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गिरिजा कुमार के सृजन पर मुग्ध थे महाप्राण निराला

'तार सप्तक' के कवि के जन्मदिन पर विशेष...

जय प्रकाश जय
22nd Aug 2018
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आजीवन अपने शब्दों में थके-हारे लोगों की जिंदगी के करीब रहे हिंदी के ख्यात कवि, नाटककार, समालोचक गिरिजा कुमार माथुर में कविता का संस्कार उनमें बचपन से ही घुल-मिल गया था। महाप्राण निराला को उनके शब्दों का विद्रोही तेवर ज्यादा पसंद आता था।

गिरिजा माथुर 

गिरिजा माथुर 


 ब्रजभाषा में सवैये लिखने से शुरुआत करने के बाद गिरिजाकुमार माथुर का पहला जो संकलन 'मंजीर' आया, उसमें गीत संकलित थे, और उसकी भूमिका निराला जी ने लिखी थी।

हिंदी के ख्यात कवि, नाटककार, समालोचक गिरिजा कुमार माथुर का 22 अगस्त को जन्मदिन होता है। ग्वालियर (म.प्र.) के अशोक नगर में रह रहे साहित्य एवं संगीत के शौकीन स्कूल अध्यापक पिता देवीचरण माथुर के संस्कार कवि गिरिजाकुमार में बचपन से ही गहरे में घुल-मिल गए थे। मां लक्ष्मीदेवी भी शिक्षित थीं। पिता से अंग्रेजी, इतिहास, भूगोल आदि की प्रारम्भिक शिक्षा उनको घर पर ही मिली। बाद में ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से उन्होंने बी.ए.और लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। उन्हीं दिनो वह विद्रोही काव्य परम्परा के रचनाकार माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन आदि की रचनाओं से अत्यधिक प्रभावित हुए और 1941 में उनका प्रथम काव्य संग्रह 'मंजीर' हिंदी पाठकों के बीच पहुंचा। उनके शब्द हमेशा आम आदमी के जीवन की सच्चाइयों से करीब बने रहे -

कौन थकान हरे जीवन की?

बीत गया संगीत प्यार का,

रूठ गयी कविता भी मन की ।

वंशी में अब नींद भरी है,

स्वर पर पीत सांझ उतरी है

बुझती जाती गूंज आखिरी

इस उदास बन पथ के ऊपर

पतझर की छाया गहरी है,

अब सपनों में शेष रह गई

सुधियां उस चंदन के बन की ।

रात हुई पंछी घर आए,

पथ के सारे स्वर सकुचाए,

म्लान दिया बत्ती की बेला

थके प्रवासी की आंखों में

आंसू आ आ कर कुम्हलाए,

कहीं बहुत ही दूर उनींदी

झांझ बज रही है पूजन की ।

कौन थकान हरे जीवन की?

गिरिजाकुमार माथुर पर केंद्रित पुस्तक 'नई कविता' के बहाने डॉ. अजय अनुरागी बताते हैं कि कवि श्रीकांत वर्मा ने माथुर जी के कविता संकलन 'धूप के धान' का रिव्‍यू लिखा था और उनकी कविता की गीतात्‍मकता और प्रगतिशील लोकचेतना की सराहना की थी लेकिन उसके एक दशक के अंतराल में ही उनका मंतव्‍य बदल गया। वर्ष 1968 में एक परिचर्चा के दौरान वर्मा अकविता आंदोलन के संदर्भ में कह दिया कि हज़ार साल कविता लिखने के बाद भी साहित्‍य इन अकवियों को स्‍वीकार नहीं करेगा। अकविता लिखने वाले जितने भी कवि हैं, वे सभी गँवई संस्‍कारों से आते हैं और उनके आदर्श गिरिजाकुमार माथुर हैं।' ब्रजभाषा में सवैये लिखने से शुरुआत करने के बाद गिरिजाकुमार माथुर का पहला जो संकलन 'मंजीर' आया, उसमें गीत संकलित थे, और उसकी भूमिका निराला जी ने लिखी थी।

