पूरी दुनिया को चलाने वाले पैसे की शुरुआत कैसे हुई?

By Vishal Jaiswal
July 24, 2022, Updated on : Mon Jul 25 2022 07:41:07 GMT+0000
पूरी दुनिया को चलाने वाले पैसे की शुरुआत कैसे हुई?
किसी भी तरह का धन लोगों को सीधे तौर पर किसी भी प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार या लेन-देन की अनुमति देता है. यह वस्तुओं की कीमत का निर्धारण करने में मदद करता है और यह लोगों को अपने धन को स्टोर करने का एक तरीका प्रदान करता है.
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पूरी दुनिया को चलाने के लिए सबसे सुविधाजनक चीज धन यानि मनी है. आज पूरी दुनिया को चलाने के लिए कुल 420 ट्रिलियन धन का इस्तेमाल किया जाता है.


यह धन कोई सिक्का हो सकता है, कोई नोट हो सकता है या कंप्यूटर द्वारा जारी कोई इलेक्ट्रॉनिक कोड हो सकता है. वहीं, किसी धन की वैल्यू का निर्धारण इस आधार पर किया जाता है कि उसका किस माध्यम से आदान-प्रदान किया जा रहा है.


किसी भी तरह का धन लोगों को सीधे तौर पर किसी भी प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार या लेन-देन की अनुमति देता है. यह वस्तुओं की कीमत का निर्धारण करने में मदद करता है और यह लोगों को अपने धन को स्टोर करने का एक तरीका प्रदान करता है.

क्या मनी और करेंसी एक हैं?

पैसा समाज द्वारा स्वीकार किया गया एक ऐसा मानक है जिसके द्वारा चीजों की कीमत तय की जाती है और जिसके साथ भुगतान स्वीकार किया जाता है. हालांकि, पूरे इतिहास में पैसे का उपयोग और रूप दोनों विकसित हुए हैं.


अक्सर हम धन और मुद्रा शब्द का एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग करते हैं. हालांकि, दोनों में बहुत अंतर है. धन का एक ऐसा अमूर्त कॉन्सेप्ट है जिस छूकर महसूस नहीं किया जा सकता है, जबकि मुद्रा, धन को फिजिकल तरीके से महसूस करने का कॉन्सेप्ट है.

पैसे के उपयोग से पहले कैसे होता था व्यापार?

मानव के इतिहास में धन का उपयोग करीब 5000 साल से है. इतिहासकारों का मानना है कि उसके पहले वस्तु विनिमय (Bartering) यानी एक सामान के बदले दूसरे सामान के लेन-देन की व्यवस्था थी.


उदाहरण के लिए, एक किसान जूतों की एक जोड़ी के लिए एक बोरी गेहूं का आदान-प्रदान कर सकता है. हालांकि, इसमें समस्या थी और समय लगता था. जूते की चाह रखने वाले इंसान को ऐसे शख्स को ढूंढना पड़ता था, जिसे गेहूं की आवश्यकता हो.


समाज के विकास के साथ ही सैकड़ों सालों में धीरे-धीरे धन के एक प्रकार का विकास हुआ. इसमें जानवरों की त्वचा, नमक और हथियार जैसे आसानी से व्यापार किए जाने वाला सामान शामिल थे. व्यापार की यह प्रणाली दुनियाभर में फैली हुई है और आज भी दुनिया के कुछ हिस्सों में मौजूद है.

कैसे अस्तित्व में आया मुद्रा?

ज्ञात इतिहास में जाने पर मुद्रा के रूप में पहले सिक्के के बारे में जानकारी मिलती है कि वह 770 ईसा पूर्व चीन में पाया गया. इसी तरह पहली पेपर करेंसी यानि नोट की उत्पत्ति भी 700 ईसा पूर्व चीन में ही मानी जाती है. पहली आधिकारिक करेंसी लीडिया के राजा अलेट्स ने 600 ईसा पूर्व में शुरू की थी.


पहला सर्कुलेटिंग नोट, जिसे जियाओज़ी कहा जाता है, को सांग राजवंश द्वारा 960 में पेश किया गया था, लेकिन वह सिक्कों का स्थान लेने में असफल रहा. इस तरह युआन राजवंश के संस्थापक कुबलई खान ‘चाओ’ (कागज धन) नामक कागजी मुद्रा को सर्कुलेशन में लाने वाले पहले व्यक्ति थे.

भारत में मुद्रा का चलन

भारतीय रुपये का इतिहास लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में प्राचीन भारत में पाया जाता है. चीनी वेन और लिडियन स्टेट्स के साथ प्राचीन भारत दुनिया में सिक्कों की शुरुआत करने वालों में से एक था.


