बाल-विवाह और दहेज की मार से बचने के लिए मीना बन गई पुलिस कांस्टेबल

By जय प्रकाश जय
July 08, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:33:06 GMT+0000
बाल-विवाह और दहेज की मार से बचने के लिए मीना बन गई पुलिस कांस्टेबल
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महाराष्ट्र के गांवों में बड़ा अजीब सा चलन है। खेतों में काम कराने के लिए गांवों के दहेजखोर लोगों को अठारह साल से कम उम्र की दुल्हनों की तलाश रहती है लेकिन अब पढ़ी-लिखी लड़कियां उनकी चाल समझ गई हैं। अपनी इज्जत-आबरू और आर्थिक सुरक्षा के लिए बारह पास होते ही वे पुलिस में भर्ती हो जाती हैं।


Meena

मीना घोड़के (फोटो: सोशल मीडिया)



अपने जीवन में कुछ अलग करने की चाहत रखने वाली लड़कियों में ही एक हैं बीड (महाराष्ट्र) की महिला कांस्टेबल मीना घोड़के। सूखे ने कई वर्षों से उनके इलाके की कुछ ऐसी हालत कर रखी है कि गांव में हर किसी की खेतीबाड़ी राम भरोसे चल रही है। इन्ही परिस्थितियों के चलते मीना की बड़ी बहन की शादी सातवीं क्लास की पढ़ाई के दौरान चौदह साल की उम्र में ही कर दी गई थी। उनके साथ पढ़ रही कई पांच और लड़कियों को भी शादी और खेतों में काम करने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी, लेकिन मीना ने पहले से ठान रखा था कि वह अपनी जिंदगी बड़ी बहन की राह पर नहीं जाने देंगी। वह उसकी तरह सिर्फ घरेलू महिला बनकर नहीं रह जाना चाहती थीं।


पढ़ाई के दिनो में ही मीना के मन में एक और बात घर कर गई थी कि आज के खराब वक़्त में महिलाओं के लिए पुलिस की नौकरी ही सबसे सुरक्षित हो सकती है। कानूनी हैसियत के कारण एक पंथ, दो काज, नौकरी की नौकरी और महिला कांस्टेबल पर किसी को कुदृष्टि डालने की हिम्मत नहीं। इसीलिए मीना न तो खेतों में काम करना चाहती थीं, न पढ़ाई बीच में छोड़कर अपना शादी-ब्याह रचाना। भले ही उन्होंने अपने स्कूल के आधे दिन खेत में ही गुजारे लेकिन उन्होंने जान लिया था कि पैदावार तो हमेशा खराब ही होती है। इससे कहां शानदार जीवन बसर होने वाला है। ऐसे हालात में वह खुद को भी हेय महसूस किया करती थीं। जब उनका पुलिस में चयन हुआ तो गांववालों से उन्हे खूब शाबासियां मिलीं। अब तक वह बीड के एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट में अपनी पुलिस की नौकरी के चार साल गुजार चुकी हैं। 


गौरतलब है कि महाराष्ट्र सरकार ने अब से दो दशक पहले महिलाओं के लिए पुलिस में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देना शुरू किया था। इसीलिए पूरे देश के अनुपात में महाराष्ट्र में ही सबसे ज्यादा महिलाएं पुलिस में हैं। पूरे देश में लगभग एक लाख महिला कांस्टेबलों में से लगभग बीस प्रतिशत इसी प्रदेश से हैं। दूसरी हकीकत ये है कि यहां की महिला पुलिस में ज्यादातर यहां गांवों की रहने वाली हैं।




मीना बताती हैं कि बीड क्षेत्र में न तो पानी है, न रोजगार। बारहवीं पास होने के बाद अठारह साल की उम्र में आराम से पुलिस की वर्दी मिल जाती है। जिनकी लड़कियां वर्दी पा जाती है, उनके घर वालों की भी इज्जत बढ़ जाती है। इसीलिए अब तो यहां के गांवों की लड़कियों के पुलिस में भर्ती होने के पीछे उनका जुनून भी होता है। जब वह वर्दी में अपने गांव जाती हैं, भर्ती की इच्छुक लड़कियां अपनी भर्ती के लिए सोर्स पैरवी की गुहार लगाने लगती हैं क्योंकि, सच ये भी है, जिन लड़कियों की पुलिस में भर्ती नहीं हो पाती है, उनका कई तरह शोषण लाजिमी हो जाता है। पुलिस की नौकरी में शुरू से ही करीब अठारह हजार रुपये हर माह वेतन मिलने लगता है, जिससे मां-बाप की जिंदगी भी आसान हो जाती है। मीना के पुलिस में भर्ती होने के पीछे यही सब मुख्य कारण रहे हैं।


मीना बताती हैं कि पढ़ाई के दिनो में जब उन्होंने एक अखबार में पुलिस भर्ती का विज्ञापन देखा, तो उनके जीवन की आगे की राह भी साफ साफ दिखने लगी। उस समय परिवारवाले उनकी शादी की योजना बना रहे थे। मीना ने देख-जान रखा था कि पुरुषों के साथ काम करने के लिए ही कम आयु वाली लड़कियों की शादी की डिमांड इतना ज्यादा रहती है। ऐसे में घर वाले खेतों में काम के लिए दुल्हन तलाश रहे व्यक्ति से अपनी बेटियां ब्याह देते हैं। साथ ही, जिनकी बेटियां पुलिस में काम कर रही होती हैं, उनके मां-बाप को दहेज नहीं देना पड़ता है।


बीड की लगभग पचास फीसदी लड़कियों की शादी किशोरी उम्र में ही कर दी जाती है। इसीलिए मीना ने अपने पिता से कहा कि वह अभी शादी नहीं करेंगी। पिता ने शर्त रख दी कि ठीक है, जाओ एग्जाम दे लो लेकिन पास नहीं हुई तो तुम्हे ब्याह दिया जाएगा। कॉन्स्टेबल बनने के लिए आवेदक को कम से कम 12वीं पास होना चाहिए। इसके बाद शारीरिक फिटनेस टेस्ट और एक लिखित परीक्षा होती है। मीना ने पुलिस में भर्ती होने की सारी औपचारिकताएं आसानी से पूरी कर डालीं और उनको कांस्टेबल की नौकरी मिल गईं।