"रहेगी आबो-हवा में ख़याल की बिजली, ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे": क्रांतिकारी भगत सिंह के पांच पसंदीदा गीत

By Prerna Bhardwaj
September 28, 2022, Updated on : Wed Sep 28 2022 06:42:35 GMT+0000
"रहेगी आबो-हवा में ख़याल की बिजली, ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे": क्रांतिकारी भगत सिंह के पांच पसंदीदा गीत
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ऐसे कई इन्क़लाबी शे’र हैं जो हम भगत सिंह के नाम से याद करते हैं और उनके द्वारा लिखा गया समझते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. ये वो शे’र हैं जो भगत सिंह को बहुत पसंद थे और वे उन्हें अक्सर गुनगुनाते या गाते थे. आज हम भगत सिंह की पसंदीदा पांच शे’र या नारे की बात करेंगे जिसे लिखा था किसी और ने लेकिन इन्हें लोगों के दिलों-दिमाग तक पहुंचाने का काम किया भगत सिंह और उनके साथियों ने. और यह कहना भी ग़लत नहीं होगा कि देश की आजादी की लड़ाई में इन गीतों, ग़ज़लों, नारों का एक अहम योगदान रहा है. भगत सिंह के जन्मदिन (Bhagat Singh birthday) पर देखते हैं उनके पसंदीदा शे'र और ग़ज़ल:

1.

रहेगी आबो-हवा में ख़याल की बिजली

ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे

इस शे’र को भगत सिंह के नाम से कोट किया जाता है लेकिन यह शे’र बृज नारायण 'चकबस्त' ने लिखी है.

2.

उसे यह फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़े जफ़ा क्या है

हमें यह शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या

ये शे’र शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के प्रिय अशआर में से एक है, जिसे लोग भगत सिंह का ही लिखा हुआ मानते हैं. यह शे’र कुँवर प्रतापचन्द्र 'आज़ाद' का है जो ज़ब्तशुदा नज़्में किताब में दर्ज है. हालांकि कुछ लोग इस शे’र को भी बृज नारायण 'चकबस्त' का लिखा हुआ मानते हैं.

3.

‘इन्क़लाब ज़िंदाबाद!’

भगत सिंह ने अपनी माँ को एक वचन दिया था कि देश के लिए वो फाँसी के तख़्ते से 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' का नारा लगाएंगे. भगत सिंह के इस प्रिय नारे को आज़ादी की लड़ाई के एक और महत्त्वपूर्ण नेता हसरत मोहनी ने 1921 में गढ़ा था. कहते हैं फांसी की तख़्त की तरफ बढ़ते हुए भगत सिंह ने इतनी ज़ोर से 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा लगाया कि उनकी आवाज़ सुन जेल के दूसरे क़ैदी भी 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' के नारे  लगाने लगे.


किसी भी तरह की गैर-बराबरी के खिलाफ प्रदर्शन या लड़ाई में यह नारा आज भी उस लड़ाई में जान भर देता है.

4.

'मेरा रंग दे बसंती चोला’

ऐसे ही एक बेहद मशहूर गीत है ‘मेरा रंग दे बसंती चोला.’ इस गीत के हिंदी फिल्मों में कई संस्करण आए. लेकिन इसका मूल संस्करण कई मायनों में ऐतिहासिक है. यह गीत मूल रूप 1927 में काकोरी केस के बंदियों ने जेल में तैयार किया था. रामप्रसाद बिस्मल, अश्फ़ाक़उल्ला और अन्य साथियों ने इसे तैयार किया था जिसके बोल फिल्मों में गाए गए बोल से अलग हैं.


यह गीत मूल रूप से कुछ यूं था

मेरा रंग दे बसंती चोला

इसी रंग में रंग के शिवा ने मां का बंधन खोला

यही रंग हल्दी घाटी में था खुलकर खेला

नवबसंत में भारत के हित वीरों का यह मेला

मेरा रंग दे बसंती चोला...

 5.

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...’

आज़ादी की तीन मतवालों, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव; को 23 मार्च, 1931 को जब लाहौर सेंट्रल जेल में उनके वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दिए जाने के लिए ले जाया जा रहा था तब सिपाहियों की बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़ों के बीच एक गाने का भी स्वर सुनाई दे रहा था, "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..." जो बाद में 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आज़ाद हो' के नारे में तब्दील हो गई. इतिहासकारों का कहना है कि इन तीनों को फांसी दिए जाने के बाद उस वक़्त के जेल के वॉर्डेन चरत सिंह सुस्त क़दमों से अपने कमरे में पहुंचे और फूट-फूट कर रोने लगे. अपने 30 साल के करियर में उन्होंने सैकड़ों फांसियां देखी थीं, लेकिन किसी ने मौत को इतनी बहादुरी से गले नहीं लगाया था जितना भगत सिंह और उनके दो कॉमरेडों ने लगाया था.


‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' गजल जब कानों में पड़ती है तो हमें राम प्रसाद बिस्मिल का ख्याल आता है लेकिन इसके रचयिता रामप्रसाद बिस्मिल नहीं, बल्कि शायर बिस्मिल अजीमाबादी थे.


ऐसे थे हमारे देश स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने हँसते-हँसते फांसी के फंदे को गले लगाया. उनकी शहादत भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंत का एक कारण साबित हुई और भारत की ज़मीन से ब्रिटिश हुकूमत हमेशा के लिए चली गई.