निराला जी उनके रचनात्मक तेवर और कविता में टटकेपन पर मुग्ध रहते थे। उसके बाद 'तारसप्‍तक' से वह नई कविता के स्‍वर बने। 'तारसप्‍तक' के लिए माथुर का चयन स्‍वयं अज्ञेयजी ने किया था। नवगीत और राजनीतिक कविता में भी उनकी गतियाँ रहीं, लेकिन मुक्तिबोध और फिर रघुवीर सहाय के बाद का हिंदी कविता का जो परिदृश्‍य बना, उसमें माथुर की आवाजाही शिथिल पड़ती चली गई। अंतत: वे न बच्‍चन-सुमन-अंचल-नवीन की श्रेणी के जनगीतकार या वीरेंद्र मिश्र-मुकुटबिहारी सरोज की श्रेणी के गीतकार रह गए, न धूमिल-सौमित्र-जगूड़ी की तरह अकवि कहलाए, न ही नागार्जुन-त्रिलोचन-केदार की प्रगतिवादी कविता की श्रेणी में उन्‍हें रखा जा सका। अपनी 'नया कवि' कविता में वह लिखते हैं -

जो अंधेरी रात में भभके अचानक

चमक से चकचौंध भर दे

मैं निरंतर पास आता अग्निध्वज हूँ

कड़कड़ाएँ रीढ़

बूढ़ी रूढ़ियों की

झुर्रियाँ काँपें

घुनी अनुभूतियों की

उसी नई आवाज़ की उठती गरज हूँ।

जब उलझ जाएँ

मनस गाँठें घनेरी

बोध की हो जाएँ

सब गलियाँ अंधेरी

तर्क और विवेक पर

बेसूझ जाले

मढ़ चुके जब

वैर रत परिपाटियों की

अस्मि ढेरी

जब न युग के पास रहे उपाय तीजा

तब अछूती मंज़िलों की ओर

मैं उठता कदम हूँ।

जब कि समझौता

जीने की निपट अनिवार्यता हो

परम अस्वीकार की

झुकने न वाली मैं कसम हूँ।

हो चुके हैं

सभी प्रश्नों के सभी उत्तर पुराने

खोखले हैं

व्यक्ति और समूह वाले

आत्मविज्ञापित ख़जाने

पड़ गए झूठे समन्वय

रह न सका तटस्थ कोई

वे सुरक्षा की नक़ाबें

मार्ग मध्यम के बहाने

हूँ प्रताड़ित

क्योंकि प्रश्नों के नए उत्तर दिए हैं

है परम अपराध

क्योंकि मैं लीक से इतना अलग हूँ।

सब छिपाते थे सच्चाई

जब तुरत ही सिद्धियों से

असलियत को स्थगित करते

भाग जाते उत्तरों से

कला थी सुविधा परस्ती

मूल्य केवल मस्लहत थे

मूर्ख थी निष्ठा

प्रतिष्ठा सुलभ थी आडम्बरों से

क्या करूँ

उपलब्धि की जो सहज तीखी आँच मुझमें

क्या करूँ

जो शम्भु धनु टूटा तुम्हारा

तोड़ने को मैं विवश हूँ।

गिरिजाकुमार माथुर की रचनाओं का प्रारम्भ द्वितीय विश्वयुद्ध की घटनाओं से उत्पन्न प्रतिक्रियाओं से हुआ। उन दिनो स्वतंत्रता आन्दोलन से वह प्रभावित रहे। सन् 1943 में जब अज्ञेय द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित 'तारसप्तक' के सात कवियों में से एक गिरिजाकुमार का भी चयन हुआ, हिंदी साहित्य में उनकी यशोपताका फहराने लगी। कविता के साथ ही वह एकांकी नाटक, आलोचना, गीति-काव्य तथा शास्त्रीय विषयों पर भी लिखने लगे। सन् 1991 में उनको कविता संग्रह 'मै वक्त के सामने' के लिए हिंदी का साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1993 में बिरला फ़ाउंडेशन के प्रतिष्ठित 'व्यास सम्मान', बाद में 'शलाका पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया। उस दौरान उनके मंदार, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले आदि काव्य-संग्रह तथा खंड काव्य पृथ्वीकल्प प्रकाशित हुआ। भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की साहित्यिक पत्रिका 'गगनांचल' का संपादन करने के साथ ही उन्होंने कहानी, नाटक तथा आलोचनाएँ भी लिखीं। उनका ही लिखा एक भावान्तर गीत 'हम होंगे कामयाब' समूह गान के रूप में आज भी अत्यंत लोकप्रिय है -

