वीकली रिकैप: पढ़ें इस हफ्ते की टॉप स्टोरीज़!

By रविकांत पारीक
April 24, 2022, Updated on : Tue Apr 26 2022 04:57:53 GMT+0000
वीकली रिकैप: पढ़ें इस हफ्ते की टॉप स्टोरीज़!
यहाँ आप इस हफ्ते प्रकाशित हुई कुछ बेहतरीन स्टोरीज़ को संक्षेप में पढ़ सकते हैं।
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इस हफ्ते हमने कई प्रेरक और रोचक कहानियाँ प्रकाशित की हैं, उनमें से कुछ को हम यहाँ आपके सामने संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनके साथ दिये गए लिंक पर क्लिक कर आप उन्हें विस्तार से भी पढ़ सकते हैं।

दुनिया भर के कारीगरों को पहचान दे रही है Gaatha

Gaatha ने भारत के कारीगरों को पहचानने के लिए 2009 में एक ब्लॉगिंग साइट के रूप में अपनी यात्रा शुरू की थी। आज, ब्रांड 250 से अधिक कारीगरों का समर्थन करता है और अपने प्लेटफॉर्म पर 30 कैटेगरीज में 350 से अधिक कलाकृतियों को प्रदर्शित करता है।

सुमिरन पांड्या, को-फाउंडर, Gaatha

डिजाइनिंग उत्साही सुमिरन पांड्या, हिमांशु खत्री और शिवानी धर ने 2009 में अपने वेब पोर्टल गाथा पर विभिन्न कलाकृतियों और हथकरघा के बारे में लिखना शुरू किया। उन्होंने इसे देश की समृद्ध कला और शिल्प के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए एक ब्लॉगिंग साइट के रूप में शुरू किया था।


भारतीय कला और शिल्प विरासत के बारे में दुनिया को बताने के लिए एक कदम के रूप में शुरू हुई गाथा आज भारतीय कारीगर उत्पादों की खरीदारी के वास्ते लोगों के लिए सबसे अधिक मांग वाले ऑनलाइन स्टोरों में से एक बन गई है। ब्रांड अपने ग्राहकों को 30 कैटेगरीज में 350 से अधिक कलाकृतियों को उपलब्ध कराता है और लगभग 250 कारीगरों का समर्थन करता है।


योरस्टोरी के साथ बातचीत में, सुमिरन ने गाथा की यात्रा, भारत की कला और शिल्प के बारे में बात की, और बताया कि कैसे वे कारीगर समुदाय का समर्थन करने के लिए अपना काम कर रहे हैं।


सुमिरन ने योरस्टोरी को बताया, "हम तीनों में डिजाइनिंग का शौक था, और कला की उत्कृष्ट कृतियों का पता लगाने के लिए, हमने 2009 में देश भर में यात्रा की। हमने विभिन्न कला रूपों के बारे में बहुत कुछ पढ़ा था, लेकिन इन कलाओं के निर्माताओं की कहानी कभी सामने नहीं आई। कलाकारों से मिलने के बाद, हमने भारतीय कला विरासत के पीछे अज्ञात लोगों की कहानियों को सामने लाने के लिए ब्लॉग लिखना शुरू किया।”


एक बार जब उन्होंने कंटेंट पब्लिश करना शुरू कर दिया, तो लोग उनसे प्रोडक्ट्स के बारे में, कारीगरों के बारे में और वे प्रोडक्ट को कैसे खरीद सकते हैं, इस बारे में पूछताछ करने लगे। लगभग दो वर्षों तक ऐसे ही चलता रहा, और 2012 के अंत तक, पार्टनर्स ने एक ऑनलाइन स्टोर स्थापित करने और ग्राहकों के लिए सुंदर आर्ट पीस उपलब्ध कराने का फैसला किया।

मशरूम की खेती से मुनाफा कमाने वाली मां-बेटे की जोड़ी

मां-बेटे की इस जोड़ी को यह काम करते हुए करीब चार वर्ष हो रहे हैं। इन चार सालों में उन्हें अपने काम में दिन-प्रतिदिन सफलता हासिल हुई है।

मशरूम की खेती

जिथू थॉमस और उनकी माँ लीना थॉमस

केरल के रहने वाले जिथू थॉमस और उनकी मां इन दिनों मशरूम की खेती कर रहे हैं। उनके इस काम से न केवल उन्हें ही लाभ हो रहा है, बल्कि, अन्य कामगारों को रोजगार भी मिल रहा है। मां-बेटे की इस जोड़ी को मशरूम की खेती करते हुए करीब चार वर्ष हो रहे हैं। इन चार वर्षों में उन्हें अपने काम में दिन-प्रतिदिन सफलता हासिल हुई है।


एर्नाकुलम शहर के रहने वाले जिथू थॉमस बचपन से नए-नए प्रयोग करने के शौकीन थे। जब उन्होंने पहली बार पैकेट में मशरूम के बीज बोए थे उस वक्त उनकी उम्र महज 19 वर्ष की थी। हालांकि, तब जिथू थॉमस को यह लगा की वह ऐसा केवल समय बिताने के लिए कर रहे हैं। लेकिन, धीरे-धीरे उनकी इस काम में रुचि बढ़ती गई।


