विदेश की नौकरी छोड़ खेती से मोटी कमाई कर रहे अतुल वालिया

  • +0
Share on
close
  • +0
Share on
close
Share on
close


लोग शौकिया तौर भी नौकरी के लिए विदेश चले जाते हैं। कृषि से उच्च शिक्षा प्राप्त हरियाणा के अतुल वालिया के साथ भी ऐसा ही हुआ और वह साढ़े तीन हजार डॉलर मासिक की नौकरी भी अफ्रीका में करने लगे लेकिन अचानक मोटी पगार छोड़ गांव लौट आए। अब फल-सब्जियों की खेती से हर महीने लाखों की कमाई कर रहे हैं।  


agriculture

सांकेतिक तस्वीर

फतेहाबाद (हरियाणा) के गांव बीघड़ में अतुल वालिया घाना की मोटी कमाई वाली नौकरी छोड़कर भारत लौट आए हैं और अब अपने 10 एकड़ खेत में सब्जीो और फल के एग्रीकल्चरल स्टार्ट अप से लाखों रुपये कमा रहे हैं। वह अपने खेतों में तरबूज, खरबूज, करेला, तोरी, घीया पैदा कर रहे हैं। हरियाणा के सिरसा, हिसार, कैथल, करनाल से लेकर पंजाब में लुधियाना के मलेर कोटला, राजस्थान तक उनके खेतों की फल-सब्जियां निर्यात हो रही हैं।


वर्ष 1996 में बीएससी एग्रीकल्चर और पत्राचार से एमबीए करने के बाद वालिया को भारत की पेस्टीसाइड कंपनियों में नौकरी के दौरान जर्मनी की एक पेस्टीसाइड कंपनी से घाना (पश्चिमी अफ्रीका) में नौकरी का ऑफर मिला। बाद में वह पार्क एग्रो में जनरल मैनेजर के रूप में साढ़े तीन हजार डॉलर के मासिक पैकेज पर तरबूज, प्याज, मक्का, टमाटर, मिर्च, खीरा की खेती संभालने लगे।


उस समय तो विदेश में नौकरी के शौक के चलते वह घाना चले गए लेकिन दो वर्ष पहले उनको वतन की मिट्टी की खुश्बू, हरियाणा के ठाठ याद आने लगे और वह अपने गांव लौट आए। वह बताते हैं, बचपन में बुजुर्गों के मुंह से अक्स र एक कहावत सुना करते थे कि 'देसां म्हं देस हरियाणा', तब लगता था कि सब कहने-सुनने की बातें हैं, हरियाणा में क्या रखा है। जब विदेश में काम करने गए, तभी से देश याद आने लगा था।





विदेश घूमने का सपना तो पूरा हो ही चुका था, ऊंचे वेतन के बावजूद नौकरी भी कुछ खास रास न आ रही थी, सो उन्होंने अब अपने घर गांव में ही कुछ कर दिखाने की ठान ली और अपनी जमीन पर आधुनिक तकनीक से खेती के स्टार्अप जुट गए। इसी दौरान हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में सेवारत अपने मित्र डॉ. मनोज भाटिया से कृषि उत्पादों के प्रॉडक्शन और बाजार भावों का जायजा लिया। कुछ समय बाद उनकी देखा-देखी आसपास के किसान भी उनकी ही राह चल पड़े और देसी-फल सब्जियों की खेती करने लगे लेकिन वालिया चूंकि कृषि से उच्च शिक्षा ले चुके थे और साथ में विदेश की उन्नत खेती का उनके पास बेहतर अनुभव भी रहा, इसलिए उत्पादन से लेकर सप्लाई तक उनका काम सही दिशा में चल पड़ा और उनकी हर महीने लाखों रुपए की कमाई हो रही है।

 

अब तो अतुल वालिया की कृषि उपज की हरियाणा के कई शहरों के अलावा राजस्थान, पंजाब तक सप्लाई हो रही है। इस समय अपने गांव बीघड़ की दस एकड़ जमीन में फल-सब्जियों की खेती के साथ जल संरक्षण के उपायों का भी सहारा लेने लगे हैं। अपनी फसलों की वह टपका विधि से सिंचाई करते हैं। इससे पानी की बचत तो होती ही है, कम ही समय में ज्यादा सिंचाई हो जाती है। वह बताते हैं कि घाना में पिवोट इरीगेशन था। सिंचाई की छिड़काव वाली इस विधि से एक बार में 175 एकड़ जमीन में पानी का स्प्रे हो जाता था। स्प्रे की मशीन पूरे खेत में चक्कर लगाती है।


पानी का प्रेशर और स्पीड रेगूलेटर से निर्धारित कर लिया जाता है। आज वह उसी तकनीक का अपनी फसलों की सिंचाई में इस्तेमाल कर रहे हैं। इस विधि से सिंचाई पूरे खेत की न करके केवल पौधों की ही की जाती है। इसके अलावा खाद और कीटनाशक भी अपेक्षाकृत कम खर्च होते हैं, जिससे कृषि लागत घटती है और ज़्यादा मुनाफ़ा हो जाता है। एक पौधे से 50 से 100 फल तक मिल जाते हैं। हर पौधे से तीन दिन के बाद फल तोड़े ज़ाते हैं। इस काम में उनके परिवार के सदस्य भी हाथ बंटाते हैं।





  • +0
Share on
close
  • +0
Share on
close
Share on
close
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest

Updates from around the world

Our Partner Events

Hustle across India