होंगे कामयाब, होंगे कामयाब

हम होंगे कामयाब एक दिन

हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

हम होंगे कामयाब एक दिन

होंगी शांति चारो ओर

होंगी शांति चारो ओर

होंगी शांति चारो ओर एक दिन

हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

होंगी शांति चारो ओर एक दिन

हम चलेंगे साथ-साथ

डाल हाथों में हाथ

हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन

हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन

नहीं डर किसी का आज

नहीं भय किसी का आज

नहीं डर किसी का आज के दिन

हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

नहीं डर किसी का आज के दिन

हम होंगे कामयाब एक दिन

गिरिजाकुमार की समग्रता से सुपरिचित होने के लिए उनकी पुस्तक 'मुझे और अभी कहना है' अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। तारसप्तक में प्रकाशित उनकी रचनाओं में हिंदी कविता की प्रयोगशीलता और प्रगतिशीलता, दोनो एक साथ देखी जा सकती हैं। मार्क्सवाद का उन पर भी प्रभाव रहा। नाश और निर्माण की कविताएँ लिखते समय (1939 से 1945) यह प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, जो बाद में धूप के धान, शिला पंख चमकीले, साक्षी रहे वर्तमान, मैं वक्त के हूँ सामने संग्रहों में देखा जा सकता है। वह लिखे हैं - 'मार्क्सवाद के अध्ययन से मेरी ऑंखें खुल गयीं। मुझे स्पष्ट हुआ कि राजनीति की समझ के बिना यथार्थ की पहचान नहीं हो सकती। सत्ता का स्वरूप, राजनीति, समाज का आर्थिक आधार, ठोस यथार्थ, वर्ग चेतना, इतिहास की द्वन्द्वात्मकता, दमन और शोषण से मानवीय समता और स्वाधीनता का नया रास्ता नजर आने लगा। वस्तुत: मार्क्सवाद को मैंने अपने देश की जन परम्परा और सांस्कृतिक उत्स की मिट्टी में रोपकर आत्मसात कर लिया और एक नयी जीवन दृष्टि मुझे प्राप्त हुई। मुक्ति के यही मूल्य मेरी कविता को झंकृत और उद्दीप्त करते रहे हैं।'

गिरिजाकुमार माथुर को रूपवादी, शरीरवादी, शिल्पवादी, कलावादी, अज्ञेयवादी, छंदवादी कोटि में रखा गया है लेकिन उनके काव्य के महत्त्व को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा। उन्होंने विविध विषयों एवं संवेदनाओं को काव्य में स्थान देकर कविता के हृदय का विस्तार किया है। परम्परा को तोड़कर नये मार्ग पर चलने के कारण उन्हें भी अन्य रचनाकारों की तरह सदैव विरोध, उपेक्षा और प्रताड़नाएँ सहन करनी पड़ीं। वह हमेशा काव्य के नये मार्गों की तलाश में रहे। बहुसोपान के शरणार्थी होने के बावजूद वह एक दुर्बोध या जटिल कवि नहीं रहे। ऐसे में संभवत: उनकी कविता में प्रवेश करने के लिए किसी भी शोध-प्रबंध की अपेक्षा स्‍वयं उनकी कविता ही बेहतर विकल्‍प बनी -

मेरे युवा-आम में नया बौर आया है

ख़ुशबू बहुत है क्‍योंकि तुमने लगाया है

आएगी फूल-हवा अलबेली मानिनी

छाएगी कसी-कसी अँबियों की चाँदनी

चमकीले, मँजे अंग

चेहरा हँसता मयंक

खनकदार स्‍वर में तेज गमक-ताल फागुनी

मेरा जिस्‍म फिर से नया रूप धर आया है

ताज़गी बहुत है क्‍योंकि तुमने सजाया है

अन्‍धी थी दुनिया या मिट्टी-भर अन्‍धकार

उम्र हो गई थी एक लगातार इन्‍तज़ार

जीना आसान हुआ तुमने जब दिया प्‍यार

हो गया उजेला-सा रोओं के आर-पार

एक दीप ने दूसरे को चमकाया है

रौशनी के लिए दीप तुमने जलाया है

कम न हुई, मरती रही केसर हर साँस से

हार गया वक़्त मन की सतरंगी आँच से

कामनाएँ जीतीं जरा-मरण-विनाश से

मिल गया हरेक सत्‍य प्‍यार की तलाश से

थोड़े ही में मैंने सब कुछ भर पाया है

तुम पर वसन्‍त क्‍योंकि वैसा ही छाया है।

यह भी पढ़ें: त्रिलोचन ने कभी न खुशामद की, न स्वाभिमान से डिगे

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