अमेरिका और चीन के ट्रेड वॉर में अरबपति बन गए भारत के उद्योगपति रज्जू श्रॉफ

By जय प्रकाश जय
November 12, 2019, Updated on : Tue Nov 12 2019 15:20:59 GMT+0000
अमेरिका और चीन के ट्रेड वॉर में अरबपति बन गए भारत के उद्योगपति रज्जू श्रॉफ
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दो की लड़ाई में तीसरे के बाजी मार लेने की पुरानी कहावत को भारतीय उद्योगपति रज्जू श्रॉफ ने विश्व मंच पर चरितार्थ कर दिया है। चीन और अमेरिका के बीच छिड़े ट्रेड वॉर में हालात का फायदा उठाते हुए वह दुनिया के अरबपतियों की लिस्ट में आ गए हैं। अज 31 फीसदी तेजी के साथ उनकी संपत्ति 1.69 अरब डॉलर हो चुकी है। 

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रज्जू श्रॉफ (फोटो: Forbes)

यद्यपि ताज़ा गतिविधियों के मुताबिक चीन और अमेरिका के व्यापार वार्ताकार सैद्धांतिक सहमति पर पहुंच गए हैं, लेकिन इस विश्व समुदाय के आर्थिक मोरचे पर एक बड़ा रोचक वाकया ये सामने आया है कि दो शीर्ष देशों के ट्रेड वॉर का फायदा उठाते हुए भारतीय उद्योगपति रज्जू श्रॉफ फिर से अरबपति बन गए हैं। उन्हें हाल ही में फोर्ब्स ने 100 भारतीय रईसों की सूची में 87 वां स्थान दिया है। उनकी कंपनी यूनाइटेड फास्फोरस लिमिटेड (यूपीएल) के शेयरों में इस साल आई 31 फीसदी की तेजी की वजह से उनकी संपत्ति का आकलन 1.69 अरब डॉलर किया गया है।


पचासी वर्षीय श्रॉफ ने माचिस में इस्तेमाल होने वाला लाल फास्फोरस के प्रॉडक्शन के लिए लगभग पांच दशक पूर्व यूपीएल कंपनी की स्थापना की थी। वह पहली ऐसी देसी कंपनी थी, जो विदेशी कंपनी की तुलना में सस्ता फास्फोरस बनाने लगी। इस समय तीस से अधिक देशों में उनके प्लांट प्रॉडक्शन कर रहे हैं और सत्तर से अधिक देशों में उनका कारोबार चल रहा है। 


यूनाइटेड फास्फोरस लिमिटेड में रज्जू श्रॉफ के परिवार की आज भी करीब 27 फीसदी साझेदारी है। इस समय यूपीएल को रज्जू श्रॉफ के पुत्र जय श्रॉफ और विक्रम श्रॉफ चला रहे हैं। यूपीएल ने इस साल फरवरी 2019 में 4.2 अरब डॉलर में अमेरिका की कंपनी एरिस्टा लाइफसाइंस को खरीद लिया। उसके बाद यूपीएल फसल सुरक्षा उत्पादों में दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी बन गई।


उसी दौरान विश्व मंच पर ट्रेड वॉर छिड़ जाने के कारण अमेरिका में एग्रो केमिकल्स के लिए चीन से आयात करना महंगा पड़ने लगा तो श्रॉफ एरिस्टा लाइफसाइंस को माध्यम बनाते हुए सीधे अमेरिकी बाजार में हाथ आजमाने लगे और चार महीने में ही जून 2019 आते-आते उत्तरी अमेरिका में उनकी बिक्री में छह प्रतिशत इजाफा हो गया।




श्रॉफ को दूसरा फायदा ये हुआ कि ट्रेड वार के चलते चीन ब्राजील से सोयाबीन आयात करने लगा तो वहां के किसान चीन की डिमांड पूरी करने के लिए श्रॉफ की कंपनी से एग्रो केमिकल उत्पाद खरीदने लगे। इसके बाद जुलाई में कंपनी का शेयर मार्केट में पांच सौ रुपए से उछलकर 709 रुपए प्रति शेयर तक पहुंच गया। इस माह की शुरुआत में 5 नवंबर 2019 को भी कंपनी का शेयर 599 रुपए तक थमा रहा। 


यद्यपि इस पूरे हालात पर अमेरिका और चीन के गणितज्ञों की भी नजर रही है लेकिन ट्रेड वॉर उनके रास्ते रोके रहा। अब बताया जाता है कि दोनो देशों के बीच सैद्धांतिक सहमति बन गई है। चिली में आयोजित होने वाले एपेक सम्मेलन के रद होने के बाद से अमेरिका-चीन संभावित समझौते पर अनिश्चितता के बादल छा गए थे क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वह बीजिंग के साथ पहले चरण के व्यापार समझौते के प्रति आशान्वित हैं।


माना जा रहा है कि चीन और अमेरिका के व्यापार वार्ताकारों के बीच बनी सैद्धांतिक सहमति से दोनों देशों के बीच जारी ट्रेड वॉर में थोड़ी नरमी आएगी। हालांकि, दुनिया में चीन और रूस के बढ़ते दबदबे से अमेरिका अभी भी बेहद सतर्क है। अमेरिका ने बयान जारी करके दुनिया के देशों से रूस और चीन से हथियार न खरीदने की अपील की है। अमेरिका ने कहा है कि चीन और रूस दोनों ही अपना दबदाबा बढ़ाने के लिए हथियारों की बिक्री का सहारा ले रहे हैं। इससे वैश्विक माहौल खराब हो रहा है।

 




यूपीएल के सीओओ डिएगो कैसनेलो बताते हैं कि अमेरिका-चीन ट्रेड वार की वजह से विश्व बाजार में पैदा हुई अनिश्चितता के दौरान उनकी कंपनी ने अपने ग्राहकों का विश्वास बनाए रखा है। गौरतलब है कि सन् साठ के दशक में विदेशी कंपनियां माचिस के लिए लाल फास्फोरस का प्लांट चार करोड़ रुपए में लगाती थीं। श्रॉफ ने महज चार लाख रुपए में यह काम कर दिखाया। स्वीडिश कंपनी विमको की माचिस तब काफी लोकप्रिय थी।


विमको ने आरोप लगाया कि इतनी कम राशि में प्लांट लगाना संभव ही नहीं है। जरूर सुरक्षा नियमों और प्रदूषण मानकों का उल्लंघन हुआ होगा। तकनीकी विकास महानिदेशक और राष्ट्रीय अनुसंधान और विकास कॉर्पोरेशन को इस रहस्य की जांच करनी पड़ी। टीम को प्लांट एकदम सुरक्षित मिला। उस घटना के ठीक एक साल बाद श्रॉफ को लघु उद्योग में नए प्रयोग के लिए राष्ट्रपति शील्ड से सम्मानित किया गया।


श्रॉफ बताते हैं कि उस वाकये के बाद उन्होंने कृषि क्षेत्र में रसायनों के इस्तेमाल से पैदावार बढ़ाने की कोशिश में सस्ते कीटनाशकों पर रिसर्च कर नई फैक्ट्रियों की स्थापना की। इस समय उनकी ऐसी कंपनियां 30 से अधिक देशों में प्रॉडक्शन कर रही हैं। विश्व के सत्तर से अधिक देशों में उनकी कंपनी कारोबार कर रही है।