ऑस्कर में इसलिए फेल होती हैं भारत की फिल्में, अब तक सिर्फ तीन फिल्मों ने किया है कमाल

By प्रियांशु द्विवेदी
February 14, 2020, Updated on : Fri Feb 14 2020 10:37:27 GMT+0000
ऑस्कर में इसलिए फेल होती हैं भारत की फिल्में, अब तक सिर्फ तीन फिल्मों ने किया है कमाल
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भारत में हर साल सभी भाषाओं में कुल मिलाकर 2 हज़ार से अधिक फिल्मों का निर्माण होता है, लेकिन ऑस्कर की दौड़ में आज तक सिर्फ 3 भारतीय फिल्में ही अंतिम सूची में जगह बना पाई हैं।

सांकेतिक चित्र

सांकेतिक चित्र



इस बार फिल्म ‘पैरासाइट’ बेस्ट फिल्म के साथ चार ऑस्कर झटक लिए। इसी के साथ फिल्म ने पहली गैर-अंग्रेजी फिल्म होते हुए बेस्ट फिल्म के लिए ऑस्कर जीत कर इतिहास रच दिया। ‘पैरासाइट’ ने प्रतिष्ठित कान फिल्म फेस्टिवल का मुख्य अवार्ड पाम डी'ओर भी जीता था।


भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए आधिकारिक एंट्री के तौर पर फिल्म ‘गली बॉय’ को भेजा गया था। फिल्म को रिलीज के बाद से भारत में काफी प्रशंसा हासिल हुई थी, इसके साथ ही फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भी अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन ऑस्कर की दौड़ में यह फिल्म काफी पीछे नज़र आई।


‘गली बॉय’ बेस्ट फिल्म ने फ़ॉरेन लैंग्वेज श्रेणी में भारत की तरफ से आधिकारिक एंट्री के तौर पर गई थी, लेकिन फिल्म शॉर्ट लिस्ट की गई फिल्मों की सूची में जगह बनाने में कामयाब नहीं हो सकी। फिल्म की कहानी मुंबई के स्लम में रह रहे रैपर्स की जिंदगी पर आधारित थी।


ऑस्कर की इस श्रेणी के लिए भारत की तरफ से हर साल एक चुनिन्दा फिल्म को भेजा जाता है, लेकिन अब तक मदर इंडिया (1957), सलाम बॉम्बे (1988) और लगान (2001) के अलावा कोई भी फिल्म अंतिम सूची में जगह पाने में नाकाम रही है।

वैश्विक स्तर पर भारतीय फिल्मों का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहता है, हालांकि हर साल कुछ बेहतरीन फिल्में फिल्म फ़ेस्टिवल्स के लिए जरूर भेजी जाती हैं, लेकिन वे फिल्में भी वैश्विक स्तर पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाती हैं।

कहाँ है कमी?

भारत में मुख्यता दो तरह की फिल्में बनती हैं, पहली वो जो कमर्शियल फिल्मों के तौर पर गिनी जाती हैं और अन्य फिल्मों को आर्टिस्टिक फिल्मों का तमगा दे दिया जाता है। भारत में कमर्शियल फिल्मों में मुख्यता कहानी कमजोर ही होती है, वहीं आर्टिस्टिक फिल्में अपने कम बजट के चलते बेहतर कहानी होने के बावजूद कई अन्य पहलुओं दर्शकों का दिल जीतने में मात खा जाती हैं।





इन दोनों तरह की फिल्मों के बीच की खाईं हमेशा से बरकरार है, जो कम होने का नाम नहीं ले रही है। विदेशी सिनेमा की बात करें तो गैर-अंग्रेजी फिल्में खास तौर पर स्पेन, जापान और दक्षिण कोरिया की फिल्में अपनी मूल भाषा में होते हुए भी वैश्विक स्तर पर लोगों का ध्यान खींचने में सफल हो जाती हैं, जबकि भारत की फिल्में ये कारनामा करने में असफल रही हैं।


