लोकतंत्र की उत्कृष्टतम परंपराओं और सात्विक मर्यादाओं के प्रतीक पुरुष...अटल जी

By प्रणय विक्रम सिंह
August 16, 2020, Updated on : Sun Aug 16 2020 06:42:46 GMT+0000
लोकतंत्र की उत्कृष्टतम परंपराओं और सात्विक मर्यादाओं के प्रतीक पुरुष...अटल जी
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कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो "तारीख" में दर्ज हो जाती हैं। ऐसी ही एक तारीख़ है 16 अगस्त, जब भारतीय लोकतंत्र के अपार लोकप्रिय व सर्वस्वीकार्य एक व्यक्तित्व ने हमेशा के लिए फानी दुनिया को अलविदा कह दिया। वह कोई और नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उत्कृष्टतम परंपराओं के संवाहक एवं जनतंत्र की सात्विक मर्यादाओं के प्रतीक पुरुष हमारे "अटल जी" थे। 


लोकतंत्र की उत्कृष्टतम परंपराओं और सात्विक मर्यादाओं के प्रतीक पुरुष...अटल जी

लोकतंत्र की उत्कृष्टतम परंपराओं और सात्विक मर्यादाओं के प्रतीक पुरुष...अटल जी (फोटो साभार: sugarmint)



काल के कपाल पर जीवन और संघर्ष की अमिट इबारत लिखने वाला वीतरागी 02 वर्ष पूर्व चला गया अनंत यात्रा पर...कभी न लौटने के लिए।


वर्ष 2018 की तारिख 16 अगस्त को प्रार्थनाओं के अनवरत क्रम, दुआवों के हजारों सिलसिले, दवाओं की तमाम खुराकें भी नहीं रोक पायीं भारत के महानायक को महाप्रयाण से। आज भी मन व्यथित और व्याकुल है। चित्त की अकुलाहट बरबस ही नयनों की कोरें गीली कर रही हैं। मृत्यु एक अटल सत्य है किन्तु फिर भी 'अटल' का जाना अब भी समूचे राष्ट्र के जन-गण-मन को सहज स्वीकार्य नहीं हो रहा है। 


भारत के सबसे बड़े प्रान्त उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तो आज भी स्तब्ध है। लखनऊ की हर गली, हर चौराहा, हर नुक्कड़ अटल जी की स्मृतियों को समेटे हुए है। 'भारती भवन' और 'संस्कृति भवन' का तो कोना-कोना आबाद है अटल के व्यक्तित्व और कृतित्व की आभा और संस्मरणों से। अटल बिहारी बाजपेयी और लखनऊ के मध्य वही सम्बन्ध है जो देह और आत्मा के मध्य होता है। लखनऊ से उनके रिश्ते के अनेक सिलसिले हैं। एक कवि और पत्रकार के रूप में, एक सांसद के रूप में, देश के प्रधानमंत्री के तौर पर। एक-दो नहीं, लगातार पांच बार एमपी रहे लखनऊ से लेकिन इस शहर से उनका सम्बन्ध तो वर्षों पुराना है। तब देश आज़ाद भी नहीं हुआ था। 


बात 1947 की है, जब वह ग्वालियर से लखनऊ आए थे पीएचडी करने लेकिन पीएचडी तो पूरी नहीं हुई किन्तु वह सफल पत्रकार और राजनेता अवश्य बन गए। बताते हैं कि उन दिनों भाऊराव देवरस यूपी के प्रांत प्रचारक थे। दीनदयाल उपाध्याय संघ के सह प्रांत प्रचारक हुआ करते थे। आरएसएस के कार्यक्रमों में अटल बिहारी वाजपेयी कविता पाठ किया करते थे। ख़ूब तालियां बजती थीं। भाऊराव और दीनदयाल की नज़र इस युवा, प्रखर और ओजस्वी कवि पर पड़ी। संघ के शिविरों में रात में होने वाले कार्यक्रमों के अटल हीरो बन चुके थे। जुलाई के महीने में दीनदयाल उपाध्याय, भाऊराव देवरस और अटल बिहारी वाजपेयी की बैठक हुई। तय हुआ कि संघ के प्रचार-प्रसार के लिए एक पत्रिका निकाली जाए लेकिन इसका नाम क्या हो ? किसी ने नाम सुझाया “राष्ट्रधर्म”, यही नाम फ़ाइनल हो गया। अटल ज़ी इसके पहले संपादक बने।


31 अगस्त 1947 यानी रक्षाबंधन पर राष्ट्रधर्म का पहला अंक प्रकाशित हुआ। इसी अंक में पहले पन्ने पर उनकी कविता प्रकाशित हुई थी...

हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय, मैं शंकर का वह क्रोधानल, कर सकता जगती क्षार क्षीर।


अटल जी की ये कविता बाद में बड़ी मशहूर हुई। राष्ट्र धर्म के पहले अंक की 03 हज़ार प्रतियां प्रकाशित हुई थीं। उस दौर में कोई भी हिंदी पत्रिका पांच सौ से अधिक नहीं छपती थी। राष्ट्रधर्म की सभी कॉपियाँ हाथों-हाथ बिक गईं। इसीलिए पांच सौ और प्रतियाँ प्रकाशित करनी पड़ीं। राष्ट्रधर्म के दूसरे अंक की 8 हज़ार और तीसरे अंक की 12 हज़ार कापियां छापनी पड़ीं। 1 जनवरी 1948 को पाँचजन्य का पहला अंक प्रकाशित हुआ । राष्ट्रधर्म की सफलता से प्रसन्न होकर संघ ने वाजपेयी को ये ज़िम्मेदारी दी। ये भी पहली बार हुआ कि अटल जी ने एक साथ दोनों पत्रिकाओं का संपादन किया। 



राजेंद्र नगर में राष्ट्रधर्म पत्रिका का छोटा सा कार्यालय आज भी अटल जी की प्रेरणा से चल रहा है। आज भले ही अटल जी नहीं रहे लेकिन उनकी स्मृतियाँ सदैव इस कार्यालय में बनी रहेंगी। वैसे तो लखनऊ में हर तरफ अटल हैं लेकिन राष्ट्रधर्म पत्रिका के इस कार्यालय से उनका भावनात्मक जुड़ाव रहा। इसलिए नहीं कि वह इसके पहले संपादक थे बल्कि हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में वह जो करना चाहते थे, उसे करने का अवसर इस पत्रिका ने दिया।


प्रतिभा और अटल एक दूसरे के पूरक थे। मां सरस्वती की कृपा से उनका जीवन सदैव अभिसिंचित रहा। विचारधारा के लिए समर्पित एक स्वयंसेवक व संगठन के एक अनुशासित कार्यकर्ता के रूप में अटल जी का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। विरले राजनेता, प्रखर वक्ता, ओजस्वी कवि, अद्भुत शब्द शिल्पी और अभिजात देशभक्त, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व की विराटता में बाल मन की सरलता, ऋषि चित्त की सहजता, स्वयंसेवक की निडरता और भावुक कवि की उदारता का समावेश उन्हें महामानव बना देता है।


भारतीय राजनीति के अजातशत्रु की हर अदा निराली थी। स्वाधीनता के पूर्व हो याकि बाद में, छात्र जीवन में हो याकि राजनीतिक पारी में, विपक्ष में हो या सत्ता में, देश में हो या विदेश में प्रत्येक भूमिका और काल खंड में अटल जी जनमानस के प्रिय रहे।


 उनकी भाषण शैली मंत्र मुग्ध करने वाली थी। दो शब्दों अथवा दो वाक्यों के मध्य में लिया गया विराम भी सम्मोहक हो सकता है, यह उन्हें सुनकर ही समझा जा सकता था। इसमें कोई संदेह नहीं कि अटल बिहारी वाजपेयी की भाषण शैली से वे लोग भी प्रभावित थे, जो उनकी विरोधी विचारधारा से ताल्लुक रखते थे। शायद यही कारण था कि उन्हें सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे और घंटों धूप में खड़े रहते थे।


अटलजी जब भी संसद में बोलते थे, तो पूरा सदन उन्हें एकाग्र होकर सुनने के लिए आतुर रहता था। संयुक्त राष्ट्र में अपने ओजस्वी भाषण से उन्होंने दो बार विश्व पटल पर हिंदी का परचम लहराया। वे जब बोलते, तो लगता उनकी वाणी में भारत बोल रहा है। 



