‘रुक जाना नहीं’ : 23 साल की उम्र में प्रोफ़ेसर बनने वाले बिहार के प्रशान्त की अनूठी कहानी

By निशान्त जैन, IAS अधिकारी (गेस्ट ऑथर)
June 11, 2020, Updated on : Sat Aug 06 2022 12:04:46 GMT+0000
‘रुक जाना नहीं’ : 23 साल की उम्र में प्रोफ़ेसर बनने वाले बिहार के प्रशान्त की अनूठी कहानी
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आज हम ‘रुक जाना नहीं’ सीरीज़ की 22वीं कड़ी में मिलेंगे 23 साल की अल्पायु में सहायक प्रोफ़ेसर बनने वाले युवा प्रशान्त रमण रवि से, जिन्होंने चंपारण के एक गाँव से निकालकर, तमाम चुनौतियों से जूझते हुए, बनारस और पटना होते हुए, हिमाचल के चंबा जिले के कॉलेज में शिक्षक बनने तक का सफ़र तय किया और एक मिसाल पेश की। उन्होंने अपने पैशन का पीछा किया और उसे पाकर ही दम लिया। आइए, आज सुनते हैं, प्रशान्त की प्रेरक कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी।


23 साल की उम्र में प्रोफ़ेसर बने प्रशान्त रमण रवि

23 साल की उम्र में प्रोफ़ेसर बने प्रशान्त रमण रवि


मेरा जन्म बिहार के पश्चिम चंपारण के एक गाँव पतिलार में हुआ। हाँ, यह वहीं चंपारण है,जहाँ से गाँधी ने सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की थी। 


बचपन अपने सुरूर में सपनों की सतरंगी दुनिया से बाख़बर हो बस बहता जा रहा था। सरकारी स्कूल में बोरे की राजगद्दी, शरारतों पर मास्टर साहब से पिटना, क्रिकेट का जुनून और दोस्तों के साथ मस्ती इतनी सी दुनिया थी। तभी गाँव में एक स्कूल खुला सरस्वती शिशु मंदिर और पिता जी ने इसमें दाख़िला करवा दिया। मेरी आगे की पढ़ाई इसी स्कूल में हुई।


जीवन अपने प्रवाह में खुशियों की सुरीली तान लिए बहता जा रहा था। पिता बहुत पढ़े-लिखे किसान थे। खेती से एक सीमित आमदनी में परिवार का गुजारा हो जाता था। यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन एकदिन पता चला कि माँ को यूट्रस कैंसर हो गया है। छोटी सी उम्र में बस इतना पता था कि यह बहुत खतरनाक बीमारी होती है और इलाज का खर्चा बहुत आता है। यह ख़बर सुनते ही दिल बैठ गया। 


पापा अक्सर माँ को लेकर इलाज के लिए बाहर लेकर जाते थे पर तब यहीं लगता कि माँ को कोई न कोई दिक्कत तो है लेकिन इतनी बड़ी विपत्ति आ पड़ेगी, इसका कोई अंदाज़ न था। ऐसा लगा जैसे सब खत्म हो जाएगा। 


माँ अक्सर कहतीं कि मैं ठीक हूँ और मुझे कुछ नहीं होगा क्योंकि मेरे बच्चे छोटे हैं और मुझे उनके लिए हर हाल में जीना है। माँ की हर बात पर मुझे बचपन से बहुत यकीन रहा। मैं यहीं सोचता रहता कि माँ अगर कहती हैं कि उनको कुछ नहीं होगा तो सच में कुछ नहीं होगा उनको।



कभी-कभी मैं पापा से पूछता, पापा आप इतने पढ़े लिखे हो अपने जमाने के M.A फर्स्ट क्लास हो फिर आपको नौकरी क्यों नहीं मिली? वे मुस्कुरा देते और कहते कि एक मिली थी..फिर शिक्षक की नौकरी मिलने की 100% उम्मीद हो आई तो उसे छोड़ दिया और शिक्षक की नौकरी मिली नहीं। मैं पूछता फिर कब मिलेगी? वे कहते मिल जायेगी। सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है। 


आखिरकार उनको लम्बे संघर्ष के बाद 2012 में नौकरी मिली, तब तक मैं छोटे प्रशान्त से B.A फाइनल ईयर का स्टूडेंट् हो गया था। कैंसर पर माँ की जीत दरअसल उनके विश्वास की जीत थी। लम्बे समय तक चले उनके ट्रीटमेंट और परिवार की परेशानियों में बहुत बार ऐसा लगा कि शायद पढ़ाई भी पूरी हो पायेगी या नहीं, पता नहीं। लेकिन माँ के विश्वास के आगे परेशानियों ने दम तोड़ दिये। वे स्वस्थ हुईं और पापा को नौकरी भी मिली। 


इन्हीं संघर्षों में 2008 में दसवीं की परीक्षा मैं अच्छे अंकों से पास कर गया। स्कूली जीवन से ही मुझे मंच संचालन करना, कविता-कहानी पढ़ना, गीत गाना, खेलकूद में भाग लेना बहुत पसंद था। कक्षा 10 के बाद मैं आर्ट्स पढ़ना चाहता था लेकिन बार-बार मन में यह डर था कि लोग क्या कहेंगे? आर्ट्स तो कमजोर स्टूडेंट्स पढ़ते हैं, बचपन से यहीं सुना था। क्या मैं कमजोर हूँ? नहीं, मैं साइंस पढूँगा।