आज जिथू थॉमस इस काम को बड़ी सक्रियता के साथ कर रहे हैं और बड़ा मुनाफा भी कमा रहे हैं।


एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि, “जब भी समय मिलता था मैं मशरूम की खेती के बारे में कुछ न कुछ पढ़ता रहता था। कभी ऑनलाइन तो कभी किताबों में और मैग्जीन में अपने काम की चीजों की तलाश करता रहता था। मेरी इस उत्सुकता ने ही मेरा लगाव इस ओर बढ़ा दिया।”


55 साल की लीना थॉमस बताती हैं, “मैं और बेटा जीथू आज करीब 5,000 वर्ग फुट में मशरूम की खेती कर रहे हैं। इस काम को और बेहतर बनाने के लिए हमने एक प्रयोगशाला भी बना रखी है। वर्तमान समय में हर दिन लगभग 80 से 100 किलोग्राम यानी 1 क्विंटल मशरूम का उत्पादन कर रहे हैं। जिससे रोजाना तकरीबन 35 से 40 हजार रुपए की कमाई हो जाती है।”

चार भाई-बहनों ने महामारी में शुरू किया क्लोदिंग ब्रांड, कमाए 12 करोड़

खुशबू सेठी और उनके तीन भाइयों काव्या, मेहुल और तुषार द्वारा शुरू किया गया Jisora जयपुर का एक क्लोदिंग ब्रांड है जो स्लीपवियर, लाउंजवियर और रिसॉर्ट वियर ऑफर करता है। इसने एक वर्ष में एक लाख से अधिक ग्राहकों को सेवा प्रदान की है।

खुशबू सेठी, को-फाउंडर, Jisora

काव्या (18), मेहुल (19), तुषार (20), और खुशबू (24) सेठी जयपुर के उद्यमियों के परिवार से हैं, जो 35 वर्षों से कपड़ों के व्यवसाय में है। बचपन से ही, भाई-बहनों का रुझान पारिवारिक व्यवसाय में है और यह उद्यमिता के लिए उनके अंदर एक स्वाभाविक ललक थी। महामारी आई और 'वर्क-फ्रॉम-होम' कपड़ों की अवधारणा शुरू हुई तो उन्होंने अपनी उद्यमिता की यात्रा भी शुरू कर दी।


खुशबू कहती हैं, “जैसे-जैसे महामारी फैलती गई, हम समझ गए कि आरामदायक कपड़े खरीदना पिछले डेढ़ साल में लोगों की फैशन की आदतों में सबसे आम बदलाव रहा है। लोग चाहते हैं कि उनके कपड़े बहुमुखी हों क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें घर पर पहनना, उन्हें अपनी इच्छानुसार ऊपर या नीचे पहनना पसंद है।”


मौजूदा बाजार में गैप को भरने के लिए, उन्होंने 2020 के अंत में Jisora को लॉन्च किया। काव्या कंपनी और उसके बाजार के बीच का चैनल हैं और एचआर, ग्राहक संबंध और बिजनेस डेवलपमेंट को संभालती है। एक आर्टिस्ट और खुद से सीखे डिजाइनर तुषार, प्रोडक्शन टीम का नेतृत्व करते हैं। मेहुल कंपनी के तकनीकी और फाइनेंस प्रमुख हैं। मार्केटिंग टीम का नेतृत्व करने के अलावा, खुशबू एक खुद से सीखी डिजाइनर भी हैं।


Jisora शुरू करने के उद्देश्य के बारे में बताते हुए, खुशबू कहती हैं, “हम समझ गए थे कि महामारी के दौरान फैशन बोरियत से बचने का एक साधन बन गया था और इसका मतलब आराम और स्टाइल का मिश्रण था। हर कोई मानता है कि सबसे उपयुक्त और पेशेवर ऑफिस लुक के लिए पेंसिल स्कर्ट या शर्ट की जगह कोई नहीं ले सकता। Jisora का ध्यान ऐसे कपड़े उपलब्ध कराने पर है जो आपके ऑफिस की मीटिंग्स, मौज-मस्ती और आपकी शाम की रात के लिए एकदम सही हों।”


फाउंडर्स ने शुरू में ब्रांड में 25 लाख रुपये का निवेश किया और एक वर्ष में 12 करोड़ रुपये का रेवेन्यू अर्जित करने का दावा किया और लगभग 40 प्रतिशत की ग्राहक प्रतिधारण दर अर्जित की।

महामारी में गई नौकरी, कार में शुरू किया खुद का व्यापार

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम के पास वाला वह जंक्शन जहां हर दोपहर लगभग 12.30 बजे एक सफेद रंग की ऑल्टो कार आकार रुकती है और उससे निकलने वाले दंपति गरमागरम भोजन परोसना शुरू कर देते हैं। इनका नाम है करन और अमृता।

