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ग्रामीण महिलाओं में मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ा रही हैं उदयपुर की 'पैड वुमन' लाड लोहार, 15वीं शताब्दी से जुड़े हैं तार

ग्रामीण महिलाओं में मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ा रही हैं उदयपुर की 'पैड वुमन' लाड लोहार, 15वीं शताब्दी से जुड़े हैं तार

Monday January 27, 2020 , 6 min Read

एक तरफ बंजर बलुआ पत्थर (sandstone) और दूसरी तरफ हरी-भरी कैक्टि वाला राजस्थान का मैदानी इलाका 15वीं शताब्दी में गाडोलिया लोहारों (खानाबदोश घुमंतू समुदाय) का घर हुआ करता था। उदयपुर के रामनगर गाँव में रह रहीं तैंतीस वर्षीय लाड लोहार उन्हीं कबीलों की वंशज हैं।


हालांकि लाड हमेशा कुछ नया सीखने के लिए उत्सुक रहती थीं और एक स्कूल में जाना चाहती थीं, लेकिन उनका परिवार इसका समर्थन नहीं कर रहा था, खासतौर से उनके मासिक धर्म की शुरुआत के कारण वे उन्हें स्कूल में नहीं जाने देना चाहते थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया, उन्हें महसूस हुआ कि अब बस छूट गई है। और तभी लाड ने तय किया कि वे अब ऐसी घटनाओं को अपने समुदाय को दोहराने नहीं देंगी।


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लाड लोहार



मुंबई के एक गैर-सरकारी संगठन, दसरा (Dasra) द्वारा 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल 23 मिलियन लड़कियां मासिक धर्म की स्वच्छता सुविधाओं की कमी के कारण स्कूल छोड़ देती हैं, जिसमें सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता और सामर्थ्य शामिल है। इसके अलावा उन्हें ये भी नहीं पता होता है कि इन्हें इस्तेमाल कैसे किया जाता है।


इस स्थिति को सुधारने के लिए, लाड ने न केवल अपने गांव की लड़कियों में मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जागरूकता फैलाना शुरू किया, बल्कि कपास और केले के फाइबर का उपयोग करके पुन: प्रयोज्य सैनिटरी पैड बनाने के लिए एक लागत प्रभावी तरीका भी निकाला। केवल इतना ही नहीं है।


33 वर्षीय लाड ने 'कामाख्या' नाम की अपनी पहल को पीरियड्स के दौरान महिलाओं की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए शुरू किया। पिछले नौ वर्षों में, उन्होंने 500 से अधिक महिलाओं को अपने स्वयं के सैनिटरी नैपकिन का उत्पादन करने के लिए प्रशिक्षित किया है।


जागृति यात्रा पार्ट के रूप में योरस्टोरी लाड लोहार से एक ट्रेन में मिली, उस दौरान उन्होंने कहा,

“मेरे इलाके की बहुत सारी युवा लड़कियों को बाजार में सेनेटरी पैड के अस्तित्व के बारे में नहीं पता था, और जो लोग इसकी उपलब्धता के बारे में जानते थे वे इसे अफोर्ड नहीं कर सकते थे। इसलिए, वे गंदे कपड़े, रेत, रैग्स, पत्तियां आदि का उपयोग करती थीं। बीमारी के अलावा, यह प्रथा लड़कियों की शिक्षा को नुकसान पहुंचा रही थी। पिछले कुछ वर्षों में मेरा एकमात्र मकसद ऐसे परिदृश्यों को होने से रोकना है।”


शुरूआत

लाड लोहार स्कूल नहीं गईं। लेकिन उनके जिज्ञासु मन और सीखने की लालसा ने उन्हें आत्म-शिक्षा (सेल्फ-एजुकेशन) के मार्ग पर अग्रसर किया। उन्होंने अपने पड़ोसियों, दोस्तों से पाठ्यपुस्तकें उधार लीं, और अपने घर की चार दीवारों के भीतर स्टडी की। लाड के समुदाय के भीतर कुछ कड़े मानदंडों के कारण, उन्हें 18 वर्ष की उम्र में शादी करनी पड़ी।


लाड याद करती हैं,

"शादी के कुछ वर्षों बाद, मैं और मेरे पति अलग हो गए। और तब मुझे शिक्षित होने, करियर बनाने, और आर्थिक व खुद से स्वतंत्र होने के महत्व का पता चला। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे पड़ोस की कोई और लड़की मेरी तरह स्कूल और कॉलेज जाने से चूक जाए। जब यह मेरे ध्यान में आया कि मासिक धर्म की स्वच्छता और सैनिटरी पैड तक पहुंच लड़कियों के स्कूल छोड़ने का कारण बन रही है, तो मैं इसे रोकने के लिए कुछ करना चाहती थी।"


