से हम 2500 से अधिक महिलाओं को जोड़ चुके हैं.

वहीं, अनुभूति (Anubhuti) की फाउंडर-डायरेक्टर साक्षी श्रीवास्तव आज ऐसे 10 लाख बच्चों को पढ़ा रही हैं, जो कि कभी स्कूल नहीं गए या फिर उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी.

उन्होंने बताया कि अनुभूति की शुरुआत एक छोटे से पार्क में 30 बच्चों के साथ हुई थी. देश के हर बच्चे को क्वालिटी एजुकेशन देने के उद्देश्य से साल 2016 में उन्होंने अनुभूति की शुरुआत की थी. उनका उद्देश्य स्कूलों से कोसों दूर छूट चुके 4.7 करोड़ बच्चों तक पहुंचना है.

उन्होंने कहा, 'हमने एक ब्रिज फेलोशिप की शुरुआत की है. इसमें हम लोकल यूथ के साथ काम करते हैं. ये यूथ अपने आस-पास के लोगों को सशक्त करते हैं ताकि वे ऐसे बच्चों के भविष्य को सुरक्षित कर पाएं.'

उन्होंने आगे कहा, 'किसी समस्या के समाधान के लिए सबसे पहले समस्या की पहचान करना जरूरी है. उदाहरण के तौर पर अगर यहां महिलाओं के लिए कोई प्लेटफॉर्म नहीं है, तो उसके लिए क्या किया जा रहा है? या तो उसके लिए जगह बनाई जा रही है या फिर वे खुद अपनी जगह बना रही हैं.'

इसी तरह सबसे पहले हमें एजुकेशन के लेवल पर समस्या की पहचान करने की जरूरत है और दूसरे सरकार, समाज और समुदाय – हर लेवल में बात करना जरूरी है. इसके साथ ही, पॉलिसी में सुधार की बात करें और उसमें बदलाव लेकर आएं.


Edited by Vishal Jaiswal