वीकली रिकैप: पढ़ें इस हफ्ते की टॉप स्टोरीज़!

यहाँ आप इस हफ्ते प्रकाशित हुई कुछ बेहतरीन स्टोरीज़ को संक्षेप में पढ़ सकते हैं।

इस हफ्ते हमने कई प्रेरक और रोचक कहानियाँ प्रकाशित की हैं, उनमें से कुछ को हम यहाँ आपके सामने संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनके साथ दिये गए लिंक पर क्लिक कर आप उन्हें विस्तार से भी पढ़ सकते हैं।

इन्वेस्टमेंट बैंकिंग छोड़ बनीं गेमिंग आंत्रप्रेन्योर

जब परिणीता राजगढ़िया 2019 में दक्षिण पूर्व एशिया में छुट्टियां मनाने गईं, तो उन्हें जीरो लेटेंसी (Zero Latency), वेयरहाउस-स्केल, फ्री रोम, मल्टी-प्लेयर वर्चुअल रियलिटी एंटरटेनमेंट से परिचित कराया गया। इतने बड़े पैमाने पर वीआर गेमिंग का यह उनका पहला अनुभव था।

परिणीता राजगढ़िया

परिणीता राजगढ़िया

परिणीता कहती हैं, "मुझे यह बेहद पसंद आया और मुझे पता था कि मुझे यही करना है। मुंबई लौटने पर, मैं जीरो लेटेंसी के संपर्क में आई, जो ऑस्ट्रेलिया में स्थित है, और इसे भारत में शुरू करने का विचार रखा।”


वह आगे कहती हैं, "फ्री-रोम वर्चुअल रियलिटी यूजर्स को एक खुली जगह में स्वतंत्र रूप से घूमने और केबल और अन्य मोबाइल उपकरणों से विवश नहीं होने का विचार मेरे लिए नया था।"


इसने उन्हें 2019 में मुंबई में Samrey Entertainment शुरू करने के लिए प्रेरित किया।


IBS हैदराबाद से MBA कर चुकी, परिणीता ने अपनी गर्भावस्था तक एक इन्वेस्टमेंट बैंकर के रूप में काम किया। अपने मातृत्व के दौरान, उन्होंने Needle Art की स्थापना की, जो एक कंपनी है जो महिलाओं और बच्चों के लिए कस्टम कढ़ाई वाले फैशन (इंडो-वेस्टर्न और वेस्टर्न) की पेशकश करती है। जबकि परिणीता के लिए आंत्रप्रेन्योरशिप कोई नई बात नहीं थी, लेकिन गेमिंग सेक्टर नया था।


वह कहती हैं, "यह कुछ क्रांतिकारी है और वीआर गेमिंग का भविष्य है, और इसी तरह से इसे भारत में लाने का विचार आया और यहां हम हैं - मुंबई में क्रांतिकारी अनुभव के साथ। इसलिए मैंने पहली बार भारत में 'फ्री रोम वर्चुअल रियलिटी' अनुभव लाने के लिए लाइसेंस प्राप्त पार्टनर Samrey Entertainment शुरू करने का फैसला किया।


जीरो लेटेंसी ने एक ही समय में एक ही गेम में अधिकतम 8 खिलाड़ियों को समायोजित करके वीआर अनुभव में सामाजिक तत्व को शामिल किया है। मार्च 2021 तक, 22 देशों में 46 स्थानों पर जीरो लेटेंसी मौजूद है।

डॉग मैन ऑफ नागपुर

कोविड-19 की दूसरी लहर ने पूरे भारत में लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है जो वायरस से बचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लॉकडाउन की पाबंदियों का असर न सिर्फ इंसानों पर पड़ा है, बल्कि आवारा पशुओं और कुत्तों पर भी पड़ा है क्योंकि उन्हें खिलाने वाला कोई नहीं है।

रंजीत नाथ

रंजीत नाथ 

वहीं, नागपुर में पिछले 11 साल से एक शख्स इन कुत्तों की सेवा कर रहा है और इस शख्स की कहानी अब सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। नागपुर में रंजीत नाथ नाम का ये शख्स पिछले 11 सालों से आवारा कुत्तों को खाना खिला रहा है और वह उन्हें अपना 'बच्चा' मानता है। लोग रंजीत को अब "डॉग मैन ऑफ नागपूर" और "रंजीत दादा" भी कहने लगे हैं।