भारत में फिल्मों को प्रमाण पत्र बांटने के लिए सेंसर बोर्ड है, लेकिन बीते कुछ सालों में कई फिल्म निर्देशकों ने यह शिकायत की है कि सेंसर बोर्ड के आदेश चलते फिल्म के दृश्यों को बदलना पड़ा, जिसके चलते फिल्म की कहानी का मूल स्वरूप काफी हद तक प्रभावित हुआ। देश में स्वतंत्रत सिनेमा की राह में सेंसर बोर्ड कई बार एक बाधा की तरह नज़र आता है।


देश के तमाम फिल्म स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र अपने कोर्स के दौरान विश्व भर का बेहतरीन सिनेमा देखते हैं और उसे पढ़ते हैं, लेकिन जब यही छात्र आगे चलकर फिल्म निर्माण में कदम रखते हैं तो सिर्फ कमर्शियल फिल्मों पर अपना ध्यान टिकाते हैं।  


भारत में सिनेमा सबसे महंगे व्यवसायों में से एक है, इसी के साथ भारत में फिल्म निर्माण को लेकर कई तरह के नियम और शर्तों का पालन करते हुए कई विभागों से मंजूरी लेनी पड़ती है। यह जटिल प्रक्रिया भी काफी हद तक देश में एक स्वस्थ सिनेमा के विकास में बड़ी बाधा है।




दर्शक बनें जागरूक

ऐसा नहीं है कि देश में बेहतरीन फिल्में कम बनती हैं, लेकिन उन फिल्मों को देखने के लिए पहुंचने वाले दर्शकों की संख्या कमर्शियल फिल्मों की तुलना में काफी कम होती है। इसके पीछे कई वजह हैं- एक तो ये कि आर्टिस्टिक फिल्मों का बजट औसतन काफी कम होता है, ऐसे में फिल्म रिलीज़ से पहले अपना प्रचार-प्रसार उतना नहीं कर पाती है और दर्शकों के बीच फिल्म को लेकर जागरूकता न होने का खामियाजा उसे थिएटर में उठाना पड़ता है।


दूसरी वजह इन फिल्मों के प्रति दर्शकों का रुझान भी है। भारत में दर्शक कमर्शियल और मसालेदार फिल्मों को अधिक पसंद करते हैं। कई बार घिसी-पिटी कहानी वाली फिल्में थिएटर पर करोड़ों का कारोबार करती हैं और इस वजह से फिल्म निर्माता आर्टिस्टिक फिल्मों को लेकर उतना रिस्क नहीं उठाना चाहते हैं, क्योंकि इस तरह की फिल्में अगर थिएटर तक जाएंगी भी तो कमर्शियल फिल्मों की तरह कमाई नहीं कर पाएगी, यही वजह इस तरह की फिल्मों के भविष्य को अंधकार में रखे हुए है।

उदाहरण हैं मौजूद

सत्यजीत रे ने मुख्यता बांग्ला भाषा में अपनी फिल्मों का निर्माण किया, लेकिन उनकी फिल्में आज दुनिया भर के फिल्म स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। रे को 1991 में 64वें ऑस्कर में मानद पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1992 में कोलकाता में सत्यजीत रे का 70 साल की उम्र में निधन हो गया था।


इस साल हुए ऑस्कर समारोह में सत्यजीत रे की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ को मोंटाज़ वीडियो में शामिल किया गया था।

देश में तमाम भाषाओं में हर साल कुल मिलाकर 2 हज़ार से अधिक फिल्मों का निर्माण होता है। क्षेत्रीय भाषाओ खासकर मराठी और बांग्ला भाषा का सिनेमा हमेशा से बेहतरीन माना जाता रहा है, लेकिन बावजूद इसके इन भाषाओं में बनीं फिल्में अन्य भाषाओं के दर्शकों तक बामुश्किल ही पहुंच पाती हैं।


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