मासिक धर्म के बारे में बात करना अभी भी भारत के कई हिस्सों में वर्जित है। यहां तक कि माताएं इसे बहुत ही गुप्त रखती हैं और अपनी बेटियों से ब्लीडिंग जैसी नैचुरल प्रक्रिया के बारे में बात नहीं करती हैं। और फिर बाद में यही कारण, अच्छी मासिक धर्म स्वास्थ्य प्राप्त करने वाली और नियमित रूप से स्कूल जाने वाली युवा लड़कियों में बाधा बनता है। इसे ठीक करने के लिए, लाड लोहार ने रामनगर और उसके आसपास की लड़कियों के साथ पीरियड्स पर चर्चा शुरू की।





वे कहती हैं,

“मैं सचमुच मासिक धर्म के बारे में समझाने के लिए घर-घर गई, लेकिन लोगों ने मुझे भगा दिया। लेकिन मैंने हार नहीं मानी और दिनों तक डटे रहने के बाद, मैं उनका विश्वास हासिल करने में सक्षम रही और उन्होंने मेरा साथ देना शुरू कर दिया। मुझे पता चला कि कई युवा लड़कियों ने बिना किसी मकैनिज्म के युवावस्था में प्रवेश किया। वे सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता से बेखबर थीं। जिन लोगों को इसके बारे में कुछ ज्ञान था, वे इसके लिए भुगतान करने में सक्षम नहीं थे।"


सैकड़ों लड़कियों और महिलाओं से बात करने के बाद, लाड ने सोचा कि सामर्थ्य (affordability) और पहुंच (accessibility) वे मुद्दे हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके बाद लोगों से मिले फीडबैक के बाद वे अपने खुद से सैनिटरी पैड्स बनाने के आइडिया के साथ आईं। 33 वर्षीय लाड ने सुरक्षा, पुन: प्रयोज्य और शोषक जैसे फैक्टर्स पर विचार करने के बाद कॉटन, बनाना फाइबर और पैराशूट फैब्रिक का उपयोग करने का निर्णय लिया।


लाड ने बतौर लोहार कमाए अपने 10,000 रुपये के शुरुआती निवेश में बेसिक मशीनरी और अन्य सामग्रियों को खरीदने के साथ शुरुआत की। एक बार जब वह उन्हें बनाने में सफल रहीं, तो उन्होंने 500 महिलाओं को सिखाने के लिए एक पूरा प्रयास किया।


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लाड द्वारा बनाए जा रहे सेनेटरी पैड का सैंपल

आज, वे सभी आत्मनिर्भर हैं, और अच्छे से मासिक धर्म स्वच्छता बनाए रख सकती हैं। और, खुद लाड, एक दिन में 10 सैनिटरी नैपकिन बनाती हैं। हालांकि, चूंकि उनके अधिकांश ग्राहक विनम्र पृष्ठभूमि के हैं, इसलिए उनके पास और कोई विकल्प नहीं है, तो वे इसे प्रति पीस 35 रुपये की कीमत पर बेचती हैं। वह वर्तमान में अपने उत्पाद की पहुंच का विस्तार करने के लिए गैर सरकारी संगठनों और सामाजिक उद्यमों के साथ सहयोग करना चाहती हैं।


लड़कियों को उनकी शिक्षा जारी रखने में सक्षम बनाना

सामाजिक और आर्थिक बाधाओं के बावजूद, लाड लोहार की करुणा और दृढ़ निश्चय ने उन्हें अपने गांव की युवा लड़कियों को सशक्त बनाने के लिए प्रेरित किया।


वे कहती हैं,

“अपनी शुरुआती यात्रा के दौरान मैंने जिस भी उदासीनता और दुर्व्यवहार का सामना किया, अब लगता है कि वो ठीक था। मेरे गाँव की कई लड़कियाँ नियमित रूप से स्कूल जा रही हैं, और कुछ ने मेरे हस्तक्षेप और प्रशिक्षण के बाद दसवीं कक्षा भी पूरी की है। यहां तक कि सरपंच भी आज मेरे मिशन में मेरा साथ दे रहे हैं। मुझे खुशी है कि मासिक धर्म के आसपास की चुप्पी टूटी हुई है, और उनमें से ज्यादातर अब इसके बारे में स्वतंत्र रूप से बात कर रहे हैं। मेरे लिए खुशी की बात है कि मेरी मेहनत रंग ला रही है।”


पिछले कुछ वर्षों से, लाड जयपुर, जोधपुर, और बीकानेर जैसे शहरों में सेमिनार में भाग ले रही हैं और महिलाओं को प्रशिक्षित कर रही हैं, और उन्होंने खुद के लिए 'पैड-वूमन' की उपाधि हासिल की है।