रंजीत की कहानी अभिनव जेसवानी नाम के एक ब्लॉगर ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर साझा की थी, जहां उन्होंने शहर में आवारा कुत्तों की सेवा करने वाले 58 वर्षीय व्यक्ति का एक वीडियो साझा किया था। वीडियो के साथ, उन्होंने रंजीत की कहानी भी लिखी थी। रंजीत ने कथित तौर पर 11 साल पहले आवारा कुत्तों की सेवा शुरू की थी और शुरू में उन्हें बिस्कुट दे रहे थे। पिछले ढाई साल से उन्होंने चिकन और मटन मिक्स बिरयानी परोसना शुरू किया था। वह दान से मिलने वाले पैसे से बिरयानी तैयार करते हैं और दक्षिण नागपुर में 150-170 आवारा कुत्तों को परोसते हैं।


वीडियो इंटरनेट पर आते ही इन कुत्तों के प्रति रंजीत नाथ की दया और प्यार की भावना ने सोशल मीडिया यूजर्स का दिल छू लिया।

75 करोड़ रुपये के रेवेन्यू वाली कंपनी

90 के दशक में अहमदाबाद के रहने वाले पीएन मेहता ने महसूस किया कि टेक्नोलॉजी को अपनाकर विकास की गुंजाइश को और बढ़ाया जा सकता है। मेहता पहले से ही पोर्टेबल इलेक्ट्रिक पावर टूल्स मैन्युफैक्चरिंग के व्यवसाय में थे। यह व्यवसाय उन्होंने 1978 में शुरू किया था, और इसलिए डेयरी टेक्नोलॉजी में प्रवेश करना उनके लिए उतना बोझिल नहीं था। और इस प्रकार 1992 में, Prompt Equipments Pvt. Ltd का जन्म हुआ।

श्रीधर मेहता

श्रीधर मेहता

YourStory से बात करते हुए, मेहता के बेटे और दूसरी पीढ़ी के उद्यमी श्रीधर मेहता बताते हैं कि कैसे उन्होंने और उनके पिता ने ऐसे समय में व्यवसाय का निर्माण किया जब डेयरी क्षेत्र अत्यधिक असंगठित था, और औद्योगिक चुनौतियों से भरा हुआ था। साथ ही उन्होंने कंपनी के आगे के रास्ते के बारे में भी बताया।


वह कहते हैं, “पिछले 29 वर्षों में, जब से प्रॉम्प्ट अस्तित्व में आया है, हमने डेयरी क्षेत्र को तकनीकी सहायता प्रदान करके सहायता की है। हमने इस क्षेत्र को जमीनी स्तर से विकसित होते देखा है - अत्यधिक असंगठित होने से लेकर अब हमारे कुछ ग्राहकों के रूप में बड़े डेयरी ब्रांड होने तक।"


प्रॉम्प्ट इक्विपमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के पास अमूल, हेरिटेज, मदर डेयरी, आनंद आदि सहित पूरे भारत में ग्राहक हैं, और श्रीधर का दावा है कि कंपनी ने वित्त वर्ष 2019-20 में 75 करोड़ रुपये का राजस्व कमाया।

चौथी पास महिला ने खड़ा किया वैश्विक ब्रांड

गुजरात के कच्छ इलाके में स्थित भदरोई गाँव में रहने वाली 33 साल की पाबिबेन लक्ष्मण रबारी जब महज 5 साल की थीं तभी उनके पिता का देहांत हो गया। तब पाबिबेन की माँ को घर चलाने के लिए मजदूरी करनी पड़ी और उस समय ही पाबिबेन को माँ के ऊपर बीत रही तमाम मुश्किलों का अहसास हो गया था।

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पाबिबेन को बहुत अधिक शिक्षा नसीब नहीं हो सकी और उन्हें चौथी कक्षा के बाद ही स्कूल छोड़ना पड़ा। पाबिबेन के अनुसार जब वे महज 10 साल की थीं तब ही वे अपनी माँ के साथ काम पर जाती थीं। इस दौरान वे लोगों के घरों में पानी भरने का काम करती थीं, जिस बदले उन्हे हर रोज़ एक रुपये का मेहनताना मिलता था। पाबिबेन ने इसी दौरान अपनी माँ से पारंपरिक कढ़ाई सीखनी शुरू कर दी थी।