करन और अमृता

करन और अमृता

कोरोना काल में लगी ठोकर के बाद भी अपने आत्मविश्वास की बदौलत पति-पत्नी की इस जोड़ी ने कभी हार नहीं मानी और अपने नए काम की शुरुआत कर दी। उनके इस प्रयास से न केवल उनकी रोजी-रोटी चलने लगी है बल्कि सैंकड़ों अन्य गरीब लोगों को भी कम रेट में पेटभर भोजन मिल रहा है।


अमृता और करन के हाथों से बने खाने की तारीफ हर कोई करता है। आज उनकी कार के आने का इंतजार हर शख्स को बना रहता है। इस काम के पहले अमृता के पति एक सांसद की गाड़ी चलाने का काम करते थे। उन्हें हर महीने 14 हजार रुपए मिल रहे रहे थे। इससे उनके परिवार का गुजारा हो जाता था। लेकिन कोरोना महामारी में रातोंरात करन को नौकरी से निकाल दिया गया। तब उनकी पत्नी ने उनका साथ देते हुए इस काम की शुरुआत की।


एक साक्षात्कार के दौरान करन बताते हैं, ”वहां से हमें फौरन घर खाली करने के लिए कहा गया। एक-आध दिन का ही समय था। हम बेघर हो गए थे। हमारे पास रहने के लिए कोई जगह नहीं थी। इसके अलावा साल 2016 से मुझसे परिवार वालों ने व्यक्तिगत और संपत्ति के विवाद के कारण रिश्ते तोड़ लिए थे जिससे मैं उनसे भी मदद नहीं मांग सकता था।”


अमृता को बचपन से ही कुकिंग का काफी शौक था। इस घटना के पहले भी वह अपने खाली समय का इस्तेमाल खाना बनाने में और उसे लोगों तक पहुंचाने में करना चाहती थीं लेकिन सांसद के घर काम करने की अपनी सीमाएं थीं। अचानक नौकरी चली जाने के बाद अमृता ने ही छोले, राजमा-चावल, कढ़ी-पकौड़े बेचने का सुझाव दिया और हमने इसे शुरू कर दिया।

ज्वैलरी रिटेलर्स को ऑनलाइन होने में मदद कर रहा है यह स्टार्टअप

आगम शाह ने ज्वैलरी रिटेलर्स को उनकी ज्वैलरी ऑनलाइन बेचने में मदद करने के लिए Plushvie लॉन्च किया। उन्होंने मई 2018 में ज्वैलरी के लिए एक ईकॉमर्स मार्केटप्लेस के रूप में इसकी शुरुआत की।

आगम शाह, फाउंडर और सीईओ, Plushvie

ज्वैलरी रिटेल बिजनेस के बैकग्राउंड से आने के नाते आगम आर शाह लोगों के शॉपिंग बिहेवियर को अच्छे से समझते हैं।


वह कहते हैं, "सामान्य तौर पर, 98 प्रतिशत ज्वैलरी खरीदार बिना उसे ट्राई किए ज्वैलरी नहीं खरीदते, लेकिन इसके बावजूद 95 प्रतिशत मौजूदा ज्वैलरी ईकॉमर्स स्टोर वैसा एक्सपीरियंस प्रोवाइड नहीं कराते हैं।"


Plushvie की अवधारणा 2018 में लोगों के आभूषण खरीदने के तरीके को बदलने के दृष्टिकोण के साथ बनाई गई थी। ज्वैलर्स की बढ़ती मांग के कारण, अहमदाबाद स्थित स्टार्टअप ने अक्टूबर 2019 में प्लेटफॉर्म पर एक वर्चुअल ट्राईऑन फीचर लॉन्च किया। आगम का कहना है कि उन्होंने जनवरी 2020 में महामारी के कारण लॉकडाउन से ठीक पहले एक सास मॉडल को अपनाने का फैसला किया।


वे कहते हैं, “लॉकडाउन के दौरान, डिलीवरी चेन बाधित हो गई थी और सोने की कीमतें अत्यधिक अस्थिर थीं। वहीं दूसरी तरफ वर्चुअल ट्राईऑन की डिमांड ज्यादा थी। परिदृश्य में इस बदलाव ने हमें एक ईकॉमर्स मार्केटप्लेस से एआर आधारित सास स्टार्टअप बनने के लिए प्रेरित किया।”


आगम ने पहले Plushvie में उद्यम करने से पहले अपने पारिवारिक व्यवसाय के लिए एक ईकॉमर्स स्टोर लॉन्च किया था।


Plushvie को गुजरात यूनिवर्सिटी स्टार्टअप एंड एंटरप्रेन्योरशिप काउंसिल (GUSEC) द्वारा रिटेल स्पेस में यूजर्स द्वारा संचालित इनोवेशन के लिए "स्टार्टअप ऑफ द ईयर 2020" के रूप में भी मान्यता दी गई है।


Edited by Ranjana Tripathi