26 साल, 17 राज्य: कुछ ऐसी है आयुर्वेद फार्मा कंपनी माहेश्वरी फार्मास्युटिकल्स की कहानी

1995 में शुरू हुई माहेश्वरी फार्मास्युटिकल्स (Maheshwari Pharmaceuticals) ने दो लाख से अधिक डॉक्टरों को शामिल करके 17 राज्यों में अपनी उपस्थिति स्थापित की है और वित्त वर्ष 20-21 में 36 करोड़ रुपये का कारोबार किया है।

26 साल, 17 राज्य: कुछ ऐसी है आयुर्वेद फार्मा कंपनी माहेश्वरी फार्मास्युटिकल्स की कहानी

Saturday May 22, 2021,

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सीनियर क्वालिटी एश्योरेंस मैनेजर के रूप में दो दशकों तक डाबर के साथ काम करने के बाद, आरपी माहेश्वरी ने उद्यमिता में हाथ आजमाने का फैसला किया। वर्षों तक आयुर्वेद क्षेत्र में काम कर चुके आरपी माहेश्वरी ने बाजार में प्रवेश करने का फैसला किया और 1995 में गाजियाबाद में माहेश्वरी फार्मास्यूटिकल्स इंडिया लिमिटेड (MPIL) की स्थापना की।

MPIL में तीसरी पीढ़ी के उद्यमी और संचालन निदेशक निखिल माहेश्वरी कहते हैं, "मेरे दादाजी को आयुर्वेद उद्योग का गहरा ज्ञान था। वह जानते थे कि यह काफी हद तक नया बाजार था। किफायती कीमत पर प्रीमियम गुणवत्ता वाली दवाओं की उपलब्धता की कमी थी और वह इस अंतर को भरना चाहते थे।"

26 से अधिक वर्षों की अवधि में, MPIL ने 17 भारतीय राज्यों में खुद को स्थापित किया है, दो लाख से अधिक BMS डॉक्टरों के साथ साझेदारी की है और वित्त वर्ष 2020-21 में 36 करोड़ रुपये का कारोबार किया है।


YourStory के साथ बातचीत में, निखिल ने विस्तार से बताया कि कैसे एक नैतिक व्यवसाय मॉडल का पालन करते हुए व्यवसाय तेजी से बढ़ा है और भारतीय बाजार में आयुर्वेद का भविष्य कैसा दिखता है।

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MPIL की प्रोडक्ट रेंज

शून्य से एक ब्रांड की स्थापना

MPIL के लिए, उपभोक्ताओं के बीच खुद को एक आयुर्वेदिक ब्रांड के रूप में स्थापित करना आसान नहीं था क्योंकि डाबर और बैद्यनाथ जैसी कंपनियां न केवल ब्रांड स्केलेबिलिटी के मामले में बल्कि वफादार ग्राहक आधार के मामले में भी अग्रणी थीं।

निखिल कहते हैं, "एक पहचानने योग्य ब्रांड स्थापित करने के लिए एक प्रक्रिया होती है। मेरे दादाजी ने सोचा कि शुरू से ही उपभोक्ताओं को टारगेट करना अच्छा नहीं था, और इसलिए उन्होंने संस्थागत बिक्री में प्रवेश करने का फैसला किया।”

प्रत्येक राज्य सरकार अपने बजट का एक हिस्सा दवाओं की खरीद के लिए आवंटित करती है, और आरपी ने इसे ही टारगेट किया। हालांकि 1990 के दशक के दौरान सरकार ने कई आयुर्वेदिक दवाओं की खरीद नहीं की थी, लेकिन निखिल मोटे तौर पर बताते हैं कि खरीद का 90 प्रतिशत एलोपैथिक दवाओं के लिए और 10 प्रतिशत आयुर्वेदिक दवाओं के लिए था।


आरपी ने दिल्ली सरकार के साथ मिलकर अपना व्यवसाय शुरू किया, और फिर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि के साथ अनुबंध किया।


एक साल बाद, 1996 में दूसरी पीढ़ी के उद्यमी तरुण माहेश्वरी व्यवसाय में शामिल हुए।

निखिल कहते हैं, “ब्रांड की स्थापना के एक साल बाद मेरे पिता व्यवसाय में शामिल हुए और एक ऑफलाइन बिजनेस मॉडल की दिशा में काम करना शुरू किया। उनके समय में ही हमने डॉक्टरों तक अपनी पहुंच का विस्तार किया और ऑफलाइन रिटेल चैनल में दवा की मार्केटिंग की।”

तरुण ने एक नैतिक व्यवसाय मॉडल की शुरुआत की, जहां कंपनी ने चिकित्सा प्रतिनिधियों (एमआर) को नियुक्त किया जो ब्रांड की दवाओं के लिए डॉक्टरों के पास जाते थे। MPIL ने एक राज्य-वार टीम की स्थापना की जो स्टॉकिस्ट और केमिस्ट के साथ काम करती है।


आज, MPIL 17 भारतीय राज्यों में मौजूद है और देश के उत्तरी, मध्य और पश्चिमी हिस्सों पर हावी है। कंपनी ने दो लाख से अधिक बीएमएस डॉक्टरों के साथ करार किया है जो अपने मरीजों को एमपीआईएल की दवाएं लिखते हैं। बहुत छोटे स्तर पर, MPIL भारत के कुछ प्रमुख आयुर्वेदिक ब्रांडों के लिए कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग भी करता है।


निखिल 2019 में कारोबार में शामिल हुए और तब से, ब्रांड ने डिजिटल बिक्री मॉडल पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया।

