सिंदूर या सैनिटरी नैपकिन! GST कॉउंसिल महिलाओं के लिए किसको अधिक आवश्यक मानती है?

लगता है सरकार ने इस मामले में सब गड़बड़ कर दिया हैं। महिलाओं के लिए परमावश्यक सेनेटरी नैपकिन पर सिन्दूर को प्राथमिकता देते हुए सरकार ने सिन्दूर को तो कर मुक्त कर दिया हैं, जबकि 1 करोड़ 10 लाख से भी अधिक महिलाओं के विरोध को अनसुना करते हुए सेंटरी नैपकिन को 12 प्रतिशत की दूसरी टैक्स स्लैब में रखा है।
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महिलाओं के दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं पर GST के माध्यम से त्वरित रूप से टैक्स ब्रैकेट लागू किया गया है, हालांकि आप इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते लेकिन आप को जानकार हैरानी होगी कि सरकार भारतीय महिला की एक आदर्श छवि को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है और इसके लिए उसने तरीकों का चयन भी कर लिया है...

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परंपरा को बनाये रखने के लिए सिन्दूर सस्ता हो गया है…a12bc34de56fgmedium"/>

जीएसटी बनाने के दौरान ये कहा गया था, कि राष्ट्रीय महत्व की वस्तुओं और घरेलू इस्तेमाल के लिए अपरिहार्य वस्तुओं को करों से मुक्त रखा जाएगा, जिनमें सिंदूर और औरतों द्वारा माहवारी के दौरान इस्तेमाल किये जाने वाले सैनिटरी उत्पाद प्राथमिकता में थे।

कॉन्डोम को भी कर से मुक्त रखा गया हैं, क्योंकि संभोग नियंत्रण नहीं की जा सकने वाली एक जैविक स्थिति है। ऐसे में सुरक्षित सेक्स को बढ़ावा देकर अपने नागरिकों के जीवन के अधिकार की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है लेकिन #लहूकालगान तो जारी ही रहेगा, क्योंकि जाहिर तौर पर हमें माहवारी के दौरान कोई सहयोग और प्रजनन के लिए किसी प्रकार का श्रेय नहीं मिलता। इसलिए, सरकार उन लाखों लड़कियों के प्रति जवाबदेह न होने का विकल्प चुन सकती है, जिन्हे भी गंभीर यूरिनल ट्रैक्ट इंफेक्शन से सुरक्षा की आवश्यकता होती है क्योंकि उन्हें बुनियादी स्वच्छता की वस्तुयें भी नहीं मिल पातीं।

क्या जीएसटी काऊंसिल ने बिना सोचे समझे ऐसा किया है?

लगता है सरकार ने इस मामले में सब गड़बड़ कर दिया हैं। महिलाओं के लिए परमावश्यक सेनेटरी नैपकिन पर सिन्दूर को प्राथमिकता देते हुए सरकार ने सिन्दूर को तो कर मुक्त कर दिया हैं, जबकि 1 करोड़ 10 लाख से भी अधिक महिलाओं के विरोध को अनसुना करते हुए सेंटरी नैपकिन को 12 प्रतिशत की दूसरी टैक्स स्लैब में रखा है।

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और सन्देश स्पष्ट हैं...

गर्व से ताली बजाइये कि विवाह के बाद एक औरत की ब्रांडिंग करने के लिए कुमकुम, बिंदी, सिंदूर, आलता और चूड़ियां सभी के लिए सुलभ बना दी गयी हैं। चलिए एक भारतीय महिला की पवित्र, ठेठ छवि को बनाये रखें, ताकि हर महिला अपने सिर पर लाल रंग की इस चमक को बनाये रख सके। जब वास्तव में उसे रक्तस्राव हो रहा हो, तब आइये देश की इस कष्टदायी सुंदर घटना के बारे में इनकार कर के मानवता को ही दरकिनार कर दें...

आईये पीरियड्स के नहीं होने का दिखावा करें...

आइये हम इस बात का ढोंग करते हैं, कि भारत में 88% लड़कियां मासिक धर्म के दौरान गंदे कपड़ों, सूखे पत्तों, समाचार पत्र, रेत और प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करती हैं। आइये मिलकर ये बहाना करते हैं कि गांवों की सबसे छोटी लड़कियां हर महीने में पांच दिन स्कूल नहीं जा पाने के लिए मजबूर होती या 23 प्रतिशत लड़कियां मासिक स्राव शुरू होने पर स्कूल छोड़ देती है, क्योंकि उनके पास मासिक धर्म के दौरान स्वयं को स्वच्छ रखने के बहुत कम उपाय होते हैं...

चलिए ढोंग करते हैं, कि पीरियड सिर्फ औरत की जिम्मेदारी है और बाकी सभी इस जिम्मेदारी से मुक्त हैं, क्योंकि सरकार सभी नागरिकों के लिए एक सम्मानजनक जीवन प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी तो बखूबी निभा ही रही है...

