आईक्यू से ईक्यू तक आधी आबादी कर रही भविष्य के उन्नत विश्व की पहल

आईक्यू से ईक्यू तक आधी आबादी कर रही भविष्य के उन्नत विश्व की पहल

Thursday October 24, 2019,

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"सतह से जरा सा ऊपर उठ कर देखें, अपने आसपास से भी सबक लेते चलें तो साफ साफ नजर आ रहा है कि आज की आधी आबादी जिस दिशा में जा रही है, उसके मन में जो चल रहा है, आने वाले समय में दुनिया की तस्वीर बदलने में उसकी हर पहल बेमिसाल हो सकती है।" 

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नताशा नोएल, अरण्या जौहर और राया बिदशहरी

इन दिनो दिल्ली में एक इंटरनेशनल मीडिया हाउस की फ़्यूचर कॉन्फ्रेंस में भारत एवं अन्य देशों में अलग-अलग कार्यक्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ने वाली संभावनशील एवं जागरूक महिलाएं जिस तरह की बातें बता रही हैं, उसे कत्तई अनदेखा नहीं किया जा सकता है। वे बता रही हैं और चाह भी रही हैं कि महिलाओं के लिए भविष्य कैसा होने वाला है अथवा वह भविष्य कैसा होना चाहिए।


योग गुरु और मोटिवेशनल स्पीकर नताशा नोएल बॉडी पॉज़िटिविटी पर ज़ोर देती हुईं ख़ुद से भी प्यार करते रहने की जरूरत महसूस कराती हैं। वह बताती हैं कि कैसे उन्होंने तीन साल की उम्र में अपनी मां को खो दिया और यौन शोषण का सामना किया। उन्होंने सात साल की उम्र में वह दुख झेला। वह अब भी संघर्ष कर रही हैं, लेकिन अब वह रोज अपने आप से प्यार करना भी सीख रही हैं। दूसरों के लिए उदाहरण बनकर उभरी हैं। वह बचपन की प्रताड़नाओं से लड़कर आज यहां तक पहुंची हैं। उन्हे बचपन के खराब अनुभवों से निकलने में योगा से मदद मिली।


वह कहती हैं कि अपने दर्द को स्वीकार करो, उसे समझो और लड़ो, पर उसे अपनी ज़िंदगी से दूर जाने दो। उसे लेकर सिर्फ ही चिंतन ही मत करते रह जाओ। वह कहती हैं कि महिलाएं अपनी ताकत को पहचान दे रही हैं। आज हमे अच्छे आईक्यू वाली ही नहीं बल्कि गंभीर ईक्यू वाली महिलाओं की भी ज़रूरत है।





शिक्षा के भविष्य पर अवेएकेडमी की संस्थापक और सीईओ राया बिदशहरी एक अलग ही तरह के स्कूलों की परिकल्पना पर ज़ोर देती हुई कहती हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ही एजुकेशन का पहला भविष्य है। शिक्षा में वैकल्पिक मॉडल पूरी दुनिया में बढ़े हैं। अब इन्हें मुख्य धारा से जोड़ने से ज़रूरत है। नंबर और जानकारी दो अलग चीजें होती हैं। अकादमिक या तकनीकी मॉडल के बजाए अगर बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक प्रगति के आधार पर कुछ सिखाएं तो वह शिक्षा ज़्यादा सार्थक होगी। वह स्कूलों का भविष्य एक ऐसे स्थान के रूप में देखती हैं कि जहां से युवाओं को आने वाली बड़ी चुनौतियां का हल तकनीक के माध्यम से ढूंढने में मदद मिले।


भारत की पहली स्पेस एंटरप्रयोन्योर सुस्मिता मोहंती कहती हैं कि हम सभी इस वक़्त एक नीले अंतरिक्ष यान में ब्रह्मांड में तेज़ी से दौड़ रहे हैं। डर है कि तीन और चार पीढ़ियों के बाद हमारा ग्रह रहने लायक नहीं रहेगा। उम्मीद है कि इंसान जलवायु परिवर्तन को लेकर जागेगा। आज जलवायु परिवर्तन पर निगरानी के लिए स्पेस तकनीक के इस्तेमाल की बहुत जरूरत है। इंसान को युद्ध और हथियारों की बजाय ऊर्जा के स्वच्छ तरीकों की खोज पर निवेश करने की ज़रूरत है।


हमारे भारतीय समाज में अमूमन बच्चे न होने के लिए महिलाओं को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। पुरुषों के बांझपन की समाज और विज्ञान दोनों में ख़ास चर्चा नहीं होती लेकिन स्कॉटलैंड में प्रमुख गाइनकोलॉजिस्ट डॉ. साराह मार्टिन्स दा सिल्वा इसी विषय पर अपनी बात फ़ोकस करती हुई कहती हैं कि मुझे उम्मीद है कि हम असमानताओं और महिलाओं पर प्रजनन क्षमता के बोझ को कम करने के लिए पुरुष प्रजनन स्वास्थ्य में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, निवेश और इनोवेशन का उपयोग कर सकते हैं। उनके 2030 के विज़न के मुताबिक़ पुरुषों में बांझपन का इलाज महिलाओं में बांझपन के विस्तार से जोड़कर नहीं देखा जाएगा। 





इस जमावड़े में मैरिलिन वेरिंग और शुभलक्ष्मी नंदी महिलाओं के अवैतनिक कामों के मूल्य पर अपनी बात रखने के साथ ही वे उसकी अर्थव्यवस्था के महत्व पर भी ज़ोर दे रही हैं। मैरिलिन कहती हैं कि दुनिया को अब 'फ़ेमिनिस्ट इकोनॉमिस्ट' को गंभीरता से लेने की ज़रूरत है। एक्टिविस्ट शुभलक्ष्मी नंदी कहती हैं कि स्त्री-प्रधान भविष्य में आर्थिक प्रदर्शन के लिए लैंगिक समानता, सतत विकास और महिलाओं के मानवाधिकार प्रमुख हिस्से होने चाहिए। वह पूछ रही हैं कि जब फसलों, खाद्य पदार्थों पर इतना निवेश होता है तो दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण खाना उत्पादित (बच्चे के लिए दूध) करने वाली औरत को भरपाई क्यों नहीं हो सकती। ये किसी बच्चे के भविष्य और शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण निवेश होगा। आज भी महिलाएं कई कामों में कार्यबल का हिस्सा मानी ही नहीं जा रही हैं। जैसे कि खेती में जीतोड़ मेहनत करने के बावजूद वे किसान नहीं कहलाती हैं। 


कवयित्री अरण्या जौहर अपना 2030 पर फोकस विज़न साझा करती हुईं बताती हैं कि कैसे 'युवा, सांवली लड़कियां' महिलाओं के भविष्य का नेतृत्व कर सकती हैं। वह दुनिया के एक चित्र की परिकल्पना करते हुए कहती हैं कि एक ऐसी दुनिया बनाना जरूरी लगता है, जिसमें सभी को समान शिक्षा मिले, अपने शरीर पर ख़ुद का हक़ हो और हमें सामाजिक बदलाव की दिशा में ले जाने वाला नेतृत्व मिले। वह शिक्षा को समानता का बहुत बड़ा माध्यम बताते हुए कहती हैं कि शिक्षा समानता के लिए बेहद ज़रूरी है। इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि शिक्षा ने महिलाओं को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है। हर बार जब एक लड़की स्कूल जाती है तो पूरी दुनिया को फ़ायदा होता है।