दिव्यांग की उम्मीद की किरण बना स्टार्टअप जेनइलेक का उपकरण एक्सोस्केलटन

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शरीर के निचले अंगों के लकवाग्रस्त होने पर चलने-फिरने में असमर्थ लोगों के लिए दिल्ली के स्टार्टअप 'जेनइलेक' के सीईओ जॉन कुजूर ने सस्ती कीमत वाला 'रोबोटिक एक्सोस्केलटन' उपकरण ईजाद किया है। इस स्टार्टअप की टेक्नोलॉजी पैरालिसिस, स्ट्रोक, स्पाइनल कॉड इंज्यूरी में बड़ी मददगार साबित हो रही है।


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फोटो क्रेडिट: सोशल मीडिया



हमारे देश में विकलांगता अभिशाप तो है लेकिन उसके प्रति सरकारी-गैरसरकारी अथवा चिकित्सकीय उपेक्षा का आलम ये है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक, 2.68 करोड़ (2,68,10,557) लोग विकलांग हैं। जब सड़क दुर्घटनाओं में भारत विश्व में पहले नंबर पर है, फिर यूएसए के 17 फीसद के मुकाबले यहां विकलांग सिर्फ दो-ढाई फीसद ही कैसे हो सकते हैं।


डब्ल्यूएचओ ने पूरी दुनिया की आबादी में विकलांग लोगों की तादाद लगभग 15 फीसदी मानी है। एक सर्वे के मुताबिक, भारत में करीब 10 करोड़ विकलांगजन हैं। खैर, ये तो रही आंकड़ों और विकलांग जनों की उपेक्षा की बात।


हमारे देश में जहां, कुल स्टार्टअप की संख्या 8,900 से 9,300 के बीच रही है और वर्ष 2019 में इस कार्यक्षेत्र के लिए 4.4 अरब डॉलर का दोगुना वित्त पोषण भी हुआ है, विकलांग जनों के कल्याणार्थ गिने-चुने स्टार्टअप ही अब तक सामने आए हैं। उन्ही में एक है दिल्ली का स्टार्टअप 'जेनइलेक', जिसने पैरालिसिस के शिकार विकलांगों और बुजुर्गों की उम्मीद की किरण 'रोबोटिक एक्सोस्केलटन' उपकरण तैयार किया है।


यद्यपि यह उपकरण विकलांगता के असर को पूरी तरह से खत्म नहीं करता, लेकिन यह पैरों से असमर्थ लोगों को चलने-फिरने में काफी हद तक मदद करता है। यह बुजुर्गों के लिए भी काफी मददगार है।

स्टार्टअप 'जेनइलेक' के सीईओ जॉन कुजूर बताते हैं कि एक्सोस्केलटन रोबोटिक सपोर्ट सिस्टम है। यह अपंग व्यक्ति के अंगों की क्षमता बढ़ा देता है। इस स्टार्टअप की टेक्नोलॉजी पैरालिसिस, स्ट्रोक, स्पाइनल कॉड इंजरी और इस तरह की दूसरी स्थितियों का सामना करने वाले लोगों की मदद करती है।


एक्सोस्केलटन के सहारे विकलांग लोग दोबारा चल-फिरने में समर्थ हो जाते हैं। यह ऐसे लोगों को आत्मनिर्भर बनने में मदद करता है। इससे न सिर्फ उन्हें शारीरिक रूप, बल्कि मानसिक रूप से भी फायदा होता है। एक्सोस्केलटन रोबोटिक सपोर्ट सिस्टम की मदद से नौकरीशुदा लोगों की मुश्किल लगभग खत्म ही हो जाती है।





'जेनइलेक' के सीईओ जॉन कुजूर की पढ़ाई लिखाई नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से हुई है।


जॉन कुजूर बताते हैं,

‘‘यह टेक्नोलॉजी अंग या हाथ को हिलाने-डुलाने की क्षमता को मजबूती देती है। इससे खासकर पैरालिसिस के शिकार लोगों को काफी मदद मिलती है। पश्चिमी देशों में ऐसी टेक्नोलॉजी पहले से इस्तेमाल हो रही है। यह स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के चलते अंगों के कमजोर हो जाने जैसे हालात में बेहद मददगार है।’’

कुजूर भारत में बहुत कम कीमत वाले एक्सोस्केलटन तैयार कर रहे हैं, जिसे विदेशों को भी उपलब्ध कराया जा रहा है। एक्सोस्केलटन व्हीलचेयर पर रहने वाले लोगों को समाज में अपनी भूमिका बढ़ाने में मददगार है। इसके सहारे कोई भी विकलांग अथवा पैरों से चलने में असमर्थ व्यक्ति अन्य लोगों की तरह आराम से चल-फिर सकता है, पैदल यात्रा कर सकता है।


इसी तरह स्पाइनल कोर्ड इंज्यूरी के लिए इजरायल निर्मित री-वॉक को एफडीए से अप्रूवल मिल चुका है। आर्गो मेडिकल टेक्नॉलजी ने इनोवेटिव रोबोटिक एक्सोस्केलटन सूट की सहायता से शरीर के निचले अंगों के लकवाग्रस्त होने पर पीड़ित को चलने-फिरने में समर्थ बनाया है। री-वॉक रोबोटिक एक्सोस्केलटन सूट को पहना जा सकता है।


यह स्पाइनल कोर्ड इंज्यूरी से पीड़ित व्यक्ति को सीधे खड़े होने में और सीढ़ी चढ़ने में समर्थ बनाने के लिए उसके हिप और घुटने के मूवमेंट को मजबूती देता है। आर्गो फाउंडर डॉ. अमित गोफ्फर ने वर्ष 2001 में इसे विकसित किया था। वह एक हादसे में लकवाग्रस्त हो गए थे। री-वॉक सिस्टम यूरोप में साल 2012 से उपलब्ध है।


यह डिवाइस लंदन मैराथन के दौरान उस समय चर्चा में आ गया, जब सीने से निचले हिस्सों में हमेशा के लिए लकवाग्रस्त क्लैरी लोमास ने इसकी मदद से 26.2 मील की दूरी को पार किया।





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