हालांकि घर से कभी किसी का कोई दबाव नहीं रहा विषय चयन को लेकर। यह मेरा अपना डर था। साइंस ले तो लिया लेकिन मन नहीं लगता था। किसी तरह जीतोड़ मेहनत के बाद 12th पास तो कर 60% नम्बर से पर उससे ज्यादा खुशी इस बात की थी कि लगा कि नया जन्म हुआ हो मेरा और मैं अब आर्ट्स पढूँगा। 2010 में मैंने B.H.U में आर्ट्स के लिए एंट्रेन्स दिया और चयनित हुआ।फिर अपना मनपसंद विषय हिंदी साहित्य चुना और पढ़ने में मजा आने लगा। 


मैं अपने शिक्षक प्रोफ़ेसरों को देखता, उनको सुनता, युवाओं के साथ उनके भावात्मक और संवादी रिश्ते को देखता तो एक आकर्षण इस पेशे में भी आने का होता लेकिन I.A.S का ग्लैमर मुझे बहुत खींचता था। ऐसे में मेरी मदद पटना यूनिवर्सिटी के मेरे गुरुवर प्रोफेसर मटुकनाथ चौधरी ने की। उन्होंने एकदिन मुझे समझाया कि I.A.S बनो या प्रोफेसर महत्वपूर्ण यह है कि दोनों सेवा के माध्यम हैं देखना यह है कि तुम्हें किस काम को करने में ज्यादा खुशी मिलती है, काम वहीं करो जो तुम्हारी रुचि में हो, जिसे करते हुए तुम्हे जिंदगी खूबसूरत लगे। 


उनकी यह बात दिल को छू गई और जल्द ही मैंने तय कर लिया कि मुझे मेरी प्रकृति और रुचि के हिसाब से प्रोफेसर ही बनना चाहिए। मैंने अपनी माँ से पूछा ..माँ!मैं क्या करूँ? माँ ने कहा जो तुम्हारा दिल कहे, वहीं करो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। बस माँ की इतनी सी बात ने बाकी का सारा धुंध साफ कर दिया। नई संकल्प शक्ति,कठिन मेहनत और एक ही सपना कि प्रोफेसर बनना है के आगे मैंने खुद को दीवाना बना दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि 2015 में मैं पटना यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडलिस्ट बना और M.A. करते हुए ही 2015 में मैं UGC नेट की परीक्षा में JRF के लिए चयनित हुआ। 



इसी दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी में मेरा चयन M.Phil के लिए हो गया। मेरे बड़े भाई हेमंत रमण रवि ने भी इस दौरान मुझे बहुत प्यार और मार्गदर्शन दिया। तभी 2016 में M.Phil. के दौरान ही पता चला कि हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती के लिए फार्म आया है। मैंने फॉर्म भरा और जी-जान से उसकी तैयारी में लग गया। परीक्षा बहुत शानदार हुई थी, उम्मीद थी कि साक्षात्कार के लिए भी बुलावा आयेगा।


परीक्षा के बाद जमकर साक्षात्कार की तैयारी करता रहा। जब इंटरव्यू देने गया तो सबसे पहले बोर्ड के एक सदस्य ने कहा कि आप तो बच्चे हैं अभी, प्रोफेसर जैसे तो लग नहीं रहे? मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार किया और धन्यवाद कहा उनको। मेरा इंटरव्यू बहुत अच्छा जा रहा था। अपनी समझ के मुताबिक मैं प्रश्नों का उत्तर दे रहा था और बोर्ड के सदस्य संतुष्ट लग रहे थे। 


तभी मुझसे एक प्रश्न पूछा गया कि बिहार से इतनी दूर नौकरी के लिए हिमाचल क्यों? मैंने कहा कि शिक्षक बनना मेरे लिए नौकरी बाद में है, पहले मेरा जुनून है, मेरा पैशन है, अपने आप को अभिव्यक्त करने का सबसे अच्छा जरिया मेरे लिए यहीं है। इसलिए दूरी का कोई प्रश्न ही नहीं। मेरा यह जवाब उन्हें बहुत अच्छा लगा। जब फाइनल रिजल्ट आया तो पहले प्रयास में ही मैं मेरिट लिस्ट में चयनित था। यह चयन एक बहुत सुखद, रोमांचक और अप्रतिम एहसास से भर देनेवाला था। मुझे यकीन हो गया कि सच में माँ की बातें कभी गलत नहीं होतीं। 


मेरी नियुक्ति हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी के गवर्नमेंट पी.जी कॉलेज चम्बा में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर हो गई। यह उपलब्धि मेरी मेहनत,विश्वास और माँ के विश्वास की जीत थी। जिस दिन मैं असिस्टेंट प्रोफेसर बना, मेरी उम्र महज 23 वर्ष और 2 महीने की हो रही थी। मेरी सफलता का सारा श्रेय मेरी माँ-पिता और भैया को जाता है लेकिन माँ को विशेष जिनसे मैंने हमेशा से संघर्ष में हर्ष खोजने की कला सीखी और एक चट्टानी विश्वास पाया जो हर परिस्थिति में भी सकारात्मक रहना सीखाती है। यही वजह है कि आज मैं अपने इस प्रोफेशन को भरपूर जी रहा हूँ।


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गेस्ट लेखक निशान्त जैन की मोटिवेशनल किताब 'रुक जाना नहीं' में सफलता की इसी तरह की और भी कहानियां दी गई हैं, जिसे आप अमेजन से ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं।


(योरस्टोरी पर ऐसी ही प्रेरणादायी कहानियां पढ़ने के लिए थर्सडे इंस्पिरेशन में हर हफ्ते पढ़ें 'सफलता की एक नई कहानी निशान्त जैन की ज़ुबानी...')