साल 1998 में पाबिबेन ने एक एनजीओ की मदद से रबारी महिला समुदाय को जॉइन कर लिया और इस दौरान उन्होने ‘हरी-जरी’ नाम की एक खास कढ़ाई कला की खोज भी की। पाबिबेन ने समुदाय के साथ करीब 6 साल काम किया और कुशन, कवर और रज़ाई समेत तमाम चीजों पर डिजाइन बनाना सीखा। इस दौरान उन्हे 300 रुपये महीने का मेहनताना मिलता था।


पाबिबेन 18 साल की थीं जब उनकी शादी तय कर दी गई। पाबिबेन रबारी ने अपना पहला बैग अपनी ही शादी में बनाया था और उस दौरान उनकी शादी को देखने के लिए कुछ विदेशी पर्यटक भी आए हुए थे, बाद में जिन्हे पाबिबेन का बनाया हुआ वह बैग भेंट किया गया। उन पर्यटकों को वह बैग बेहद पसंद आया और उन्होने उस बैग को ‘पाबीबैग’ का नाम दे दिया। उन पर्यटकों के जरिये उनके बैग को भारत के बाहर पहचान मिलने में सफलता हासिल हुई।


आज पाबिबेन द्वारा बनाए गए बैग अमेरिका, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया समेत कई अन्य देशों में निर्यात किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं मशहूर बॉलीवुड फिल्म ‘लक बाय चांस’ में भी इस बैग का इस्तेमाल किया गया था। पाबिबेन को उनके पति ने आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जिसके बाद उन्होने अपने उत्पादों के साथ तमाम प्रदर्शनियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।

स्वदेशी साइबर सुरक्षा स्टार्टअप InstaSafe

बेंगलुरु स्थित साइबर सिक्योरिटी स्टार्टअप InstaSafe तेजी से विकसित हुआ है, जिससे यह भारत में सबसे तेजी से बढ़ती तकनीकी कंपनियों की प्रतिष्ठित सूची में शामिल हो गया है।

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InstaSafe के फाउंडर्स

2012 में संदीप कुमार पांडा, बीजू जॉर्ज और प्रशांत गुरुस्वामी द्वारा स्थापित, बेंगलुरु स्थित InstaSafe को सरल, लोक-केंद्रित समाधान बनाने के मिशन के साथ शुरू किया गया था, जो इंटर्नल असेट्स के लिए डिफ़ॉल्ट रूप से ट्रस्ट बनाने और एक्सटर्नल असेट्स से ट्रस्ट को डिनाई करने की पारंपरिक अवधारणा से परे था।


जैसा कि संदीप बताते हैं, InstaSafe ने Zero Trust अप्रोच का उपयोग करना शुरू किया, जो उस समय अपेक्षाकृत एक नया सिक्योरिटी कॉन्सेप्ट था। इसने मूल रूप से नेटवर्क के भीतर या इसके बाहर डिवाइसेज के बीच भेदभाव करना बंद कर दिया, और सभी डिवाइसेज को ज़ीरो ट्रस्ट दिया।


इसका मतलब है, प्रत्येक डिवाइस को प्रमाणित और सत्यापित किया गया था, और एक्सेस देने से पहले प्रत्येक एक्सेस रिक्वेस्ट को वैरिफाई किया गया था।


संदीप कहते हैं, “इस संक्रमणकालीन अवधि के दौरान इंस्टासेफ ने तीव्र गति से विकास किया है, जिससे यह देश में सबसे तेजी से बढ़ती तकनीकी कंपनियों की प्रतिष्ठित सूची में शामिल हो गया है। जबकि हमारे काम करने का तरीका निश्चित रूप से परिपक्व हो गया है, हम अभी भी हमारे रास्ते में आने वाली हर आधुनिक सुरक्षा चुनौती को नया करने और हल करने के लिए भूखे हैं।”


आज, यह 120 के क्लाइंट बेस के साथ 574 प्रतिशत की वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि दर्ज करने का दावा करता है, जिसमें 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। स्टार्टअप ने अब तक 2.7 मिलियन डॉलर जुटाए हैं।

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