क्यों इस 50 वर्षीय महिला ने COVID-19 से उबरने के बाद घी का कारोबार शुरू करने का फैसला किया

By Rekha Balakrishnan
June 22, 2021, Updated on : Tue Jun 22 2021 04:57:09 GMT+0000
क्यों इस 50 वर्षीय महिला ने COVID-19 से उबरने के बाद घी का कारोबार शुरू करने का फैसला किया
कमलजीत कौर ने जनवरी में पंजाब के एक गांव में अपने खेत में पारंपरिक बिलोना पद्धति का उपयोग करके बनाया गया ताजा घी बेचने के लिए किम्मू किचन (Kimmu's Kitchen) की शुरुआत की।
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"अपने पति और बच्चों से भरपूर समर्थन के साथ, बिना औपचारिक शिक्षा के 50 वर्षीय महिला ने किम्मू किचन शुरू करने का फैसला किया। यह एक स्टार्टअप है जो ताजा घी बनाने में महारत रखता है, जो कि एडिटिव्स, प्रिजर्वेटिव या केमिकल से फ्री होता है - और पारंपरिक बिलोना पद्धति से, सीधे उनके गांव में बनाया जाता है।"

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पंजाब के लुधियाना के एक छोटे से गाँव जहाँगीर में जन्मी और पली-बढ़ीं कमलजीत कौर उर्फ किम्मू अपनी शादी के बाद मुंबई जैसे हलचल भरे शहर में चली गईं। हालांकि, सरसों और गेहूं के खेत, घर में उगाई गईं सब्जियां, और उनकी खुद की भैंसों का ताजा दूध और घी की यादें उनके साथ बनी रहीं। लेकिन 50 साल की उम्र के बाद था जब उन्होंने अपने गांव के ताजे घी को पूरे भारत के शहरों में ले जाने के बारे में सोचा। 


इसे इत्तेफाक कहें या परिस्थिति, लेकिन पिछले साल COVID-19 से उबरने के बाद, उन्होंने महसूस किया कि जिंदगी ने उन्हें एक "दूसरा मौका" दिया है - जिसे वह बर्बाद नहीं करना चाहती थीं। इसलिए, अपने पति और बच्चों से भरपूर समर्थन के साथ, बिना औपचारिक शिक्षा के 50 वर्षीय महिला ने किम्मू किचन शुरू करने का फैसला किया। यह एक स्टार्टअप है जो ताजा घी बनाने में महारत रखता है, जो कि एडिटिव्स, प्रिजर्वेटिव या केमिकल से फ्री होता है - और पारंपरिक बिलोना पद्धति से, सीधे उनके गांव में बनाया जाता है। 


वह कहती हैं, “मैं अपनी माँ और चाची को घी बनाते हुए देखकर बड़ी हुई हूं। कृषि हमारा मुख्य व्यवसाय था। मैं इस बारे में हमेशा उत्सुक रहती थी कि आखिर इस घी को हर दिन मैन्युअल यानी हाथों से कैसे बनाया जाता है। मेरी शादी के बाद, मैंने अपने ससुराल वालों को भी ऐसा करते देखा।”


किम्मू मुंब्रा में रहती हैं, जो कि एक घनी बस्ती है। यह ठाणे में 5 किमी से अधिक में फैली है और इसकी आबादी करीब 14 लाख है। COVID-19 से बुरी तरह बीमार होने के बाद, वह आभारी थीं कि वह बच गईं। यही वह समय था जब उन्होंने "साइड बिजनेस" के बारे में सोचना शुरू कर दिया था और उनके लिए कुछ ऐसा करने से बेहतर तरीका और क्या हो सकता था जिसमें वह पहले से ही अच्छी थीं।


वह बताती हैं, “शुरू में, मैंने मुंब्रा से ही दूध लेना शुरू किया, लेकिन मैं घी से संतुष्ट नहीं थी। मैंने अतिरिक्त घी दोस्तों और परिवार को बांट दिया। उन्हें बहुत अच्छा लगा, लेकिन मैं इस घी की तुलना अपने गांव के घी से कर रही थी। हो सकता है कि वातावरण में अंतर, दूध की ताजगी या फीड ने इसके उत्कृष्ट स्वाद में योगदान दिया हो।”


परिवार ने जहांगीर में अपने खेत में कुछ और भैंसें जोड़ीं, और मदद ली और कारोबार शुरू किया। इसके बाद घी को मुंबई ले जाया गया जहां से वितरण हुआ।