पहले भारतीय सिक्कों को महाजनपदों (प्राचीन भारत के गणराज्य साम्राज्यों) द्वारा ढाला गया था जिन्हें पुराण, कर्शपन या पाना के नाम से जाना जाता है. इन महाजनपदों में गांधार, कुंतला, कुरु, पांचाल, शाक्य, सुरसेन और सौराष्ट्र शामिल थे.


सबसे पहले मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने चांदी, सोना, तांबे या सीसे के ढलने वाले पंच चिह्नित सिक्के चलाए. भारतीय-यूनानी कुषाण राजाओं ने सिक्कों पर चित्र उकेरने की यूनानी प्रथा शुरू की.


1526 ई. से मुगल साम्राज्य ने पूरे साम्राज्य के लिए मौद्रिक प्रणाली को एक किया. इस युग में, रुपये का विकास तब हुआ जब शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को हराया और 178 ग्राम का चांदी का सिक्का जारी किया जिसे ‘रूपिया’ के नाम से जाना जाता था और ये सिक्के मुगल काल, मराठा युग और ब्रिटिश भारत के दौरान उपयोग में बने रहे.

भारत में नोटों की शुरुआत

18वीं शताब्दी में, बंगाल में बैंक ऑफ हिंदुस्तान और बंगाल बैंक कागजी मुद्रा जारी करने वाले भारत के पहले बैंक बने. 1857 के विद्रोह के बाद, अंग्रेजों ने रुपये को औपनिवेशिक भारत की आधिकारिक मुद्रा बना दिया, जिसमें किंग जॉर्ज VI ने नोटों और सिक्कों पर देशी डिजाइनों की जगह ले ली.


19वीं शताब्दी में, अंग्रेजों ने उपमहाद्वीप में कागजी मुद्रा की शुरुआत की. जॉर्ज पंचम की तस्वीर वाली नोटों की एक सीरिज 1923 में शुरू की गई थी. ये नोट 1, 2½, 5, 10, 50, 100, 1,000, 10,000 रुपये के मूल्यवर्ग में जारी किए गए थे.

अप्रैल, 1935 में RBI का उद्घाटन

भारतीय रिजर्व बैंक का औपचारिक उद्घाटन सोमवार, 1 अप्रैल, 1935 को किया गया था. इसका मुख्यालय कलकत्ता में था. आरबीआई अधिनियम, 1934 की धारा 22 ने इसे तब तक भारत सरकार के नोट जारी रखने का अधिकार दिया, जब तक कि इसके अपने नोट जारी करने के लिए तैयार नहीं हो जाते.


बैंक ने 1938 में जॉर्ज VI की तस्वीर वाले पहले पांच रुपये के नोट को जारी किया था. इसके बाद फरवरी में 10 रुपये, मार्च में 100 रुपये और जून 1938 में 1000 रुपये और 10000 रुपये जारी किए गए.

आजादी के बाद रुपये में आया बड़ा बदलाव

1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, भारत का आधुनिक रुपया सिक्के के डिजाइन में वापस आया. कागजी मुद्रा के लिए चुना गया प्रतीक सारनाथ में स्थित लायन कैपिटल था. इस तरह, स्वतंत्र भारत द्वारा मुद्रित पहला बैंक नोट 1 रुपये का नोट था. महात्मा गांधी सीरिज के नोटों की शुरुआथ 1996 में की गई थी.


15 जुलाई, 2010 को, भारत ने एक नया मुद्रा प्रतीक, भारतीय रुपया चिन्ह, '₹' पेश किया. 8 नवंबर, 2016 को 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद करके भारत सरकार ने 2000 रुपये और बाद में 200 रुपये के नए नोट जारी किए. वर्तमान में करेंसी प्रेस मैसूर कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में सालबोनी में हैं.

21वीं सदी में हुई डिजिटल मुद्राओं की शुरुआत

21वीं सदी ने मुद्रा के दो नए रूपों को जन्म दिया है. यह दो मुद्राएं मोबाइल भुगतान और डिजिटल मुद्रा हैं. मोबाइल भुगतान एक पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, जैसे सेलफोन, स्मार्टफोन या टैबलेट डिवाइस के माध्यम से किसी उत्पाद या सेवा के लिए प्रदान किया गया धन है.


2009 में छद्म नाम सतोशी नाकामोतो द्वारा जारी किया गया बिटकॉइन, जल्दी ही डिजिटल करेंसी के लिए मानक बन गया. जून 2022 तक दुनिया के सभी बिटकॉइन की कीमत 392 बिलियन डॉलर से अधिक थी.


डिजिटल करेंसी का कोई फिजिकल सिक्का नहीं होता है. डिजिटल करेंसी सरकार द्वारा जारी करेंसी के विपरीत, विकेन्द्रीकृत अधिकारियों द्वारा संचालित होती है.