कौन भूल सकता है कार्यकर्ताओं में जोश भरती उनकी यह कविता कि, *कभी थे अकेले हुए आज इतने/ नही तब डरे तो भला अब डरेंगे/ विरोधों के सागर में चट्टान है हम/ जो टकराएंगे मौत अपनी मरेंगे/ लिया हाथ में ध्वज कभी न झुकेगा/ कदम बढ रहा है कभी न रुकेगा/ न सूरज के सम्मुख अंधेरा टिकेगा।*


अटल जी एक युगदृष्टा थे। वे दीवार पर लिखे भविष्य की भी अनुभूति कर लेते थे। इसका एक सटीक उदाहरण है कि 6 अप्रैल 1980 को मुंबई स्थित माहिम के मैदान में भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक और अध्यक्ष होने के नाते उनका अध्यक्षीय भाषण, उसमें उन्होने कहा था कि 'भाजपा का अध्यक्ष पद कोई अलंकार की वस्तु नहीं है। ये पद नहीं दायित्व है। प्रतिष्ठा नहीं है परीक्षा है। ये सम्मान नहीं है चुनौती है। मुझे भरोसा है कि आपके सहयोग से देश की जनता के समर्थन से मैं इस जिम्मेदारी को ठीक तरह से निभा सकूंगा।'


 अपने भाषण के आखिरी में उन्होंने कहा 'भारत के पश्चिमी घाट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर मैं ये भविष्यवाणी करने का साहस करता हूं कि अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।' 04 दशक पहले की गई अटलजी की ये भविष्यवाणी आज सच हो रही है और आज देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा या भाजपा गठबंधन की सरकार है। 


जनसंघ हो या भाजपा, अटल जी ने हमेशा कुशल संगठनकर्ता की भांति दल और कार्यकर्ताओं को सही दिशा प्रदान की। पण्डित श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन रहा हो या पण्डित दीन दयाल उपाध्याय का असमय जाना या फिर जनता पार्टी का विघटन रहा हो। अटल ने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाये रखने में कामयाब रहे और पार्टी को ऊंचाई पर ले जाने के लिए प्राण पण से लगे रहे। 


बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद जब भाजपा को राजनीतिक छुआछूत का सामना करना पड़ रहा था और कोई भी दल उसके साथ नहीं आना चाहता था, उस समय अटल जी ने सफलतापूर्वक 24 दलों की गठबंधन सरकार चलाई। उस समय जो भी दल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल हुआ था उसने यही कहा था कि समर्थन भाजपा को नहीं अटल बिहारी वाजपेयी को दिया है। 



नैतिकता, प्रामाणिकता और प्रतिबद्धता से लबरेज और निराशा में आशा की किरण जगाने वाले व्यक्तित्व अटल ने भारत के राजनीतिक जीवन के लिए एक मर्यादा रेखा खींची। यह रेखा सामान्य राजनीति से बहुत ऊंची है। मूल्य आधारित विचारनिष्ठ सार्वजनिक जीवन की यह रेखा सभी राजनीतिक दलों के लिए अनुकरणीय है। 


अनायास ही सही पर ऐसा लगता है कि जैसे अटल जी अपने तमाम राजनीतिक सिद्धांतों के साथ कई मान्यताओं और लोकतंत्र की थाती यहीं छोड़ गए हैं। उन्होंने लोकतंत्र को भारत की जीवनशैली बताया। उनके अनुसार लोकतंत्र 49 बनाम 51 का अंकगणित नहीं है। राष्ट्रीय स्वप्नों के लिए सबको साथ लेकर लोकजीवन का कल्याण करना ही लोकतंत्रीय राजनीति है। शायद तभी वह दूसरे दलों को प्रतिद्भंदी मानते थे विरोधी नहीं। 


अटल जी जब संसद सदस्य नहीं रहे तब भी निराश नहीं हुये और वे जब प्रधानमंत्री बने तो कभी भी वे बौराये नहीं। उनके संतुलित सामाजिक व्यवहार ने देश में उनकी स्वीकार्यता बढ़ायी। भारतीय राजनीति के कई रंग देखने वाले वाजपेयी इमरजेंसी में जेल गए, कविता के जरिए इमरजेंसी की कहानियां सुनाईं। जब इमरजेंसी खत्म हुई और चुनाव के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी, तो अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बनाए गए। बतौर विदेश मंत्री संयुक्त राष्ट्र के अधिवेशन को जब उन्होंने हिंदी में संबोधित किया, तो भारतीय राजनीति के साथ ही भारतीय इतिहास का भी ये ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया।