किम्मू किचन के कंसल्टिंग सीटीओ हरप्रीत सिंह बताते हैं, "इस आइडिया ने पिछले साल दिसंबर में जड़ें जमा लीं और सैंपलिंग के बाद, हमने जनवरी के अंत तक वेबसाइट लॉन्च की और उत्पाद की मार्केटिंग शुरू कर दी। COVID-19 से उबरने के बाद, किम्मूजी समाज को एक स्वस्थ उत्पाद देना चाहती थीं।” 


घी भारतीय रसोई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है - और यह गर्भवती और नई माताओं को भी दिया जाता है। किम्मू किचन में, घी बिलोना विधि द्वारा बनाया जाता है - यह सबसे पुरानी विधियों में से एक है जहां दूध का पहले दही बनाया जाता है, फिर उस दही को लकड़ी की मथनी यानी बिलोना से मथा जाता है और उससे निकलने वाली क्रीम को घी बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसे बिना किसी मशीनीकरण के मैन्युअल रूप से बनाया जाता है।


हरप्रीत भारत में घी बाजार की गतिशील प्रकृति के बारे में बताते हैं, वह कहते हैं, “घी की मांग आपूर्ति से कहीं अधिक है और लोकप्रिय ब्रांडों को मांग को पूरा करने के लिए क्रीम ब्लेंड के आयात का सहारा लेना पड़ता है। आपको अक्सर जो घी मिलता है वह बकरी के दूध, भैंस के दूध के साथ ऊंट के दूध या गाय के दूध से बनी मलाई का घी होता है। लेकिन यह उनकी गलती नहीं है। यहां तक कि अगर भारत के सभी किसानों से दूध लिया जाए, तब भी यह घी की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।” 

शुद्ध और किफायती

किम्मू कहती हैं कि उनके फार्म का घी हल्का, गैर-चिकना होता है, इसमें कोई प्रबल सुगंध नहीं है, और पचने में आसान है। इसी तरह का घी 3,500 रुपये प्रति किलो बेचने वाले अन्य ब्रांडों की तुलना में हमारा घी 1,100 रुपये प्रति किलो पर बिकता है।


वह बताती हैं, "चूंकि हमारे पास अपने खेत और भैंस हैं, इसलिए हमें इसमें शामिल श्रम के अलावा ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता है, जिससे हम इसे कम दर पर बेच सकते हैं।"


टीम ने किम्मू किचन से घी को लोकप्रिय बनाने के लिए एक नई विधि पर भी काम किया। फेसबुक और इंस्टाग्राम विज्ञापनों पर भरोसा करते हुए, उन्होंने मुंब्रा में एक स्थानीय समाचार पत्र और चैनल में विज्ञापन दिए। घनी आबादी ने सुनिश्चित किया कि यहां बेचा जाने वाला घी देश के बाकी हिस्सों में बिकने वाले घी के बराबर हो। हरप्रीत का दावा है कि 80 फीसदी ऑर्डर रिपीट होते हैं और रिस्पॉन्स शानदार रहा है।


लेकिन यह किम्मू के लिए सिर्फ व्यवसाय से कहीं अधिक है। वह कहती हैं, “मैं भी समाज को कुछ वापस देना चाहती थी। हम अपने क्षेत्र में बहुत गरीबी देखते हैं। जब हम अपनी पहली कामयाबी पर पहुँचे, तो हमने रमजान के दौरान जरूरतमंदों को भोजन वितरित करने के लिए अपने रेवेन्यू का इस्तेमाल किया। हम इसे मासिक या त्रैमासिक आधार पर जारी रखने की उम्मीद करते हैं।”


किम्मू ने मक्खन और पनीर के साथ भी प्रयोग किया, लेकिन कम शेल्फ लाइफ और बाजार में पहले से उपलब्ध व्यापक विविधता ने उन्हें एक स्थायी मॉडल के रूप में अकेले घी पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया। वर्तमान में, किम्मू किचन का घी इसकी वेबसाइट के माध्यम से उपलब्ध है।


अंत में किम्मू कहती हैं, "हमने रणनीति के बारे में ज्यादा नहीं सोचा है, लेकिन जिस फ्रीक्वेंसी से वे हमारा घी खरीदते हैं उसके आधार पर हम रिपीट कस्टमर्स के लिए एक सब्सक्रिप्शन मॉडल के बारे में सोच रहे हैं।"


Edited by Ranjana Tripathi