पुणे में 'बैठक फाउंडेशन' के फाउंडर कपल चार हजार बच्चों को सिखा रहे शास्त्रीय संगीत

By जय प्रकाश जय
December 13, 2019, Updated on : Fri Dec 13 2019 12:24:49 GMT+0000
पुणे में 'बैठक फाउंडेशन' के फाउंडर कपल चार हजार बच्चों को सिखा रहे शास्त्रीय संगीत
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किसी भी काम का जुनून किस तरह पूरे समाज का परिवेश बदल देता है, इसे चरितार्थ कर रहे हैं पुणे में बैठक फाउंडेशन के यंग कपल फाउंडर दाक्षायणी आठल्ये और मंदार कारंजकर। उनकी कोशिशों से विगत तीन वर्षों में महानगर के लगभग चार हजार बच्चे फाउंडेशन से जुड़कर इस समय शास्रीय संगीत की शिक्षा ले रहे हैं।   

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दाक्षायणी आठल्ये और मंदार कारंजकर (फोटो: सोशल मीडिया)

हमारे भारतीय वांग्मय में संस्कृत भाषा और शास्त्रीय संगीत, दोनो देश की आदि अस्मिता से जुड़े विषय हैं, जिनके छात्र अब किसी भी विषय में पढ़ाई करते हुए नए-नए प्रयोग करने लगे हैं। पुणे (महाराष्ट्र) के 'बैठक फाउंडेशन' के संस्थापक युवा कपल दाक्षायणी आठल्ये और मंदार कारंजकर ऐसे ही विषयांतर प्रयोगधर्मी दंपति हैं, जो पढ़ाई किन्ही अन्य विषयों से करने के बाद अब भारतीय शास्त्रीय संगीत को लोगों तक पहुंचाने में रात-दिन एक किए हैं।


दाक्षायणी आठल्ये ने कानून की और मंदार कारंजकर ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। जब वे कॉलेज के दिनों में दोस्त बन चुके थे, उनकी दिलचस्पी तभी से संगीत में गहराने लगी थी। दांपत्य जीवन में बंधने के बाद उन्होंने संकल्प लिया कि अब वे भारतीय शास्त्रीय संगीत को ही अपना करियर बनाएंगे। अपने इसी सपने को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने आज से तीन साल पहले 'बैठक फाउंडेशन' शुरू किया। आज यह फाउंडेशन उन लोगों को संगीत से जोड़ रहा है, जो क्लासिकल म्यूजिक में अपना भविष्य देख रहे हैं। 


मंदार कारंजकर की बांसुरी वादन में दिलचस्पी है तो दाक्षायणी आठल्ये की शास्त्रीय संगीत गायन में। मंदार संगीतज्ञ विजय देशमुख से शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ले रहे हैं। दाक्षायणी कहती हैं कि आज भी हमारे भारतीय समाज में घर-घर में लोग शास्त्रीय संगीत सुनना चाहते हैं लेकिन फिल्मी घटाटोप में बाजार ने सारी संभावनाएं अवरुद्ध कर रखी हैं। रेडियो और टीवी पर भी भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े कार्यक्रम बहुत कम प्रसारित होते हैं। 'बैठक फाउंडेशन' इसी अंधेरे को छांट रहा है।





जो माता-पिता भारतीय शास्त्रीय संगीत में अभिरुचि रखते हैं, वे चाहते हुए भी अपने बच्चों का सहयोग नहीं कर पाते हैं। अब उनके लिए नई राह बना रहा है 'बैठक फाउंडेशन'। वह कहती हैं कि इस दिशा में स्कूल-कॉलेजों को भी जिम्मेदार पहल करनी पड़ेगी ताकि आने वाली पीढ़ियों में भारतीय शास्त्रीय संगीत सिर्फ मनोरंजन न बनकर रह जाए। इसके अलावा फाउंडेशन बच्चों के लिए शास्त्रीय संगीत के पाठ्यक्रम पर फोकस दस पुस्तकों के एक प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहा है। 


मंदार कारंजकर बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों से वह लगातार अपने ज्ञान को आम लोगों तक पहुंचा रहे हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने पुणे के सरकारी स्कूलों से की थी। उस समय लोग उनसे कहते थे कि इससे क्या होगा, कुछ नहीं होने वाला, कोई भी बच्चा शास्त्रीय संगीत सुनने को तैयार नहीं लेकिन वे उन बातों से जरा भी हतोत्साहित नहीं हुए। शास्त्रीय संगीत के प्रसार के लिए बच्चों की इसके प्रति अभिरुचि जगाने के साथ ही उन्हे यह विद्या पढ़ाना भी जरूरी है।


आज 'बैठक फाउंडेशन' की कोशिशों से बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे शास्त्रीय संगीत में पारंगत हो रहे हैं। इस समय उनका फाउंडेशन पुणे में तीन तरह के कार्यस्थलों पर शास्त्रीय संगीत लोगों तक पहुंचा रहा है- स्कूल, कंस्ट्रक्शन साइट और शहर के मंदिर। संसाधनहीन परिवारों के बच्चों को इससे जोड़ने के लिए फाउंडेशन नगर निगम के स्कूलों के साथ काम कर रहा है। फाउंडेशन स्कूलों में बच्चों को शास्त्रीय संगीत सुनाने के लिए कम से कम छह सेशन लेता है। वहां के शिक्षकों को शास्रीय संगीत शिक्षण से सम्बंधित लेख सामग्री आदि मुहैया कराई जाती है। 





मंदार और दाक्षायणी की कोशिशों से बैठक फाउंडेशन द्वारा उपलब्ध कराई गई संगीत शिक्षण सामग्री अब व्यक्तिगत स्तर पर स्कूल अपने पाठ्यक्रम में भी शामिल करने लगे हैं। फाउंडेशन के शिक्षण प्रोग्राम से दो सप्ताह पूर्व स्कूलों में पोस्टर लगा दिए जाते हैं। इसमें भाग लेने के लिए फाउंडेशन किसी भी बच्चे पर कोई दबाव नहीं डालता है। उन्होंने अपने प्रोग्राम भी खास तरीके से डिजायन कर रखे हैं। इस दौरान बच्चे और टीचर फाउंडेशन संयोजकों से सवाल-जवाब भी करते हैं। कंस्ट्रक्शन साइटों में काम करने वाले मजदूरों और उनके बच्चों को शास्त्रीय संगीत के साथ ही तबला वादन सीखाया जा रहा है।


फाउंडेशन होनहार बच्चों को पुणे के अन्य संगीत शिक्षकों से भी जोड़ रहा है। इस प्रक्रिया में पिछले तीन वर्षों चार हजार बच्चे फाउंडेशन से जुड़ चुके हैं। चूंकि हमारी भारतीय संस्कृति के पुराकाल में मंदिर शास्रीय संगीत के स्कूली ठिकाने हुआ करते थे, इसलिए फाउंडेशन उन्ही पदचिह्नों पर चलते हुए पुणे के मंदिरों को संगीतमय कर रहा है।


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