अगर एक जींस, टी-शर्ट बनाने में खर्च होता है 6481 लीटर पानी, तो कितना सस्टेनेबल है 'फास्ट-फैशन' का ट्रेंड?

अगर एक जींस, टी-शर्ट बनाने में खर्च होता है 6481 लीटर पानी, तो कितना सस्टेनेबल है 'फास्ट-फैशन' का ट्रेंड?

Saturday March 18, 2023,

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“फास्ट फैशन” हमारे दौर का एक सच है. फैशनेबल दिखने को लेकर कंज्यूमर्स की होड़ ने सस्ते नॉक-ऑफ प्रोडक्ट्स/कपडे बनाने और खरीदने की प्रवृत्तियों को गति दी है. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, हज़ारों ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और इन्स्टाग्राम के लिए फैशनेबल दिखने की संस्कृति ने “फास्ट फैशन” को पिछले एक दशक में एक ट्रेंड के रूप में स्थापित किया और अब यह एक लाइफस्टाइल बन चूका है.


लेकिन इस लगभग 2.5 ट्रिलियन डॉलर के फास्ट फैशन उद्योग को बनाए रखने का सच दो तरह की कीमतों पर आता है. कम कीमतों पर बेचे जाने वाले कपडे की उत्पादन लागत कम रखने की कीमत पर्यावरण और श्रमिकों के अधिकार का हनन पर टिकी होती है.


कहते हैं, जल ही जीवन है. दुनिया में पर्याप्त पानी है, लेकिन इसका सिर्फ 3% ताजा पानी है जिसका उपयोग खाना पकाने और पीने के लिए किया जा सकता है. इसलिए हाल के वर्षों में, पानी की कमी एक वैश्विक मुद्दा बन कर उभरा है.ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने के कारण पानी की आवश्यकता और भी बढ़ती जाएगी, और निकट भविष्य में पानी की जरूरतों के लिए भी हमें भुगतान करना पड़ेगा. अभी यह नौबत पिने योग्य पानी को लेकर सिमित है.


पानी के साथ कपडा भी इंसान की बुनियादी जरुरत है. और अगर हम इन दोनों को मिला दें तो हमें पता चलेगा कि फैशन इंडस्ट्री पानी का अत्यधिक इस्तेमाल करती है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो पानी की कमी की समस्या और भी कई गुणा गंभीर जाएगी.


अगर हम कुछ आंकड़ों पर नज़र डालें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यदि सभी के पास सुरक्षित और स्वच्छ पानी उपलब्ध होता, जिसका उपयोग पीने और स्वच्छता उद्देश्यों के लिए किया जा सकता था, तो प्रति वर्ष लगभग 2 मिलियन लोगों की जान बचाई जा सकती थी. एक और रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 2 अरब लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है.


ऐसे में, फैशन इंडस्ट्री और खासकर “फास्ट फैशन” के इस चलन द्वारा पानी की खपत पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरुरत है. अगर फैशन उद्योग द्वारा इस खपत को नियंत्रित नहीं किया गया, तो जल्द ही भविष्य में, हमारे पास शून्य पानी रह जाएगा.


संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुताबिक एक जोड़ी जींस बनाने में 3,781 लीटर पानी लगता है. यह राशि 5.5 वर्ष के ताजे पेयजल के बराबर है.


एक टी-शर्ट जिसे हम नियमित रूप से घर पर, काम के लिए, या सिर्फ दोस्तों से मिलने के लिए पहनते हैं, 2,700 लीटर पानी का उपयोग करता है. यह 11,340 कप पानी के बराबर है जिसे चार साल की अवधि में पिया जा सकता है.


लेकिन कपड़े बनाते समय केवल पानी की खपत ही एक मुद्दा नहीं है: पानी का प्रदूषण भी एक प्रमुख चिंता का विषय है. विश्व बैंक के मूल्यांकन के अनुसार, सभी आधुनिक जल संदूषण, पानी में सूक्ष्म जीव या रसायन का मिल जाना, का लगभग 17-20 प्रतिशत कपड़ों के प्रोसेसिंग की प्रक्रिया की वजह से होती है. कच्चे माल को वस्त्रों में बदलने के लिए सिंथेटिक रसायनों का उपयोग किया जाता है. कहा जाता है कि लगभग 72 तरह के जहरीले सिंथेटिक्स केवल कपड़ों की रंगाई की वजह से पानी में मिल जाते हैं और अरबों लीटर पानी को दूषित करते हैं.


यही नहीं, कई कपड़े आइटम पॉलिएस्टर का उपयोग करते हैं. पॉलिएस्टर का कपडा प्रोसेसिंग के दौरान लाखों प्लास्टिक माइक्रोफाइबर को बहा पानी को प्रदूषित करता है.

क्या किया जा सकता है?

कपड़ों के प्रोसेसिंग में न केवल भारी मात्रा में पानी की खपत होती है, बल्कि यह पानी को भी प्रदूषित करता है.


पारंपरिक कपास की तुलना में ऑर्गेनिक कपास 91% कम पानी का उपयोग करता है. इसलिए, जब भी संभव हो, हमें ऑर्गेनिक कपास को चुनना चाहिए.


कम से कम कपडे खरीदना चाहिए. कपडे जब तक उपयोग में लाए जा सके, उपयोग किया जाना चाहिए. “फास्ट-फैशन” के ट्रेंड से बचना चाहिए और दूसरों को भी इसके हानिकारक प्रभाव के बारे में बताना चाहिए.


पॉलिएस्टर को खरीदने से बचना चाहिए.


Edited by Prerna Bhardwaj

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