लक्ष्मी शंकरः ग्रैमी में नामांकित होने वाली वो भारतीय गायिका, जिनके संगीत ने सामाजिक बंदिशों को पार कर किया 'सात समंदर का सफ़र'

By Rekha Balakrishnan
July 22, 2019, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:33:06 GMT+0000
लक्ष्मी शंकरः ग्रैमी में नामांकित होने वाली वो भारतीय गायिका, जिनके संगीत ने सामाजिक बंदिशों को पार कर किया 'सात समंदर का सफ़र'
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'पॉइगनैंट सॉन्ग' नाम की पुस्तक में लेखिका कविता दास ने हिंदुस्तानी क्लासिकल सिंगर लक्ष्मी शंकर की जीवन यात्रा को उनके संगीत के सफ़र के ज़रिए प्रस्तुत करने की कोशिश की है। लक्ष्मी शंकर ग्रैमी जैसे विश्वप्रसिद्ध पुरस्कार के लिए नामांकित होने वाली चुनिंदा भारतीय कलाकारों में से एक हैं।


पटियाला घराने की विश्वप्रसिद्ध हिंदुस्तानी क्लासिकल गायिका लक्ष्मी शंकर, डांसर  और अभिनेत्री भी रह चुकी हैं। उन्होंने उदय शंकर की मंडली के साथ बतौर डांसर अपना सफ़र शुरू किया था। बीमारी की वजह से उनका डांसिंग करियर पटरी से उतर गया और इसके बाद उन्होंने पार्श्व-गायन (प्लेबैक सिंगिंग) के साथ अपने प्रोफ़ेशनल करियर की नई शुरुआत की। 


लक्ष्मी शंकर

फोटो में दाईं ओर लक्ष्मी शंकर लेखिका कविता दास के साथ



विश्व सिनेमा के महान निर्देशकों में शुमार रिचर्ड ऐटेनबॉरो की सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय फ़िल्म 'गांधी' में  फ़िल्माया गया, स्वयं महात्मा गांधी द्वारा रचित भजन 'वैष्णव जन तो' की रुहानी आवाज़ हम सभी के दिलों में आज भी ज़िंदा है और इसका श्रेय जाता है लक्ष्मी शंकर को। लक्ष्मी के खाते में बेशुमार उपलब्धियां हैं। महान सितार वादक पंडित रवि शंकर उनके देवर थे और उनके साथ लक्ष्मी जी ने कई प्रोजेक्ट्स में काम किया किया है, उदाहरण के तौर पर विश्व संगीत में असाधारण नाम हासिल करने वाले बैंड 'द बीटल्स' के जॉर्ज हैरिसन द्वारा प्रायोजित 'आई एम मिसिंग यू'। लक्ष्मी को 2009 में 'डांसिंग इन द नाइट' नाम के अल्बम के लिए बेस्ट वर्ल्ड म्यूज़िक अल्बम (ट्रेडिशनल) कैटेगरी में ग्रैमी पुरस्कारों के लिए नामांकन भी मिला था। 


मशूहर साहित्यकार और लेखिका कविता दास ने अपनी 'पॉइगनैंट सॉन्ग' नाम की किताब में लक्ष्मी शंकर के बचपन से लेकर अभी तक की यात्रा को बताया है। योरस्टोरी के साथ एक साक्षात्कार में कविता दास ने लक्ष्मी शंकर के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों, उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं और पुस्तक के बारे में बात की। 

पेश है इस बातचीत के कुछ अंशः


लक्ष्मी शंकर के जीवन और संगीत की ओर आपका रुझान कैसे विकसित हुआ?

कविता दासः मेरे माता-पिता पेशे से डॉक्टर थे और यूएस में ही रहते थे। वे न्यूयॉर्क में कला से संबंधित विभिन्न आयोजना का हिस्सा रहे ताकि विदेश में भारतीय संगीत के कलाकारों और डांसरों से मिलने का मौक़ा मिल सके। मैं भी इन कार्यक्रमों में शिरकर करती रहती थी और इन्हें करीब से देखा करती थी। इस दौरान ही मेरा परिचय लक्ष्मी शंकर से हुआ और मुझे उनका संगीत बेहद पसंद आया। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे लक्ष्मी शंकर जी के साथ पर्याप्त समय बिताने का और उन्हें उनके संगीत के ज़रिए जानने का मौक़ा मिला। 


आपको किताब लिखने की प्रेरणा कैसे मिली? 

कविता दासः मैं नस्लीय भेदभाव और उससे संबंधित न्याय के मुद्दों पर काम कर रही थी और इस दौरान ही मुझे इस बात का एहसास हुआ कि नस्लीय भेदभाव और अन्याय बहुत ही शांत तरीके से पैर फैलाते हुए कुछ लोगों की ज़िंदगी को संकुचित कर देता है या ख़त्म कर देता है। इसके बाद ही मुझे लगा कि लक्ष्मी जी की जीवन यात्रा को सामने लाना चाहिए और यह बताना चाहिए कि किस तरह से भारतीय संगीत ने वैश्विक मंच पर दस्तक दी और अपनी छाप छोड़ी और किस तरह से एक भारतीय महिला ने अपने संगीत के ज़रिए ग्रैमी तक का सफ़र तय किया।






इस किताब का सारांश क्या है? आपने इस बायॉग्रफ़ी में क्या संजोने का प्रयास किया है?

