Opinion: किसी कंपनी की मोनोपोली होना क्यों है खतरनाक, जानिए कैसे संकट में फंस जाता है देश

भारत में प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 भी है और उसे लागू करने वाला प्रतिस्पर्धा आयोग भी है. इसके बावजूद भारत में कई मौकों पर मोनोपोली जैसे ट्रेंड देखने को मिले हैं. रिलायंस जियो का आना मोनोपोली के ट्रेंड का जीता-जागता उदाहरण है.

Opinion: किसी कंपनी की मोनोपोली होना क्यों है खतरनाक, जानिए कैसे संकट में फंस जाता है देश

Monday March 27, 2023,

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हाइलाइट्स

भारत में प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 भी है और उसे लागू करने वाला प्रतिस्पर्धा आयोग भी है.

भारत में कई मौकों पर मोनोपोली जैसे ट्रेंड देखने को मिले हैं.

रिलायंस जियो का आना मोनोपोली के ट्रेंड का जीता-जागता उदाहरण है.

अगर पिछले कुछ सालों में देखें तो तमाम क्षेत्रों में आपको कुछ बिजनेस उभरते दिखेंगे, वहीं बाकी सारे खत्म होते दिखेंगे. ऐसे में आपको लग सकता है कि ये इसलिए आगे बढ़ते जा रहे हैं, क्योंकि वह बाकी सबसे बेहतर हैं. लेकिन क्या वाकई ऐसा ही है? या यहां कुछ बिजनेस की मोनोपोली होती जा रही है? किसी भी बिजनेस की मोनोपोली (Monopoly) यानी एकाधिकार होना गलत है, ये तो हर कोई समझता है, लेकिन सवाल ये है कि इससे बचने के लिए क्या किया जा रहा है? वैसे तो प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) बना हुआ है, जो प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 को लागू करता है और उसी के तहत काम करता है. किसी भी बाजार में मोनोपोली का होना बहुत ही खतरनाक होता है, आइए समझते हैं क्यों.

पहले जानिए क्या होती है मोनोपोली

अगर किसी बाजार में किसी प्रोडक्ट या सर्विस को सिर्फ एक ही ब्रॉड ऑफर करता है तो इसे उस ब्रांड की मोनोपोली कहा जाएगा. वैसे तो भारत में इस तरह की बड़ी कंपनियां नहीं हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में कई ऐसी एक्टिविटी हुई हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि कंपनी के पास मोनोपोली जैसे अधिकार आ गए हैं.

रिलायंस जियो जब आया तो सबने उठाए सवाल

जब भारत में साल 2016 में रिलायंस जियो की एंट्री हुई, तो कंपनी ने करीब 6-7 महीनों तक अपनी सारी सेवाएं मुफ्त में दीं. ना तो कॉल करने के पैसे लग रहे थे ना ही इंटरनेट इस्तेमाल करने के. इस तरह रिलायंस जियो ने बहुत सारे ग्राहक बना लिए. उसके बाद कंपनी अपने सस्ते प्लान लेकर बाजार में आई. इस दौरान बहुत सारी मौजूदा कंपनियों की हाल खराब हो गई और उन्हें बिजनेस बंद करना पड़ गया. आज आपको ना टाटा डोकोमो दिखेगा, ना टेलिनॉर, ना ही एयरसेल. यहां तक कि वोडाफोन और आइडिया को एक साथ जुड़ना पड़ गया, फिर भी कंपनी नुकसान में ही है. एयरटेल अकेले ऐसी कंपनी है जो रिलायंस जियो से मुकाबले कर पाई , लेकिन उसे भी भारी नुकसान हुआ है. वैसे तो कंपनी का कहना था कि बेहतर टेक्नोलॉजी की वजह से वह आगे निकली, लेकिन मुफ्त में 6 महीनों तक सेवाएं देकर जियो ने जो प्राइस वॉर शुरू किया था, कई कंपनियां उसी वजह से बर्बाद हुईं.

प्राइस वॉर है मुकेश अंबानी का ब्रह्मास्त्र!

मुकेश अंबानी जब भी मार्केट में किसी ने प्रोडक्ट के साथ एंट्री मारते हैं तो सबसे पहले वह प्राइस वॉर शुरू करते हैं. हाल ही में कैंपा कोला को बाजार में लाकर भी उन्होंने प्राइस वॉर शुरू किया है. यही वजह है कि विरोधी कपनियां भी दाम घटा रही हैं. अब मुकेश अंबानी ने एफएमसीजी सेक्टर में एंट्री मार दी है और वहां भी प्राइस वॉर शुरू हो रहा है. देखना दिलचस्प होगा कि कोला और एफएमसीजी में मुकेश अंबानी का रिलायंस जियो वाला दाव काम करेगा या नहीं.

मोनोपोली के क्या हैं नुकसान

अगर किसी ब्रांड की मोनोपोली हो जाती है तो वह अपनी मर्जी से प्रोडक्ट या सर्विस की कीमत तय कर सकता है. ऐसे में अगर आपको उसकी जरूरत है तो आपको उतने पैसे चुकाने ही होंगे, बाकी दूसरा कोई विकल्प नहीं होता है. मोनोपोली से इनोवेशन भी खतरे में पड़ जाता है.

संकट में फंस सकता है पूरा देश

एक बड़ा खतरा ये होता है कि अगर मोनोपोली वाली कोई कंपनी डूबती है तो उसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. जैसे गौतम अडानी पर संकट आने की वजह एलआईसी को भारी नुकसान झेलना पड़ा था. इसकी वजह ये है कि एलआईसी ने अपना बहुत सारा निवेश अडानी ग्रुप के शेयरों में कर दिया. यहां उस ब्रांड की मोनोपोली एलआईसी के लिए खतरनाक साबित हुई, क्योंकि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद अडानी ग्रुप के शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिली.

भारत में दिखने लगा है मोनोपोली वाला ट्रेंड

देखा जाए तो भारत में कंपनियों की मोनोपोली नहीं है, लेकिन सिर्फ कुछ कंपनियों के हाथ में पूरा सेक्टर होना भी मोनोपोली जैसा ही होता है. टेलिकॉम में जियो और एयरटेल ही दिग्गज हैं, उनके अलावा बीएसएनएल और आइडिया-वोडाफोन हैं. बात अगर सोलर पावर की करें तो उसका बहुत बड़ा हिस्सा अंबानी और अडानी के पास है. ग्रीन एनर्जी सेगमेंट में सिर्फ कुछ ही कंपनियों का दबदबा हो जाना भी मोनोपोली के जैसा है. गौतम अडानी के पास बहुत सारे एयरपोर्ट हैं, इन्हें भी मोनोपोली जैसी ही समझना चाहिए. यानी अभी मोनोपोली है तो नहीं, लेकिन ट्रेंड मोनोपोली के जैसा ही लग रहा है और अगर इसे अभी नहीं रोका गया तो बाद में दिक्कत हो सकती है.

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