 21 मई 1996 को जब वाजपेयी ने पहली बार सियासत के शीर्ष पर पहुंचे, उसके 13 दिन के बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा लेकिन इस्तीफे वाले दिन उन्होंने जो भाषण दिया, उसे आज भी सियासत में दिलचस्पी रखने वाले लोग यूट्यूब पर खोज-खोजकर सुनते हैं। फिर १९९८ के कार्यकाल में जब उन्हें कार्य करने का पूरा अवसर मिला तो प्रतिमान गढ़े गए। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने देश के आम लोगों की जरूरतों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया।



अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए उन्होंने कई साहसिक कदम उठाए। देश के बड़े शहरों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए 5846 किमी की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना शुरू की। इसे उस समय की विश्व के सबसे लंबे राजमार्गों वाली परियोजना कहा गया। देश के गांवों को सड़कों से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना भी अटलजी के कार्यकाल में शुरू की गई। इसकी बदौलत आज देश के लाखों गांव सड़कों से जुड़ पाए हैं। हर घर तक बिजली पहुंचाने संबंधी केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग की योजनाओं को गति दी। नदियों को आपस में जोड़ कर जल संबंधी समस्याओं से निपटने का विचार दिया, कावेरी जल विवाद को सुलझाया। सभी को आवास संबंधी सुविधा उपलब्ध कराने के लिए शहरी सीलिंग को समाप्त किया।


इन्हीं योजनाओं और उनकी सूझ-बूझ का नतीजा था कि अर्थव्यवस्था अपनी बेहतरी के दौर में प्रवेश कर सकी। कमजोर समझी जाने वाली गठबंधन सरकारों का नेतृत्व करने के बावजूद उन्होंने देश को परमाणु हथियार सम्पन्न बनाया और पूरी दुनिया को दृढ़ इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता से परिचित कराया। वह ऐसा इसीलिए कर सके, क्योंकि एक सांसद के तौर पर वह विदेश नीति के ऐसे विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते थे, जो भरी संसद में प्रधानमंत्री नेहरू से भी असहमति प्रकट करने में आगे रहते थे। यह तब था जब वह नेहरू को एक आदर्श नेता के तौर पर देखते थे।


इस तरह उन्होंने नए प्रतिमान गढ़े और नई परंपराओं की आधारशिला रखी। न केवल गठबंधन राजनीति को बल और संबल प्रदान किया, बल्कि विदेश नीति को भी नया आयाम दिया। तमाम कटुता भुलाकर उन्होंने एक राजनेता की तरह व्यवहार किया और कारगिल के खलनायक परवेज मुशर्रफ को वार्ता की मेज पर आने का अवसर दिया। मुशर्रफ के बुलावे पर वह पाकिस्तान गए तो वहां से अमन का एक टुकड़ा लेकर ही लौटे। उन्होंने यह दिखाया कि राजनीति में मतभेद किस तरह मनभेद तक नहीं जाने चाहिए। किंतु जब पाक ने धोखा दिया तो उन्हीं के नेतृत्व में तीन महीने लंबा कारगिल युद्ध लड़ा गया और भारत जीता।


 उन्होंने अमेरिका के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध बनाए। कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए उन्होंने जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत का नारा दिया था। उनकी नीतियों में मानवता के सूत्र कहीं टूटते नजर नहीं आए। वे न सिर्फ कुशल और सफल राजनेता थे, दृढ़ निश्चयी प्रशासक और मन मोहने वाले वक्ता थे, बल्कि अच्छे कवि और सजग-विचारशील पत्रकार भी थे। 


आज वह हमारे मध्य नहीं हैं। उनके जाने से समावेशी राजनीति के एक युग का अंत हो गया। अटल जी के अचल-अटल विचार, अटल भाव से राष्ट्र का मार्गदर्शन कर देश के प्रगति पथ को आलोकित करता रहेगा। वे अशरीरी रूप से सदैव राष्ट्र का हिस्सा बने रहेंगे हम नम आँखों से उन्हे श्रद्धांजलि स्वरूप अश्रु सिक्त श्रद्धापुष्प अर्पित करते हैं।