कविता दासः मैंने दो सवालों के जवाब देने की कोशिश की है। पहले तो यह कि तमाम सामाजिक अवरोधों के बावजूद लक्ष्मी शंकर जी ने किस तरह से यह मुक़ाम हासिल किया। वह दक्षिण भारत के ब्राह्मण परिवार में जन्मी थीं और उन्होंने भरतनाट्यम सीखा, हिंदुस्तानी क्लासिकल संगीत की तालीम ली और फिर भारतीय संगीत को ग्रैमी के मंच तक लेकर आईं। 

और दूसरा यह कि लक्ष्मी जी की इतनी असाधारण उपलब्धियों के बावजूद उन्हें उनके ही देश में उतनी पहचान नहीं मिली, जितने कि वह हक़दार थीं। मैं यह नहीं चाहती थी कि इस किताब के ज़रिए लोग सिर्फ़ लक्ष्मी जी या हिंदुस्तानी संगीत के बारे में जाने, बल्कि मेरा उद्देश्य था कि पाठक, एक महिला संगीतज्ञ की जीवन यात्रा के माध्यम से भारतीय संगीत के वैश्विक पटल तक पहुंचने के बारे में एक नया दृष्टिकोण विकसित कर सकें। 


लक्ष्मी जी के जीवन के किन पहलुओं ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया?

कविता दासः जहां तक लक्ष्मी जी के संगीत का सवाल है तो मुझे लक्ष्मी जी की आवाज़ बेहद ख़ूबसूरत लगती है और वह सीधे मेरे दिल तक पहुंचती है। उनके मुंह से भजन सुनकर एक अलग से ही आनंद की अनुभूति होती है। और जहां तक उनकी ज़िंदगी का सवाल है तो वह एक बहुत ही नेकदिल इंसान भी हैं। मुझे उनसे उनके अनुभव और संगीत के बारे में उनके विचार सुनना बहुत ही अच्छा लगता है। मैं भारतीय मूल की अमरीकी महिला हूं और इस नाते मुझे बेहद दिलचस्पी होती है कि मेरी दादी की उम्र की एक महिला ने किस तरह से अपने समय के सामाजिक अवरोधों को पार कर, अपने मन और जुनून की चाहत को  अंजाम दिया होगा। 


आप लक्ष्मी जी को बचपन से जानती हैं तो आपने किताब में किन व्यक्तिगत अनुभवों को जगह दी है?

कविता दासः किताब की प्रस्तावना में मैंने उस लम्हे का ज़िक्र किया है, जब मैंने लक्ष्मी से पूछा था कि क्या मैं उनकी बायॉग्रफ़ी लिख सकती हूं। उन्होंने उस दौरान ही मुझे ग्रैमी नॉमिनेशन दिखाया था और मुझे पता था कि मैं उनका बायॉग्रफ़ी ज़रूर लिखूंगी, लेकिन मुझे इस बात का बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि मैं इस काम को करूंगी कैसे। वहीं किताब के उपसंहार में मैंने उस वाक़ये का जिक्र किया है, जब मेरी मेंहदी का कार्यक्रम था और लक्ष्मी जी उस कार्यक्रम में लगातार गाए जा रही थीं। इन सब घटनाओं के साथ-साथ मैंने लक्ष्मी जी के साथ बिताए गए तीन दशक से भी ज़्यादा वक़्त का निचोड़ भी प्रस्तुत करने की कोशिश की है। 


जब आप किताब के सिलसिले में अनुष्का शंकर के पास गई थीं, तब उनके क्या विचार थे?

कविता दासः लक्ष्मी जी अनुष्का शंकर की रिश्तेदार हैं और संगीत के क्षेत्र में वह उनकी सीनियर भी हैं। अनुष्का जी ने लक्ष्मी जी पर अपनी व्यक्तिगत राय के साथ-साथ उनके संगीत की बारीक़ियों से भी मेरा परिचय करवाया। 





एक कलाकार की जीवन यात्रा को किताब में संजोते समय, आप जीवन के उतार-चढ़ाव को कैसे दर्शाती हैं?

कविता दासः मैंने किताब में उनकी ज़िंदगी के पहलुओं को सनसनीखेज़ बनाने की कोशिश नहीं की है, लेकिन उनकी ज़िंदगी में सच में बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। जहां एक तरफ़ उन्हें विदेश में ग्रैमी पुरस्कार के लिए नॉमिनेशन मिलता है, वहीं दूसरी ओर उनके देश में उन्हें उसी स्तर का कोई पुरस्कार नहीं मिलता। जहां एक तरफ़ संगीत ने उन्हें इतनी प्रतिष्ठा दिलाई, वहीं ज़िंदगी ने उनसे उनकी इकलौती बेटी को ही छीन लिया।


क्या आप हमें अपने बारे में कुछ बता सकती हैं? 

कविता दासः मेरा जन्म 1974 में हुआ था और मेरी परवरिश न्यूयॉर्क सिटी में हुई। मैंने कर्नाटक और बंगाली संगीत की तालीम ली है और वेस्टर्न क्लासिकल वॉयलिन भी सीखा है। लेखक बनने से पहले, मैंने सामाजिक क्षेत्र में 15 सालों तक काम किया। मेरे द्वारा लिखित सामग्री, लिट हब, टिन हाउस, लॉन्ग्रीड्स, केनयन रीव्यू, द वॉशिंगटन पोस्ट आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं। मैं हाल में अपने पति ओम के साथ न्यूयॉर्क सिटी में रहती हूं। जब मैं लेखन नहीं करती, उस दौरान मैं शहर के आर्ट सेंटर्स में और रेस्तरां आदि में अपना समय गुज़ारती हूं।