रिसर्च : युवाओं में अब लड़कियों का लुक और ब्यूटी नहीं, 'आइक्यू' पहली पसंद

रिसर्च : युवाओं में अब लड़कियों का लुक और ब्यूटी नहीं, 'आइक्यू' पहली पसंद

Friday August 09, 2019,

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हमेशा की तरह तेजी से भागते वक़्त में आज 'आइक्यू' पर फोकस तरह-तरह के चौंकाने वाले रिसर्च सामने आ रहे हैं। मसलन, युवा अब आइक्यू वाली लड़कियों के लुक्स और ब्यूटी को महत्व नहीं दे रहे हैं, देर रात जागने वाले लोग स्मॉर्ट होते हैं, बच्चों का आइक्यू बढ़ाना है तो हर सप्ताह उन्हे मछली जरूर खिलाइए।



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सांकेतिक फोटो (Shutterstock)



आइक्यू यानी अक्लमंदी पर तमाम सर्वे, ताज़ा रिसर्च इन दिनो इंटेलिजेंस यानी बुद्धिमता पर चौंकाने वाले तरह-तरह के खुलासे तो कर ही रहे हैं, खासकर बच्चों और लड़कियों की जिंदगी में उनकी समझदारी की अहमियत को लेकर इधर उनकी कई एक गौरतलब और रोचक हिदायतें भी सामने आई हैं। आइक्यू के आगे अब लुक्स और ब्यूटी जैसी बातें चलन से बाहर होती जा रही हैं। ऐसे ही 'टिंग एप ओकेक्यूपिड' के देश के 86 हजार युवाओं पर केंद्रित एक ताज़ा सर्वे में खुलासा हुआ है कि आजकल के 79 फीसदी युवा सुंदरता को नहीं, तीक्ष्ण आइक्यू वाली लड़कियों को ज्यादा महत्व दे रहे हैं और 83 प्रतिशत लड़कियों को तेज आइक्यू वाले युवा ही ज्यादा आकर्षित कर रहे हैं। दरअसल, बात कुल मिलाकर आज के ज़माने में खासकर बच्चों और युवाओं के आइक्यू स्कोर यानी टैलेंट की है।


हाल ही में, अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की तीस साल की एक स्टडी में विशेषज्ञों ने बच्चों की इंटेलीजेंस पर जेनेटिक और एन्वॉयर्नमेंटल प्रभाव का पता लगाने के लिए अध्ययन किया तो पता चला कि बच्चे की बुद्धिमत्ता और कार्यकौशल पर माता-पिता के जींस और पैरेंटल माहौल का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। बचपन में जब उसका मस्तिष्क आकार ले रहा होता है, नई चीजें ग्रहण करने के लिए सबसे ज्यादा वह एक्टिव रहता है, इसमें पैरेंटिंग स्टाइल का बहुत बड़ा योगदान होता है। उनका मानना है कि बचपन से ही दिमाग को अच्छी खुराक और सही ट्रेनिंग मिले, बच्चा आगे चलकर इंटेलीजेंट होता ही होता है।


बच्चे की आइक्यू बढ़ाने के लिए पैरेंट्स का फॉर्मल रूप से उन्हें सिर्फ पढ़ाना ही जरूरी नहीं है। ज्यादा जरूरी है, उसके लिए सही और प्रेरक माहौल तैयार करना। यानी कि उसकी खान-पान में रुचि, अगल-बगल मौजूद चीजें, आस-पास मौजूद लोग, सामने पड़ा खिलौना, आसमान में दिखने वाला चांद या घर के छज्जे पर बैठी चिड़िया को लेकर उसके सेंस इंप्रूवमेंट में ब्रेन एक्सरसाइज प्राथमिक होनी चाहिए। सक्सेसफुल इंटेलेक्चुअल फंक्शनिंग में भाषा की भूमिका अहम होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं की सलाह है कि शुरू से ही बच्चों को मधुर संगीत सुनाना चाहिए क्योंकि कि ऐसे बच्चे पजल सॉल्व करने में फास्ट होते हैं। 





कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (अमेरिका) के शोधकर्ताओं द्वारा सेंटियागो में नौ सौ स्वस्थ बच्चों और उनकी मांओं के आइक्यू पर किए गए एक ताज़ा रिसर्च में पता चला है कि मां के डिप्रेशन का बचपन से सोलह साल तक की उम्र की उनकी संतानों के आइक्यू लेवल पर गंभीर असर होता है। शोधार्थी पेट्रीशिया ईस्ट के मुताबिक, रिसर्च में पाया गया कि बहुत अधिक डिप्रेस महिलाएं अपने बच्चों की भावनात्मक रूप से और पठन-पाठन संबंधी सामग्री उपलब्ध कराकर मदद नहीं कर सकी थीं, जिससे उनके बच्चों के आइक्यू पर गहरा असर देखा गया।


कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के ही एक अन्य इनवायरनमेंटल रिसर्च में सामने आया है कि प्रदूषण से प्रभावित बच्चों का आइक्यू लेवल सात अंक तक घट जाता है क्योंकि प्रदूषित कण गर्भनाल में पहुंच कर गर्भस्थ शिशु के दिमाग को क्षतिग्रस्त कर देते हैं। प्रदूषित इलाके में रहने वाली महिलाओं के चार साल तक के बच्चों पर हुए इस रिसर्च में उनका आइक्यू औसतन 2.5 अंक तक और अधिकतम 6.8 अंक कम पाया गया। यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लास्गो के शोधकर्ताओं की शेल्बी काउंटी (टिनेशी) के एक हजार बच्चों पर फोकस एक अन्य स्टडी में बताया गया है कि गर्भावस्था में धूप कम सेंकने से बच्चों में सीखने की क्षमता (लर्निंग डिसेबिलिटी) सिमट जाती है।


आइक्यू और आइक्यू स्कोर एक उम्र के बाद स्थिर हो जाते हैं, लेकिन आइक्यू स्कोर बढ़ाया जा सकता है । आइक्यू 14 से 19 वर्ष के बाद में स्टेबल हो जाता है। उसके बाद बदलाव मुश्किल होता है। आइक्यू टेस्ट पर प्रैक्टिस कर उसे बढ़ाया भी जा सकता है। पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के एक रिसर्च में बताया गया है कि बच्चों का आइक्यू लेवल बढ़ाने के लिए उन्हें सप्ताह में कम से कम एक बार मछली जरूर खिलानी चाहिए। ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के असोसिएट प्रोफेसर डॉ माइकल डैलर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष दिया है कि घर में मातृ भाषा बोलने वाले बच्चे अधिक मेधावी होते हैं। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया इरविन के शोधकर्ताओं के मुताबिक दोपहर की नींद से बच्चे तरोताजा महसूस करते हैं। इससे उनके आइक्यू में इजाफा होता है।





एक रिसर्च में दावा किया गया है कि देर से सोने और अभद्र शब्‍दों का अधिक इस्‍तेमाल करने वाले लोग आमतौर पर ईमानदार और बुद्धिमान होते हैं। इस स्‍टडी के मुताबिक जिन लोगों का आइक्यू अधिक होता है, वे रात में अधिक सक्रिय होते हैं। जिन लोगों का आइक्यू 75 से कम होता है, वे रात में 11:41 बजे तक जगते हैं और जिन लोगों का आइक्यू 123 से अधिक है, वे आमतौर पर स्मार्ट और मध्‍यरात्रि के बाद यानी 12:30 बजे तक जागते हैं।


फ्लोरिडा की गल्फ कोस्ट यूनिवर्सिटी में टॉड मैकएलरॉय के नेतृत्व में एक स्टडी की में पाया गया है कि सुस्त रहने वाले लोग काफी बुद्धिमान होते हैं। उम्र का ताल्‍लुक व्यक्ति के आइक्यू से भी होता है। इश्यू ऑफ साइकोलॉजीकल साइंस के पचास हजार बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों पर किए गए एक मेमोरी टेस्ट के मुताबिक, कॉग्नीटिव स्कील, जिसमें नाम, नये शब्द, सूचनाएं आदि याद करना, उम्र के साथ बढ़ते जाते है। 


गौरतलब है कि केवल आइक्यू टेस्ट के आधार पर आज के इंसान को सबसे अक़्लमंद कहना भी जोख़िम भरा हो चुका है। आइक्यू के बढ़ने का सिलसिला बीसवीं सदी के आग़ाज़ से हुआ था, जबकि इस ओर गंभीरता से अब जाकर मनोवैज्ञानिकों ध्यान गया है। आइक्यू का अधिकतम स्कोर 100 ही होता है। इसी के आधार पर हर पीढ़ी के बढ़ते आइक्यू का अंदाज़ा होता आ रहा है।


आज से सौ साल पहले आइक्यू टेस्ट यानी अक़्लमंदी मापने वाला टेस्ट ईजाद किया गया था। तब से हर पीढ़ी ने इस टेस्ट में पिछली पीढ़ी के मुक़ाबले हमेशा बेहतर प्रदर्शन किया है। यानी 1919 के मुक़ाबले आज 2019 का औसत इंसान भी जीनियस है। वैज्ञानिक इसे 'फ़्लिन इफेक्ट' कहते हैं। ताज़ा दावे और संकेत मिले हैं कि बुद्धिमत्ता का स्वर्ण युग ख़त्म होने वाला है क्योंकि इंसान बुद्धिमानी के शिखर पर पहुंच चुका है। अब उसकी अक़्ल का और विकास नहीं होगा। आज ज़रूरत बढ़े हुए आइक्यू की ख़ुशी मनाने की नहीं है, बल्कि, अब हमारे लिए अपना आइक्यू तार्कसंगत बनाना जरूरी हो गया है।