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कॉन्डोम को भी टैक्स फ्री रखा गया हैं, क्योंकि संभोग नियंत्रण (sexual intercourse) नहीं की जा सकने वाली एक जैविक स्थिति है। ऐसे में सेफ सेक्स को बढ़ावा देकर अपने नागरिकों के जीवन के अधिकार की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है, लेकिन #लहूकालगान तो जारी ही रहेगा, क्योंकि जाहिर तौर पर हमें माहवारी के दौरान कोई सहयोग और प्रजनन के लिए किसी प्रकार का श्रेय नहीं मिलता। इसलिए सरकार उन लाखों लड़कियों के प्रति जवाबदेह न होने का विकल्प चुन सकती है, जिन्हे भी गंभीर यूरिनल ट्रैक्ट इंफेक्शन से सुरक्षा की आवश्यकता होती है, क्योंकि उन्हें बुनियादी स्वच्छता की वस्तुयें भी नहीं मिल पातीं।

सैनिटरी नैपकिन पर लगाया गया टैक्स विभिन्न राज्यों में 12 से 14.5 प्रतिशत के बीच हो सकता हैं, उदाहरण के लिए सेनेटरी नैपकिन पर राजस्थान में 14.5 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 14 प्रतिशत, पंजाब में 13 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश में 12.5 प्रतिशत कर लगाना प्रस्तावित है। प्रारंभिक खुलासे से ये पता चलता है, कि जो महिलाएं pads या tampons का उपयोग नहीं करती हैं, उन में से 80 प्रतिशत ऐसा इसलिए करती हैं, क्योंकि इसकी लागत अधिक होती है।

GST के इस फैसले ने इस बहस को जन्म दे दिया है, कि महिलों से सम्बंधित स्वछता उत्पादों पर न केवल टैक्स को खत्म करने की आवश्यकता है बल्कि इस पर अनुदान भी दिया जाए, जिसका लाभ आखिरी उपयोगकर्ता को स्थानांतरित किया जा सके। जून 2010 में एक सरकारी योजना स्थापित की गई थी, जिसके तहत 150 जिलों में किशोरिओं को अत्यधिक सब्सिडी वाले सेनेटरी पैड दिए जाने थे। इसके अतिरिक्त कई और गैर-लाभकारी या लाभकारी संगठन भी हैं, जो अत्यधिक रियायती दरों पर पैड का निर्माण करते हैं। फिर भी आँकड़े स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं, कि इनका प्रभाव बहुत सीमित है और इस क्षेत्र में अभी बहुत काम किए जाने की आवश्यकता है। निजी क्षेत्र, स्थानीय निर्माता और संगठन जिन्हे सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है उन क्षेत्रों में काम कर सकते है जहाँ सरकार सफल नहीं हो सकी है।

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मासिक धर्म से सम्बंधित स्वच्छता उत्पादों पर करों को खत्म करने की मांग का नेतृत्व कर रहीं सांसद सुष्मिता देव से कथित तौर पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पूछा, 'क्या आपको पता है कि इससे करदाताओं पर कितना बोझ पड़ेगा?' लेकिन क्या 'पूजा' उत्पादों से प्राप्त कर राजस्व का ब्योरा देना अर्थात् धार्मिक कर्मकांडों, समारोहों और अनुष्ठानों के आयोजन में काम आने वाली विभिन्न सामग्रियां (जिनका कि भारत में 30 अरब डॉलर का एक बहुत बड़ा बाजार है) पर कर में छूट देना कर दाताओं पर बोझ नहीं बढ़ाएगा? ये सभी वस्तुएं कर मुक्त वस्तुओं की स्लैब में शामिल है। इन सबके बाद तो यही लगता है, कि धार्मिकता के आडम्बर का अधिकार महिलों के बेहतर जननांग स्वास्थ्य (genital health) के अधिकार से ऊपर है।

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कुछ ऐसे राज्य भी हैं जो इस मामले में आदर्श हैं, जैसे- दिल्ली सरकार ने हाल ही में 20 रूपये से अधिक कीमत वाले पैकों पर टैक्स की दर 12.5 से घटाकर 5 प्रतिशत कर दी है, वहीं केरल के मुख्यमंत्री ने केरल के सभी स्कूलों में लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन के वितरण के लिए 30 करोड़ रुपये की एक परियोजना की घोषणा की है, लेकिन दूसरी तरफ केंद्र ने सेनेटरी नैपकिन को खेल सामग्री, खिलौने और कलाकृतियों जैसी वस्तुओं की श्रेणी में रखा है, मानो मासिक धर्म के स्वच्छता उत्पादों का प्रयोग जीवित रहने के बजाय मनोरंजन के लिए किया जाता हो।

सरकार को ये समझना होगा, कि किसी औरत के लिए मासिक धर्म से सम्बंधित स्वच्छता उत्पाद, कुमकुम, बिंदी, सिंदूर, आलता और चूड़ियों की बजाय अत्यंत आवश्यक है और उसके अस्तित्व को सम्माननीय बनाने के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।

-बिंजल शाह

अनुवाद: प्रकाश भूषण सिंह

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