कोविड-19 के बीच आयुर्वेद उद्योग कैसे बदल गया

आयुर्वेद की उत्पत्ति लगभग 5,000 साल पहले भारत में हुई थी, और इसका उल्लेख अथर्ववेद में पाया गया है, हालांकि, आधुनिक चिकित्सा को अपनाने के साथ इसका प्रभाव कम होता जा रहा है। निखिल का कहना है कि जब दो दशक पहले एमपीआईएल की शुरुआत हुई थी, तब आयुर्वेद उद्योग बढ़ रहा था, लेकिन समग्र उपचार के इस रूप के प्रति लोगों में ज्यादा भरोसा नहीं था।

वह कहते हैं, “राज्य सरकारें केवल 10 प्रतिशत आयुर्वेदिक दवाओं की खरीद कर रही थीं। 2014 और आयुष मंत्रालय के गठन के बाद लोगों में आयुर्वेद के प्रति जागरूकता बढ़ी है और हमने ट्रेंड बदलते देखा है।"

MPIL अभी भी संस्थागत बिक्री कर रही है और निखिल का कहना है कि अभी भी आयुर्वेदिक दवाओं का योगदान एलोपैथी की तुलना में ज्यादा नहीं है, हालांकि, 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस तथ्य को देखते हुए कि आयुर्वेदिक दवाएं जीवन रक्षक दवाएं नहीं हैं, बल्कि बीमारियों को रोकने और धीमी गति से इलाज करने के लिए हैं, इसलिए वह कहते हैं कि सरकार की ओर से मांग भी कम है।


उन्होंने कहा, "एलोपैथी की मांग कभी कम या नीचे नहीं होगी।"


पिछले साल से कोविड-19 महामारी के देश में आने के बाद से बहुत कुछ बदल गया है और आयुर्वेद एक चर्चा का विषय बन गया है। वह कहते हैं, “हमने उपभोक्ता मांग में अचानक बदलाव देखा है क्योंकि लोग अपनी प्रतिरक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक उपचार के इस तरीके की ओर बढ़ रहे हैं। हमारे पास लगभग 300 प्रोडक्ट हैं, और पिछले एक साल में, हमारे रेस्पिरेटरी हेल्थ प्रोडक्ट अमास्ता अवलेहा की मांग कई गुना बढ़ गई है।”


निखिल का दावा है कि इम्युनिटी बूस्टर की मांग इतनी अधिक हो गई है कि हर पांच मिनट में एक एमपीआईएल उत्पाद अमेजॉन पर बेचा जाता है।


1mg और Netmeds सहित MPIL सभी प्रमुख दवा वितरण प्लेटफार्मों पर उपलब्ध है।

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निखिल माहेश्वरी, संचालन निदेशक, MPIL

यूएसपी मायने रखती है

भारत के आयुर्वेदिक उत्पादों का बाजार आकार 2021 और 2026 के बीच 15 प्रतिशत के सीएजीआर से बढ़ने की उम्मीद है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे देश में कॉरपोरेट इनोवेटिव प्रोडक्ट्स को डेवलप करने और उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता पैदा करने पर जोर दे रहे हैं, जिससे बाजार में इसके ग्रोथ में और मदद मिलने की उम्मीद है।


स्टार्टअप्स और डाबर, बैद्यनाथ, पतंजलि, श्री श्री तत्त्व व इस सेक्टर के अन्य लीडर्स से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बारे में बात करते हुए, निखिल का कहना है कि प्रत्येक ब्रांड की अपनी यूएसपी होती है।


वह कहते हैं,

“आप देखिए कि डाबर के पास हाजमोला है, और कोई अन्य ब्रांड कभी भी उस उत्पाद का मुकाबला नहीं कर सकता है। 1 रुपये में वे आपको वैक्यूम सीलबंद पैक में तीन-चार गोलियां देते हैं। यह उनकी यूएसपी है और अन्य कंपनियों के साथ भी ऐसा ही है। प्रत्येक ब्रांड की एक यूएसपी होती है और यह हमारे मामले में भी है।”

25 से अधिक वर्षों से इस उद्योग में काम करते हुए, निखिल का कहना है कि एमपीआईएल ने अपने लिए एक जगह बनाई है। ब्रांड की यूएसपी में से एक यह है कि कंपनी के प्रोडक्ट 100 प्रतिशत प्राकृतिक हैं। वहीं इसके उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद उचित मूल्य सीमा पर बेचे जाते हैं।


MPIL अधिकांश कच्चे माल की खरीद स्थानीय स्तर पर करती है और साहिबाबाद और सिडकुल में अत्याधुनिक मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी हैं। सिडकुल फैसिलीट आयुष मंत्रालय, आईएसओ जीएमपी द्वारा मान्यता प्राप्त है, और इसके पास एक ऑर्गैनिक सर्टिफिकेट भी है। नए जमाने के मैन्युफैक्चरिंग इनोवेशन से लैस, निखिल का दावा है कि प्लांट प्रति दिन दो करोड़ टैबलेट का उत्पादन करता है, और इसमें 30,000 यूनिट / दिन की तरल भरने की क्षमता भी है।

आगे का रास्ता

निखिल बताते हैं कि एमपीआईएल अभी जिस चीज में पीछे है, वह है व्यापक मार्केटिंग। निकट भविष्य में, कंपनी अपनी मार्केटिंग पहलों को तेज करने की योजना बना रही है।


MPIL अधिक राज्यों में विस्तार करने और अधिक डॉक्टरों को जोड़ने के लिए अपने फंड में विविधता लाने की भी योजना बना रही है। निखिल कहते हैं, "एक मजबूत आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाकर और डिजिटल युग में अपनी उपस्थिति को मजबूत करके, हम भारत में आयुर्वेद के परिदृश्य को बदलने की कल्पना करते हैं।"


Edited by रविकांत पारीक